डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तरकाशी का धराली, सिर्फ चारधाम यात्रा का एक पड़ाव नहीं, बल्कि अपने आप में ऐतिहासिक और आर्थिक रूप से भी बेहद मजबूत गांव था. भागीरथी नदी के किनारे बसे इस गांव में समृद्धि का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि यहां पर उगने वाला सेब भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में सबसे ज्यादा बिकता था. उत्तराखंड में जो सेब पैदा हो रहा है, उसकी कीमत किसानों को सही नहीं मिल पा रही क्योंकि भारत में सेब का आयात तेजी से बढ़ रहा है. चलिए इसे सेहत और इकोनॉमी पर इसकी मार, दोनों एंगल से समझते हैं.हिमाचल, कश्मीर और उत्तराखंड के करीब 5 लाख परिवार सेब की खेती से जुड़े हैं. भारत की एप्पल इकोनॉमी ₹17,000 करोड़ की है. सस्ता विदेशी आयात, घटती ड्यूटी और पिछड़ती तकनीक हमारे किसानों को पीछे धकेल रही है. इस पूरे प्रोसेस को हिमाचल फ्रूट, वेजिटेबल्स एंड फ्लावर ग्रोवर्स एसोसिएशन आसान भाषा में समझाते हैं.”देखिये ऐसा है, दुनिया के लगभग 44 देशों से भारत में सेब इम्पोर्ट होता है. भारत में सेब की जो कुल खपत है, उसमें लगभग 4 लाख मीट्रिक टन अभी इम्पोर्ट हो रहा है. भारत के अपने उत्पादन की बात करें, तो हिमाचल प्रदेश का उत्पादन 6 लाख मीट्रिक टन से लेकर 9-10 लाख मीट्रिक टन तक रहता है. कश्मीर का उत्पादन 12 लाख से लेकर 22 लाख मीट्रिक टन तक है. उत्तराखंड भी अब धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है और लगभग 1 लाख मीट्रिक टन के आसपास पहुंच गया है. आजकल जो इम्पोर्टेड एप्पल आता है, उसमें सबसे ज्यादा तुर्की, ईरान, यूएसए, न्यूजीलैंड और चिली जैसे 5-6 मुख्य देश हैं. फुजी सेब की सबसे ज्यादा पैदावार चीन में होती है, लेकिन वहां से सीधे आने पर रोक है. फिर भी वह नेपाल और भूटान के रास्ते इनडायरेक्टली भारत आ रहा है. चूंकि ‘साफ्टा’ (साउथ एशियन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) के तहत आने वाले देशों पर इम्पोर्ट ड्यूटी नहीं लगती, इसलिए वहां से ‘अवैध डंपिंग’ हो रही है. ईरान का सेब भी पहले सीधे आता था, लेकिन अभी कुछ समय से रुका है; हालांकि वह भी अवैध रास्तों से पहुंच ही जाता है.” वह क्वालिटी के मामले में अन्य देशों से बहुत बेहतर है. विदेशी सेब को तकनीक के सहारे एक साल तक प्रिजर्व किया जाता है और उसमें पेस्टिसाइड्स व केमिकल्स का इस्तेमाल करके उसे इतना चमकदार बना दिया जाता है कि वह देखने में एकदम ताजा लगता है. लोग पेस्टीसाइड और वैक्स वाला विदेशी सेब चाव से खा रहे हैं जो केवल दिखने में अच्छा है. अगर आम आदमी की बात करें, तो चीन में लोकल मार्केट से सेब खरीदना किफायती माना जा सकता है. वहां के लोग रोजमर्रा के फल के तौर पर सेब आसानी से खरीद लेते हैं. लेकिन. अगर आप प्रीमियम क्वालिटी या ब्रांडेड सेब की तरफ जाते हैं, तो कीमत भारत से कम नहीं लगती.चाइना में एक किलो सेब की कीमत एक जैसी नहीं होती. यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कहां से खरीद रहे हैं और कैसी क्वालिटी चाहते हैं. आम बाजार में सेब सस्ते मिल सकते हैं, लेकिन सुपरमार्केट और गिफ्ट पैक सेब महंगे भी हो सकते हैं. कुल मिलाकर, चीन में सेब सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि जरूरत, स्वाद और स्टेटस के हिसाब से अलग-अलग कीमतों में मिलने वाली चीज़ है. मौसम के इस बदले रूप ने विशेष रूप से सेब बागबानों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि इन दिनों घाटी के अधिकांश सेब बागानों में फूल पूरी तरह खिल चुके हैं और यही समय सेब की फसल के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है। मौसम विभाग के अनुसार पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने के कारण घाटी में मौसम ने करवट ली है। सुबह से ही आसमान में बादल छाए रहे और दोपहर बाद कई स्थानों पर तेज हवाओं के साथ हल्की से मध्यम बारिश दर्ज की गई। निचले क्षेत्रों में तेज हवाओं ने पेड़ों और फसलों को झकझोर दिया। अचानक बदले मौसम के कारण तापमान में भी गिरावट दर्ज की गई है। इन दिनों कुल्लू घाटी के सेब बागानों में फूल पूरी तरह खिल चुके हैं।बागबानों का कहना है कि यदि इस समय तेज बारिश,ओलावृष्टि या आंधी चलती है तो फूलों के झडऩे का खतरा बढ़ जाता है, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है। कई बागबानों ने बताया कि तेज हवाओं के कारण कुछ स्थानों पर फूलों के झडऩे की आशंका बनी हुई है। बागबानों का कहना है कि सेब की अच्छी फसल के लिए इस समय मौसम का सामान्य और स्थिर रहना बेहद जरूरी होता है। यदि लगातार बारिश या तेज हवाएं चलती हैं तो परागण प्रक्रिया भी प्रभावित होती है, जिससे फल बनने की प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है। यही कारण है कि मौसम के इस बिगड़ैल रूप ने बागबानों की चिंता बढ़ा दी है। घाटी के कई बागवानों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से मौसम का पैटर्न लगातार बदल रहा है। कभी अचानक बारिश, कभी ओलावृष्टि और कभी तेज हवाएं फसल को नुकसान पहुंचा देती हैं। सेब की अच्छी फसल के लिए हिमपात अत्यंत महत्वपूर्ण है। पिछले दो वर्षों से पर्याप्त हिमपात नहीं हुआ है, जिसके कारण सेब उत्पादन क्षेत्र लगातार सिकुड़ता जा रहा है। यदि इस वर्ष भी समय पर हिमपात नहीं हुआ, तो नुकसान और भी अधिक हो सकता है,सेब की खेती के लिए लगभग 1,000 से 1,600 घंटे की ठंडक की आवश्यकता होती है, जिसमें तापमान लगभग -7 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। “जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से सेब की खेती करना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है।” काश्तकारों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में मौसम चक्र में होने वाले बदलाव की वजह से सेब के कई पेड़ सूख रहे हैं. सेब का आकार भी कम हो रहा है, जिस पर उद्यान के लिहाज से ध्यान देने की आवश्यकता है. बची फसल को लोकल बाजार में पहले तो पहुंचा ही नहीं पा रहे हैं. अगर पहुंचा दिया तो बाजार भाव नहीं मिल पा रहा है. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












