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आदि गुरु शंकराचार्य : भारतीय सांस्कृतिक एकता के प्रतीक

06/11/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:

जब वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने के कारण भारतीय समाज कई तरह की विसंगतियों से ग्रसित था और कई सम्प्रदायों का उद्भव हो रहा था, उस समय आदि गुरु शंकराचार्य ने आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर सन्देश दिया जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है और अद्वैत सिद्धांत का प्रचार तथा वार्ता पूरे भारत में करके भारतीय समाज को जोड़ने का कार्य किया|

उन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा और भारत में चार कोनों पर चार मठों, दक्षिण में शृंगेरी शंकराचार्यपीठ, पूर्व (ओडिशा) जगन्नाथपुरी में गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ की स्थापना की जो कि आज भी भारत की एकात्मकता को दिग्दर्शित कर रहा है।विकीपीडिया पर अभी तक उप्लब्ध जानकारी के अनुसार, आचार्य शंकर का जन्म पश्चिम के इतिहासकार समुदाय के द्वारा वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि ई. सन् ७८८ को तथा मोक्ष ई. सन् ८२० स्वीकार किया जाता है, परंतु महाराज सुधन्वा चौहान, जो कि शंकर के समकालीन थे, उनके ताम्रपत्र अभिलेख में शंकर का जन्म युधिष्ठिराब्द २६३१ शक् (५०७ ई०पू०) तथा शिवलोक गमन युधिष्ठिराब्द २६६३ शक् (४७५ ई०पू०) सर्वमान्य है। इसके प्रमाण सभी शांकर मठों में मिलते हैं।

वर्तमान इतिहासज्ञ जिन शंकराचार्य को 788 – 820 ई. का बताते हैं वे वस्तुत: कामकोटि पीठके 38वें आचार्य श्री अभिनवशंकर जी थे। वे 787 से 840 ईसवीसन् तक विद्यमान थे | वे चिदम्बरम वासी श्रीविश्वजी के पुत्र थे । इन्होंने कश्मीर के वाक्पतिभट को शास्त्रार्थ में पराजित किया और 30 वर्ष तक मठ के आचार्य पद पर रहे। सभी सनातन धर्मावलम्बियों को अपनें मूल आचार्य के विषय में ज्ञान होना चाहिए ।

इस विषय में यह ध्यातव्य है कि पुरी के पूज्य वर्तमान शंकराचार्य जी ने सभी प्रमाणभूत साक्ष्यों को भारत सरकार को सौंपकर उन प्रमाणों के आलोक में ऐतिहासिक अभिलेखों में संशोधन का आग्रह भी किया है!शंकराचार्य को भारत के ही नहीं अपितु सारे संसार के उच्चतम दार्शनिकों में महत्व का स्थान प्राप्त है जिन्होंने सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं अपितु व्यवहारिक ज्ञान को अपनी वाणी में सम्मिलित किया जिसका एक उदाहरण तब मिलता है जब मंडनमिश्र से हुए शास्त्रार्थ के समय, जीवन के आध्यात्मिक पक्ष के साथ-साथ व्यावहारिक पक्ष को जानने के लिए, परकाया प्रवेश द्वारा उस यथार्थ का भी अनुभव किया, जिसे सन्न्यास की मर्यादा में भोगा नहीं जा सकता।

अपनी माता के जीवन के अंतिम क्षणों में पहुँचकर पुत्र होने के कर्तव्य का पालन करना, उनके द्वारा जीवन को समग्र रूप में स्वीकार करने का प्रमाण है, जहाँ विषय या वस्तु का आग्रह और निषेध दोनों पूर्णरूप से गिर जाते हैं।आदि गुरु शंकराचार्य ने ना सिर्फ अपने विचारों अथवा ज्ञान द्वारा ही, बल्कि कर्मों द्वारा समस्त भारतीय समाज को जोड़ने का कार्य किया और संसार को एक दिशा दी। वे सिर्फ एक विशाल व्यक्तित्व वाले दार्शनिक ही नहीं, बल्कि एक ऐसे राजनैतिक संत भी थे जिन्होंने कभी हमारे देश को एक सूत्र में पिरोने का काम भी किया था जिसके कारण उनका व्यक्तित्व एक “लौहपुरुष” के रूप में भारतीय मानस पर सदैव अंकित रहेगा।प्रत्येक मठ को इन्होंने एक-एक वेद का उत्तरदायित्व सौंपा – बदरिकाश्रम के ज्योतिर्मठ को अथर्ववेद दिया, श्रृंगेरी के शारदापीठ को यजुर्वेद, जगन्नाथपुरी के गोवर्धनमठ को ऋग्वेद और द्वारका के कलिका मठ को सामवेद सौंपा।

ऐतिहासिक और साहित्यिक साक्ष्य के मुताबिक, कांची कामकोटि मठ की स्थापना भी आदिगुरू शंकराचार्य ने ही की थी। स्वामी शंकराचार्य जी का जन्म भले ही दक्षिण भारत में हुआ था किंतु उनका कार्यक्षेत्र समस्त भारतवर्ष रहा है। उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण कर वेद का प्रचार–प्रसार किया और दिग्विजयी हुए। आज यह पूरा विश्व वेदांत की ओर उन्मुख हो रहा है, इसका पूरा श्रेय जगद्गुरु शंकराचार्य को ही जाता है।

उन्होंने मठों की स्थापना कर समूचे राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरो दिया, समाज में समन्वय स्थापित किया।जीवन भर वैदिक धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने जो प्रयत्न किए, उसे भविष्य में क्रियाषील रखने का प्रबन्ध करके मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में महाप्रस्थान करने का निश्चय किया। शिष्यों के साथ केदारनाथ पहुंचे और वहीं उन्होंने निर्विकल्प समाधि लगा ली। ऐसे अपूर्व विचारक, ब्रह्मज्योति से देदीप्यमान, दर्शनाचार्य, दैवीय प्रतिभा युक्त, युगद्रष्टा विरले ही पैदा होते हैं।

आदि गुरु शंकराचार्य को हिंदू धर्म को पुनर्जीवित करने का श्रेय दिया जाता है. गौरतलब है कि 2013 में उत्तराखंड में आयी भीषण तबाही के दौरान आदि शंकराचार्य की समाधि क्षतिग्रस्त हो गई थी और अब इसका पुनर्निर्माण किया गया है. एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद योगीराज (37) को एक आकर्षक नौकरी मिली थी, लेकिन मूर्ति बनाने का अपना पारंपरिक काम करने के लिए जल्द ही उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। योगीराज ने कहा कि जब सरकार ने शंकराचार्य की मूर्ति स्थापित करने का फैसला किया, तो इसके लिए देशभर के मूर्तिकारों से मूर्ति के नमूने आमंत्रित किए गए थे।

उन्होंने कहा, ‘‘आखिरकार मेरा नमूना चुना गया और तब से प्रधानमंत्री कार्यालय निजी तौर पर इस कार्य की प्रगति की निगरानी कर रहा था।’’ उन्होंने बताया कि उन्होंने आदि गुरु शंकराचार्य की मूर्ति बनाने के लिए मैसुरू में एचडी कोटे से काले ग्रेनाइट के पत्थर का चयन किया और सात लोगों की एक टीम के साथ इस पर काम शुरू कर दिया। उनके मुताबिक, 12 फुट ऊंची प्रतिमा का वजन करीब 28 टन है। मूर्ति जुलाई में बनकर तैयार हो गयी थी, जिसके बाद इसे उत्तराखंड ले जाया गया। मूर्ति को भारतीय वायु सेना के चिनूक हेलीकॉप्टर की मदद से निर्धारित स्थान पर ले जाया गया। उन्होंने कहा कि परिवार में हुए एक हादसे की वजह से वह इस कार्यक्रम में जा नहीं सके।

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