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महाकुंभ के अमृत स्नान में उमड़ा आस्था का सैलाब

28/01/25
in उत्तराखंड, दुनिया, देहरादून, संस्कृति
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
कुंभ मेले के भव्यता की चर्चा न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में हो रही है।महाकुंभ में उमड़ा आस्‍था का सैलाब, पैर रखने की जगह नहीं प्रयागराज में इस साल का कुंभ मेला 13 जनवरी से शुरू हो चुका है और यह 26 फरवरी तक चलेगा. गुरुवार 16 जनवरी को इसका चौथा दिन है. वहीं, प्रशासन का दावा है कि पहले शाही स्नान (14 जनवरी) के दिन ही 3.5 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई. पिछले तीन दिन में 6 करोड़ श्रद्धालु संगम में डुबकी लगा चुके हैं.इन 45 दिनों के दौरान 45 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद जताई गई है. यूपी के मुख्यमंत्री ने भी एक्स पर इस आंकड़े को साझा किया था, मगर सवाल उठता है कि इतनी विशाल भीड़ की सही गिनती आखिर की कैसे जाती है? भीड़ की गिनती ऐतिहासिक झलककुंभ मेले में श्रद्धालुओं की गिनती का सिलसिला 19वीं सदी में शुरू हुआ था. 1882 के कुंभ में अंग्रेजों ने प्रमुख रास्तों पर बैरियर लगाकर गिनती की थी. रेलवे टिकट बिक्री के आंकड़ों से भी मेले में पहुंचने वाले लोगों का अनुमान लगाया गया. उस समय, लगभग 10 लाख श्रद्धालुओं के संगम तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था. 1906 के कुंभ में करीब 25 लाख लोग शामिल हुए थे. इसी तरह, 1918 के महाकुंभ में करीब 30 लाख लोगों ने संगम में डुबकी लगाई थी.AI और CCTV की मदद से गिनतीइस बार कुंभ मेले में भीड़ का आकलन करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सहारा लिया जा रहा है. मेले में 200 स्थानों पर अस्थाई सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं. इसके अलावा, पूरे प्रयागराज शहर में 268 जगहों पर 1107 अस्थाई कैमरे लगाए गए हैं. 100 से अधिक पार्किंग स्थलों पर 700 से अधिक सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं, जो वाहनों और श्रद्धालुओं की गिनती में मदद करते हैं.नाव, वाहन और साधुओं के कैंप का योगदानश्रद्धालुओं की संख्या का अंदाजा नावों, ट्रेनों, बसों और निजी वाहनों से आने वाले लोगों की गणना से भी लगाया जाता है. साधु-संतों और अखाड़ों में आने वाले भक्तों की गिनती को भी कुल आंकड़ों में जोड़ा जाता है. हालांकि, एक ही व्यक्ति की गिनती कई बार हो सकती है, क्योंकि कई लोग अलग-अलग घाटों पर स्नान करते हैं या मेले के अलग अलग हिस्सों में घूमते हैं. पहले कैसे होती थी गिनती?2013 से पहले मेले में आने वाले लोगों की संख्या का अनुमान डीएम और एसएसपी की रिपोर्ट के आधार पर लगाया जाता था. इसमें बसों, ट्रेनों और निजी वाहनों के आंकड़े शामिल होते थे. अखाड़ों से भी उनके भक्तों की जानकारी ली जाती थी. पहले गिनती थोड़ी आसान भी थी मगर अब अब, बढ़ती भीड़ और शहर में यातायात प्रबंधन की वजह से यह काम काफी जटिल हो गया है.2013 में क्या तरीका अपनाया गया था रिपोर्ट के आधार पर की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2013 के कुंभ में पहली बार सांख्यिकीय तरीके का इस्तेमाल किया गया. इसमें स्नान के लिए जरूरी जगह और समय को आधार माना गया. आंकड़ों के मुताबिक, एक व्यक्ति को स्नान के लिए 0.25 मीटर जगह और 15 मिनट का समय चाहिए. इस तरह, एक घंटे में एक घाट पर लगभग 12,500 लोग स्नान कर सकते हैं. इस साल, प्रयागराज में 44 घाटों को स्नान के लिए तैयार किया गया है. अगर इन सभी घाटों पर 18 घंटे तक लगातार स्नान हो, तो भी प्रशासन की तरफ से दिए गए आंकड़ों से यह संख्या काफी कम बैठती महाकुंभ मेले का आज 16वां दिन है. मौनी अमावस्या (29 जनवरी) से पहले ही संगम की रेती पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है. मंगलवार की सुबह भी हर तरफ लोगों की भीड़ नजर आई. संगम में अब तक लगभग 15 करोड़ लोग स्नान कर चुके हैं. रविवार को 1.74 करोड़ श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाई थी. वहीं सोमवार की रात 8 बजे तक ही 1.55 करोड़ लोगों ने स्नान कर लिया था. वहीं भीड़ बढ़ने के कारण प्रशासन को व्यवस्थाएं बनाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी. मौनी अमावस्या पर करीब 10 करोड़ लोगों के आने का अनुमान है. वहीं पूरे महाकुंभ मेले में करीब 45 करोड़ लोगों के आने की संभावना है. इंतजामों को बेहतर बनाए रखने के लिए महाकुंभ में अफसरों की बैठक हुई. प्रयागराज महाकुंभ में भीड़ का रिकॉर्ड टूट चुका है. मेले में पहली बार 15 करोड़ लोगों ने स्नान किया. यह अब तक सबसे ज्यादा आंकड़ा बताया जा रहा है. मकर संक्रांति पर 3.5 करोड़ श्रद्धालुओं, संतों और कल्पवासियों ने अमृत स्नान किया था. वहीं मौनी अमावस्या से पहले ही बढ़ी भीड़ से प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. सभी सड़कों पर जाम की स्थिति बन जा रही है. इसे देखते हुए डीएम ने लोगों से अपील की है कि स्थानीय लोग चार वाहन से न आएं. वरिष्ठजन बाइक से आएं. दो पहिया वाहन से आने पर लोगों को काफी सहूलियत मिलेगी. स्थानीय लोगों की जिम्मेदारी है कि वे व्यवस्था बनाने में सहयोग करें. इससे देश-विदेश से जुटे लोगों को परेशानी से नहीं जूझना पड़ेगा. झांसी से प्रयागराज आ रही पैसेंजर ट्रेन पर पथराव का भी मामला सामने आया है. गौर हो कि यह महाकुंभ 144 साल में दुर्लभ खगोलीय संयोग में हो रहा है। यह वही संयोग है, जो समुद्र मंथन के दौरान बना था। मंगलवार को महाकुंभ का पहला शाही स्नान है और इसके लिए भारी संख्या में श्रद्धालु संगम तट पर आए हुए हैं। पद्म पुराण और महाभारत के अनुसार संगम तट पर माघ मास में कल्पवास करने से सौ वर्षों तक तपस्या करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। विधि-विधान के अनुसार लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं ने संगम तट पर केला, तुलसी और जौं रोपकर एक महा व्रत और संयम का पालन करते हुए कल्पवास की शुरुआत की। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक्स पर पोस्ट किया कि मानवता के मंगलपर्व‘महाकुंभ 2025’ में ‘पौष पूर्णिमा’ के शुभ अवसर पर संगम स्नान का सौभाग्य प्राप्त करने वाले सभी संतगणों, कल्पवासियों, श्रद्धालुओं का हार्दिक अभिनंदन।प्रथम स्नान पर्व पर सोमवार को 1.65 करोड़ सनातन आस्थावानों ने अविरल-निर्मल त्रिवेणी में स्नान का पुण्य लाभ अर्जित किया। प्रथम स्नान पर्व को सकुशल संपन्न कराने में सहभागी महाकुंभ मेला प्रशासन, प्रयागराज प्रशासन, धार्मिक-सामाजिक संगठनों, विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों तथा मीडिया जगत के बंधुओं सहित महाकुंभ से जुड़े केंद्र व प्रदेश सरकार के सभी विभागों को हृदय से साधुवाद। पुण्य फलें, महाकुंभ चलें। संगम की रेती पर बसे भव्य एवं सुरम्य अस्थायी जिला में महाकुंभ में उमड़ते जनसैलाब के विहंगम दृश्य के साक्षी अमरीका, रूस, जर्मनी, इटली, इक्वाडोर समेत तमाम देशों से आए विदेशी श्रद्धालु भी बने। वहीं दूसरी तरफ महाकुंभ में पहुंचे 10 देशों के 21 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने बृहस्पतिवार को संगम में डुबकी लगाई और विभिन्न अखाड़ों का दौरा किया। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। अधिकारियों ने बताया कि प्रतिनिधियों ने इस दौरान न केवल महाकुंभ के धार्मिक महत्व को समझा, बल्कि भारतीय संस्कृति के अद्भुत पहलुओं का भी अनुभव किया। आस्था के महासंगम में चहुंओर सारा दिन हर-हर गंगे के जयकारे गूंजते रहे। साधु संतों की उपस्थिति से वातावरण भक्ति रस से ओतप्रोत बना रहा। गरीब अमीर, जाति धर्म से परे आस्था का यह समागम देश की एकता और अखंडता का प्रतीक बन कर दुनिया भर में अपनी आभा फैला रहा था।  इस मेले में पहुंचने के लिए दुनियाभर से करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हैं. लोग थक भी रहे हैं लेकिन मां गंगा की आस्था सब पर भारी है.।लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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