• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

जंगलों में भी वन्यजीवों के लिए अभिशाप बना प्लास्टिक

30/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
9
SHARES
11
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
प्लास्टिक की खोज सबसे पहले 1907 में की गई थी, लेकिन बहुत कम समय में ही इसका उपयोग बढ गया। कभी वरदान समझा जाने वाला प्लास्टिक आज दुनिया के लिए बङी समस्या बन चुका है। साल 1950 में दुनिया में प्लास्टिक उत्पादन 2 मिलियन टन था, जो साल 2021 में बढकर 390 मिलियन टन हो गया। ‘अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विकास संगठन’ (ओईसीडी) के मुताबिक आज 1950 के मुकाबले प्लास्टिक के मूलभूत अंग ‘सिंथेटिक पॉलिमर’ का वैश्विक उत्पादन 230 गुना बढ़ गया है। वर्ष 2000 से 2019 के बीच ही प्लास्टिक का कुल उत्पादन दोगुना होकर करीब 46 करोड़ टन हो गया था।देश और दुनिया भर में प्लास्टिक रोजमर्रा की जरूरतों में शामिल हो चुका है. इसने इंसानों के लिए कई मायनों में सुविधाएं बढ़ाई है, लेकिन इसके बढ़ते उपयोग के कारण इसके दुष्प्रभाव भी दिखाई देने लगे हैं. चिंता की बात यह है कि अपनी सुविधा बढ़ाने के चक्कर में इंसानों ने खुद को तो मुसीबत में डाल ही लिया है, साथ ही इंसानों की लापरवाही का हर्जाना वन्यजीवों को भी भुगतना पड़ रहा है. यह स्थिति तब वन महकमे के सामने आई है, जब राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में वन्यजीवों के पोस्टमार्टम के दौरान उनके शरीर से प्लास्टिक मिल रहा है. राज्य के संरक्षित क्षेत्र तक भी प्लास्टिक के पहुंचने से वन्यजीवों की परेशानी बढ़ती हुई दिखाई दे रही है. इसके पीछे की वजह वन क्षेत्र से गुजरने वाले तमाम रेलवे ट्रैक और रोड कनेक्टिविटी को माना जा रहा है. दरअसल राज्य में ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी है, जहां से या तो रेलवे ट्रैक गुजर रहे हैं या फिर आम लोगों की सुविधा के लिए रोड कनेक्टिविटी दी गई है. देखा जा रहा है कि रेलवे ट्रैक होने के कारण अक्सर सफर के दौरान लोग ट्रेन से वन क्षेत्र में ही प्लास्टिक को फेंक रहे हैं. इसके अलावा कुछ जगहों पर जंगलों के बीच से गुजरने वाली सड़कों में लोगों की गतिविधियों के दौरान भी इसी तरह प्लास्टिक जंगलों के आसपास पहुंच रहा है. वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की मृत्यु के बाद उनका पोस्टमार्टम किया जाता है. इसी तरह रेलवे ट्रैक की चपेट में आने वाले हाथी, सांभर या दूसरे वन्यजीवों का पोस्टमार्टम करने के बाद ही उनके शरीर को डिस्पोज किया जाता है. वन विभाग में वन्यजीवों के उपचार और उनकी चिकित्सा सुविधा के लिए काम कर रहे पशु चिकित्सकों को इस दौरान वन्यजीवों के शरीर से पॉलिथीन या प्लास्टिक मिल रहा है. वन क्षेत्रों में प्लास्टिक पहुंचने के पीछे एक वजह रेलवे ट्रैक पर संरक्षित क्षेत्र के बीच में ही लोगों का प्लास्टिक के साथ खाद्य पदार्थ फेंकना भी है. ऐसी स्थिति में वन विभाग के कर्मचारियों को रेलवे ट्रैक क्षेत्र में निरंतर साफ सफाई करने के निर्देश भी दिए जाते रहे हैं. लेकिन इससे बाद भी यह समस्या बढ़ती दिख रही है. लोग जो खाद्य पदार्थ प्लास्टिक के साथ जंगलों में फेंक देते हैं. उसकी सुगंध वन्यजीवों को आकर्षित कर रही है. दूर से ही वन्यजीव इसकी सुगंध को महसूस करते हुए वहां तक पहुंच जाते हैं और उसके बाद खाद्य पदार्थ को प्लास्टिक के साथ ही निगल जाते हैं. इस तरह खाद्य पदार्थ की सुगंध के कारण वन्यजीव प्लास्टिक को भी निगलने से परहेज नहीं कर रहे.  जिस तरह वन क्षेत्र या इसके आसपास इंसानों द्वारा खाद्य पदार्थ फेंका जा रहा है, उसे जंगलों में वन्यजीवों की गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि एक तरफ खाद्य पदार्थ की सुगंध पाकर तमाम वन्यजीव जंगलों के बाहर या आसपास पहुंच रहे हैं तो वहीं इन वन्यजीवों को खाने वाले शिकारी वन्यजीव भी इनके पीछे जंगलों से बाहर निकल रहे हैं. इस तरह देखा जाए तो इंसानों की यह लापरवाही वन्यजीवों की गतिविधियों को भी प्रभावित कर रही है और उन्हें प्लास्टिक के दुष्प्रभावों की तरफ भी धकेल रही है. वनों के आसपास रहने वाले लोग भी जंगलों के किनारे घर का कचरा और खाद्य पदार्थ फेंक रहे हैं और इसके कारण कई जगहों पर तमाम वन्यजीवों के साथ भालू जैसा शिकारी वन्यजीव भी इस कचरे की तरफ खींचा आ रहा है. इसके अलावा हिरण, सांभर जैसे वन्यजीव भी जंगलों के बाहर निकल रहे हैं और उनके पीछे तेंदुआ और बाघ भी इंसानी बस्तियों की तरफ बढ़ रहे हैं. इंसानों की यही आदत मानव वन्यजीव संघर्ष के लिए भी बड़ा कारण बन रही है. भारत में प्लास्टिक का प्रवेश साठ के दशक में हुआ था। आज इसको लेकर अजीब-सा विवाद बना हुआ है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यह पारिस्थितिकी तन्त्र के लिए खतरनाक है परन्तु इसके पक्षधरों का दावा है कि यह ‘इको फ्रेंडली’ यानी पारिस्थितिकी संगत है क्योंकि यह लकड़ी और कागज का उत्तम विकल्प है। पैकेजिंग में इसका बढ़ता इस्तेमाल लकड़ी और कागज को बचा रहा है और अंततः उससे वनों का संरक्षण भी हो रहा है। भारत में एक अनुमान के मुताबिक इसका उपयोग भविष्य में बढ़ेगा ही क्योंकि इसकी उपयोगिता अतुलनीय है। बिजली, इलेक्ट्रानिक्स और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में इसका कोई विकल्प नजर नहीं आता। अकेले ऑटोमोबाइल क्षेत्र में ही इसका वर्तमान उपयोग 5000 टन वार्षिक है और शीघ्र ही इसके 22,000 टन तक पहुँचने का अनुमान है।वास्तव में देखा जाए तो प्लास्टिक अपने उत्पादन से लेकर इस्तेमाल तक सभी अवस्थाओं में पर्यावरण और समूचे पारिस्थितिकी तन्त्र के लिए खतरनाक है चूँकि इसका निर्माण पेट्रोलियम से प्राप्त रसायनों से होता है। अतः पर्यावरणविदों की मान्यता है कि यह उत्पादन अवस्था में ही ऊर्जा के पारम्परिक स्रोत का क्षय करता है। इसी समय निकली हुई जहरीली गैस स्वास्थ्य के लिए एक अन्य खतरा है। इसके उत्पादन के दौरान व्यर्थ पदार्थ निकलकर जल स्रोतों में मिलकर जल प्रदूषण का कारण बनते हैं। इसके अलावा गौरतलब तथ्य यह भी है कि इसका उत्पादन अधिकांशतः लघु उद्योग क्षेत्र में होता है जहाँ गुणवत्ता नियमों का पालन नहीं हो पाता।.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

Share4SendTweet2
Previous Post

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की नहीं, प्रत्येक नागरिक की भी जिम्मेदारी है’: नरेंद्र सिंह नेगी

Next Post

क्या नैन नाथ रावल जी को मिलना चाहिए पद्म भूषण पुरस्कार ?

Related Posts

उत्तराखंड

Physical and Analytical Chemistry लेखक: डॉ हरीश चन्द्र अंडोला एवं डॉ रीना पुरोहित प्रकाशक: कुणाल बुक्स नई दिल्ली

October 12, 2026
20
उत्तराखंड

यूजेवीएन लिमिटेड ने पंप्ड स्टोरेज परियोजना की दिशा में बढ़ाया कदम

October 12, 2026
7
उत्तराखंड

ऑनलाइन हाजिरी बनी परेशानी का सबब मेहनताने को भटक रहे श्रमिक

October 12, 2026
8
उत्तराखंड

उत्तराखण्ड सिद्धपीठ कुंजापुरी पर्यटन एवं विकास मेले का आगाज

October 12, 2026
7
उत्तराखंड

उत्तराखण्ड की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थी बिशनी देवी शाह

October 12, 2026
7
उत्तराखंड

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने श्री बदरीनाथ धाम पहुंचकर भगवान बदरीविशाल के दर्शन किये

October 12, 2026
5

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67751 shares
    Share 27100 Tweet 16938
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45794 shares
    Share 18318 Tweet 11449
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38079 shares
    Share 15232 Tweet 9520
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37460 shares
    Share 14984 Tweet 9365
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37383 shares
    Share 14953 Tweet 9346

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

Physical and Analytical Chemistry लेखक: डॉ हरीश चन्द्र अंडोला एवं डॉ रीना पुरोहित प्रकाशक: कुणाल बुक्स नई दिल्ली

October 12, 2026

यूजेवीएन लिमिटेड ने पंप्ड स्टोरेज परियोजना की दिशा में बढ़ाया कदम

October 12, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.