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बग्वालः जहाँ बिना आतिशबाजी इगास पर्व

25/11/20
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की सभ्यता-संस्कृति यहां के रीति-रिवाज और त्योहारों को मनाने का तरीका बेहद ही अनूठा है। दीपावली जिसे हम पहाड़ी में इगास-बग्वाल के नाम से भी जानते हैं, का भी प्रदेशवासी बेसब्री से इंतजार करते हैं। क्योंकि इस दिन वह सदियों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। प्रदेश में इगास-बग्वाल के दिन भैलो खेलने का भी रिवाज है। जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है। इस दिन का लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्योंकि इस दिन वह एक साथ मिलकर कर अपनी खुशी एक दूसरे के साथ बांटते हैं।
पहाड़ में एकादशी को इगास कहते हैं। इसलिए इसे इगास बग्वाल के नाम से जाना जाता है। जो विशेषतौर पर गढ़वाल के जौनपुर, थौलधार, प्रतापनगर, रंवाई, चमियाला आदि क्षेत्रों में मनाई जाती है। एक मान्यता के अनुसार गढ़वाल में भगवान राम के अयोध्या लौटने की सूचना 11 दिन बाद मिली थी। इसलिए यहां पर 11 दिन बाद यह पर्व मनाया जाता है। दूसरी मान्यता के अनुसार दीपावली के समय गढ़वाल के वीर माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में गढ़वाल की सेना ने दापाघाट, तिब्बत का युद्ध जीतकर विजय प्राप्त की थी और दीपावली के ठीक 11वें दिन गढ़वाली सेना अपने घर पहुंची थी। युद्ध जीतने और सैनिकों के घर पहुंचने की खुशी में उस समय दीपावली मनाई थी।
सामाजिक मूल्यों को सहेज कर रखने वाला पहाड़ भी अब महज चयनीज दियों मे फंस गया था। कभी टिहरी उत्तरकाशी चमोली पौड़ी में अमावस्य में पड़ने वाली दीपावली के ठीक एक दिन पहले बग्वाल के नाम से दीवाली मनाई जाती थी जिसमें ग्रामीण अपने घरों में जिससे स्थानीय बोली में पूरी व उडद की दाल की पकोड़ी बना कर उन घरों में भेजी जाती थी जो अपने किसी प्रियजन की मौत के कारण त्यौहार मनाने से परहेज किया करते थे। रात को तिल के सूखे पेड़ों को जला कर पारंम्परिक वाद्यय यंत्रों के साथ एक खेल खेला जाता था जिसे भैले कहा जाता था। जिससे उस पूरे क्षे़त्र में तिल के सूखे पेड़ों के जलने के कारण देर रात तक उजाला रहा करता था।
उत्तराखंड, एक ऐसा प्रदेश जहां की संस्कृति कई रंगों से भरी हुई है। जहां की बोली में एक मिठास है। जहां हर त्योहार को अनूठे अंदाज में मनाया जाता है। इगास-बग्वाल यानी दीपावली भी एक ऐसा ही त्योहार है जो उत्तराखंड की परंपराओं को जीवंत कर देता था। त्यौहार और उत्सव का मौसम हो और इसमें उत्तराखंड का ज़िक्र न आए यह संभव ही नहीं है। दीपावली के त्यौहार को लेकर देशभर में तैयारियाँ जोरों पर हैं। लेकिन उत्तराखंड में यह प्रकाशपर्व यानी दीपावली बिना पटाखे, आतिशबाजियों और प्रदूषण के ही ख़ास तरीके से मनाया जाता है। देवभूमि कहे जाने वाले इस राज्य में दीपावली को इगास और बग्वाल कहा जाता है। यह बग्वाल राज्य के अलग-अलग स्थानों में दिवाली से 11 दिन बाद और ठीक एक महीने बाद मनाई जाती है। इसके पीछे कारण उत्तराखंड का इतिहास और जनजातीय परम्पराएँ हैं।दरअसलए उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में दीवाली मनाने के तौर.तरीके देश के अन्य इलाकों से काफी अलग हैं। गढ़वाल में एक नहीं बल्कि चार.चार दीपावली मनाने की परम्परा है। स्थानीय भाषा में इन्हें अलग.अलग नाम दिया गया है।
गढ़वाल में कार्तिक दीपावली के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में इगासए राज और मार्गशीर्ष दीपावली भी धूमधाम से मनाई जाती हैं। इन्हें भी लोग कार्तिक दीपावली की तरह मनाते हैं।उत्तराखंड भिन्न.भिन्न संस्कृतियों का एक अनोखा संगम है और अब इन्ही परम्पराओं को सुरक्षित रखना भी यहाँ के स्थानीय लोगों के लिए एक गंभीर विषय बनता जा रहा है। अक्सर सरकार द्वारा भी इन परम्पराओं को बचाए रखने के लिए प्रयास किए जाते हैं। हालाँकि, पलायन जैसे संक्रामक रोग का असर फिर भी पूरे उत्तराखंड को लील रहा है और गाँव खाली होते जा रहे हैं। सवाल अब भी यही है कि जब गाँव में लोग ही नहीं रहेंगे तो फिर संस्कृति को सुरक्षित किसके लिए और आखिर कैसे रखा जा सकेगाघ् इगास ;बगवालद्ध गढ़वाली दीपावली की शुभकामनाएं देते हुए आग्रह किया है कि सभी सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए कोविड के नियमों का पालन करें और सौहार्दपूर्ण वातावरण में इस पर्व को मनाएं हैं।अतः विकास की अंध आंधी से पूर्व इनका संरक्षण करना चाहिए।

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