डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊं क्षेत्र के लिए नैन नाथ रावल सिर्फ एक लोकगायक नहीं हैं, वे यहां की आत्मा हैं। उनकी आवाज़ में उतना ही सुकून छिपा है जितना किसी बच्चे के लिए उसके माँ की गोद में।
रावल जी की सबसे ख़ास बात यह है कि वे आज भी जमीन से जुड़े हुए हैं, उनकी सादगी उन्हें बड़ा बनाती है। उन्हें देखकर कवि कुमार विश्वास का कहा याद आता है कि “असली बड़ा आदमी वो होता है जिससे मिलने के बाद कोई ख़ुद को छोटा न महसूस करे!” कुछ ऐसा ही व्यवहार है नैन नाथ जी का।
बेशक उम्र के इस पड़ाव पर वह एक ऐसे मुकाम पर हैं जहां हर लोक गायक पहुंचना चाहता है, मगर उनके जीवन का संघर्ष बहुत लंबा रहा है।
13 मई 1943 को अल्मोड़ा के दन्या क्षेत्र के सिरौड़ा गांव में जन्मे नैन नाथ रावल जी के पिताजी का नाम श्री टिकानाथ रावल तथा माता जी का नाम बिशनी देवी था। जीवन में कुछ छोटी-मोटी नौकरियां करने के बाद साल 14 जनवरी 1971 को जिस दिन भारत और पाकस्तिान का युद्ध शुरू हुआ था उसी दिन इन्होंने अपनी आखरी नौकरी छोड़ी और आगे का जीवन गायकी को ही सुपुर्द कर दिया।
उस दौर में अपना गाना रिलीज करना आज के समय जितना आसान नहीं था। तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि भविष्य में यूट्यूब जैसा भी कोई माध्यम होगा। नैननाथ रावल जी बताते हैं कि उनकी गायकी से प्रभावित होकर उस वक्त के प्रसिद्ध गायक श्री चंद्र सिंह राही जी ने ही उनको गीतों की कैसेट बनाकर रिलीज करने हेतु प्रेरित किया। जिसके बाद राही जी के प्रयासों से रावल जी को कैसेट कम्पनियॊं से सम्पर्क करने और गीतों की रिकॉर्डिंग कर कैसेट के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिला। दिल्ली में नैननाथ रावल जी ने सबसे पहली रिकार्डिंग हीरदा कुमाउनी कैसेट कम्पनी के लिये की थी। इसके बाद उन्होंने रामा कैसेट कम्पनी, नीलम कैसट और टी-सीरीज आदि के लिए भी गीतों की रिकार्डिंग की। इस दौरान उनके सौ से अधिक एलबम आए, साथ ही रावल जी ने आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के माध्याम से भी कई कुमाऊँनी गीत गाये।
आज नैन नाथ रावल जी 83 वर्ष के हैं और अपने अब तक के जीवन काल में उन्होंने लोकगीतों को सिर्फ गाया नहीं, जिया है – हर शब्द, हर सुर में उन्होंने अपने पहाड़ की मिट्टी, संस्कृति और संवेदना को समेटा है।
उनके गीतों ने हज़ारों युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम किया है, और आज भी वे लोक संगीत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में लगे हुए हैं।
नैन नाथ रावल जी को भी पद्म पुरस्कार मिलना चाहिए क्योंकि अपने पूरे जीवन में उन्होंने लोक गीतों और विधाओं के लिए जो कार्य किया है वह बहुत प्रेरणादायक है। उस दिन काव्य जी की बात ने मुझे सोचने पर मजबूर किया।
हम भाग्यशाली हैं कि हमारे समय में नैन नाथ रावल जैसे लोकगायक मौजूद हैं, जो हमें हमारी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











