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खुमाड़ की क्रांति को कुमाऊं की बारदोली नाम दिया गया था

05/09/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देश की आजादी की लड़ाई में उत्तराखंड के सल्ट क्रांतिकारियों की भी अग्रणी भूमिका रही थी। 5 सितंबर 1942 को महात्मा गांधी के ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन की प्रेरणा से जन्मे सल्ट के क्रांतिकारियों ने अपने क्षेत्र में स्वाधीनता आन्दोलन की लड़ाई लड़ते हुए सल्ट क्षेत्र के ‘खुमाड़’ नामक स्थान पर चार क्रांतिकारी बलिदान हो गए थे।इस आंदोलन से अंग्रेजों को भारत से भागने को मजबूर कर दिया था। इन्हीं बलिदानियों की याद में सल्ट के खुमाड़ में पांच सितंबर को कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए जाते हैं।देश की आजादी से पहले वर्ष 1942 से पहले वर्ष 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ों और करो या मरो के नारे की सल्ट क्षेत्र में जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई। सल्ट क्षेत्रवासियों की वीरता व एकजुटता से बौखलाकर पांच सितंबर 1942 को अंग्रेजी हुकूकम ने तत्कालीन एसडीएम जानसन विद्रोह को कुचलने के लिए सशस्त्र पुलिस बल के साथ सल्ट भेजा खुमाड़ पहुंचकर जानसन ने वहां हो रही सभा को बंद करने को कहा। लेकिन देश प्रेम का जज्बा लिए क्रांतिकारी नहीं माने। एसडीएम जानसन ने गोली चलाने के आदेश दे दिए। जिसमें खीमानंद, गंगाराम, बहादुर सिंह मेहरा व चूड़ामणि मौके पर ही बलिदान हो गए। इसके साथ ही इस आंदोलन में गंगा दत्त शास्त्री, मधुसूदन, गोपाल सिंह, बचे सिंह व नारायण सिंह समेत एक दर्जन क्रांतिकारी घायल हुए। सल्ट की धरती आंदोलनों की गवाह रही है। भारत छोडों आंदोलन से पूर्व वर्ष 1828 में लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल की अगुआई में पूरे देश में सत्याग्रह आंदोलन हुआ। किसान लगान में एकमुश्त 22 प्रतिशत बढ़ोतरी हटाने की मांग कर रहे थे।किसानों के तेवरों के आगे ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। ब्रितानी सरकार को लगान घटाकर 6.03 प्रतिशत करने को विवश होना पड़ा। इसी दौरान किसानों ने अल्मोड़ा के सल्ट में भी सत्याग्रह शुरू किया। इस क्रांति ने ब्रिटिश सरकार की चूलें हिलाकर रख दीं। सल्टवासियों की इसी देशभक्तिपूर्ण शहादत के कारण गांधीजी ने इस क्षेत्र को ‘कुमाऊँ की बारदोली’ कहा था. गौरतलब है कि कुमाऊं का अभिप्राय उस समय टिहरी रियासत को छोड़कर सम्पूर्ण उत्तराखण्ड से था.जहां सल्ट के खुमाड़ नामक स्थान पर ये क्रांतिकारी लोग शहीद हुए थे, वहां इनकी याद में शहीद स्मारक बना है. प्रतिवर्ष 5 सितंबर को यहां इन क्रांतिकारी वीर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है और इनके योगदान को लक्ष्य करके कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया जाता है. सल्ट के असहयोग आन्दोलन में स्थानीय कुमाउनी कवियों ने भी ग्रामीणों के हृदय में देशप्रेम व देशभक्ति का जोश भरने का महत्त्वपूर्ण काम किया-
“हिटो हो उठो ददा भुलियो,आज कसम खौंला
हम अपणि जान तक देशो लिजि द्यौंला.”
“झन दिया मैसो कुली बेगारा,
पाप बगै है छो गंगा की धारा.
झन दिया मैसो कुली बेगारा,
आब है गयी गांधी अवतारा.
सल्टिया वीरों की घर-घर बाता,
गोरा अंग्रेजा तू छोड़ि दे राजा..”

सत्याग्रह की कामयाबी पर मातृशक्ति ने बल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि दी। स्वतंत्रता संग्राम के साथ लगान के खिलाफ किसानों का सत्याग्रह अल्मोड़ा के सल्ट में भी शुरू किया गया और खुमाड़ की क्रांति ने ब्रिटिश सरकार की चूलें हिला कर रख दी थी। कुमाऊं दौरे पर पहुंचे महात्मा गांधी ने तब सल्ट के क्रांतिकारियों के सत्याग्रह को स्वराज प्राप्ति में मील का पत्थर बताया था। साथ ही खुमाड़ की क्रांति को कुमाऊं की बारदोली नाम दिया। उत्सव फिर सामने है। आजादी का उत्सव। खुशियां मनाने का उत्सव। योद्धाओं को सलाम करने का उत्सव जिनकी वजह से हम आज गुलामी से मुक्त हैं। जिनके बलिदान से हमें संवैधानिक व्यवस्था में जीने का अधिकार मिला है। उन्होंने अंग्रेजों से मोर्चा लिया। डटकर खड़े रहे और दिखा दिया कि हिंदुस्तानी कमजोर नहीं होते हैं। इस उत्सव में कुमाऊं की धरती का भी बड़ा योगदान हैकुमाऊं क्षेत्र में राजस्व की कोई स्थाई व्यवस्था नहीं थी. अंग्रेज अधिकारी तथा सेना के क्षेत्र भ्रमण पर उनकी सेवा और सामान को लाने ले जाने का कार्य स्थानीय ग्रामीणों द्वारा बारी-बारी से बेगार के रूप में किया जाता था और अफसरान के लिए डोली पालकी की भी व्यवस्था की जाती थी जिस का हिसाब बेगार के रजिस्टरों में रखा जाता था. यह बेगार अंग्रेजी दमन का प्रतीक बन गई थी जिसके उन्मूलन के लिए 14 जनवरी 1921 को बागेश्वर उत्तरायणी मेंले में सरयू बगड़ पर एक विशाल जनसभा में पूरे क्षेत्र के गांवों के कुली बेगार के रजिस्टरों को सरयू नदी में प्रवाहित कर अंग्रेजों को किसी प्रकार की बेगार और डोली पालकी की व्यवस्था नहीं करने का संकल्प लिया गया. यह कुमाऊं में अपने तरीके का एक अलग असहयोग आंदोलन था जो हरगोविंद पंत, बद्रीदत्त पांडे और विक्टर मोहन जोशी आदि की देखरेख में चलाया गया जिसमें गोविंद बल्लभ पंत की भी भागीदारी रही. कुली बेगार के आंदोलन की सफलता से अंग्रेजी हुक्मरान बौखला गए और समाज में अपनी पकड़ बनाने के लिए सल्ट की चार पट्टियों और गुजुड़पट्टी पौड़ी से जो बीहड़ और सरकारी लूट खसौट के लिए मशहूर थे, से बेगार वसूली तथा प्रभुत्व स्थापन के लिए एस. डी. एम रानीखेत हबीबुर्रहमान को सल्ट के लिए रवाना किया!एस. डी.एम के सल्ट पहुंचने से पहले ही हरगोविंद पंत सल्ट क्षेत्र में पहुंच गए. वहां उन्होंने पुरुषोत्तम उपाध्याय( सरकारी विद्यालय में अध्यापक) से संपर्क किया और पूरे सल्ट क्षेत्र में तथा गुजुड़पट्टी पौड़ी क्षेत्र में बहुत व्यापक जनसंपर्क कर, लोगों के बीच चेतना पैदा की कि सरकार को बेगार न दे . इस प्रकार पुरुषोत्तम उपाध्याय, उनके सहयोगी अध्यापक लक्षमण सिंह अधिकारी और ठेकेदार पान सिंह पटवाल सल्टक्षेत्र में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ असहयोग तथा राष्ट्रीय चेतना जागरण के मुख्य संवाहक बन गए. पुरूषोत्तम उपाध्याय का घर खुमाड़ में था. इसी कारण खुमाड़ सल्ट क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्यालय बन गया. पुरुषोत्तम उपाध्याय तथा उनके साथियों ने सल्ट क्षेत्र में अछूतोद्धार, सफाई और शिक्षा के क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहकर कार्य किया जिस कारण सरकारी नौकरी में बने रहना उनके लिए उसके बाद संभव नहीं था. फलतः पुरूषोत्तम उपाध्याय ने फरवरी 1927 नौकरी छोड़ दी. मई 1927 में प्रेम विद्यालय ताड़ीखेत के वार्षिकोत्सव में महात्मा गांधी पहुंचे तो पुरुषोत्तम उपाध्याय अपने सहयोगी पान सिंह पटवाल आदि के साथ महात्मा गांधी से मिलने ताड़ीखेत गए. महात्मा गाधी ने सल्ट के सत्याग्रहियों की खूब तारीफ की जिससे आन्दोलनकारियों का उत्साह दोगुना हो गया और समूचे सल्ट क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन की चेतना उफान पर पहुंच गई.1927 में ही कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन मेंं पुरूषोत्तम उपाध्याय ने भाग लिया. जिसके बाद सल्ट क्षेत्र स्वाधीनता आन्दोलन में सीधे राष्ट्रीय धारा से जुड़ गया और कांग्रेस के राष्ट्रीय आह्वान का सीधा असर सल्ट क्षेत्र में दिखाई देने लगा.अप्रैल 1930 में नमक आन्दोलन के प्रभाव में सल्ट के भी तीन गांव – चमकना, उभरी और हुटली में भी नमक बनाया. सल्ट क्षेत्र में स्वाधीनता आन्दोलन के चरम का वर्ष 1930 ही था जब वन-आन्दोलन के सत्याग्रह में भी यहां के लोगों ने भागीदारी की. मालगुजार ही सल्ट के बीहड क्षेत्र में अंग्रेजी हुकूमत के स्रोत थे.वर्ष 1942 में खुमाड़ सल्ट तथा सालम में जिस विद्रोह का प्रस्फुटन हुआ, उसकी पृष्ठभूमि को समझने के लिए कुमाऊं में ब्रिटिश राज के इतिहास को समझना भी आवश्यक है.सन 1815 में ब्रिटिश-गोरखा युद्ध में गोरखा की पराजय से नेपाल संधि से कुमाऊं में ब्रिटिश शासन स्थापित हुआ.जिसका संचालन तीन कमिश्नरों ट्रेल,जे.एच.बैरन तथा हेनरी रैम्जे करते थे। उस वक्त कुमाऊं का अधिकांश क्षेत्र, जहां आबादी निवास करती थी. बीहड़ पर्वतीय क्षेत्र था और 90 प्रतिशत क्षेत्र में जंगल थे. लगान में यहां अंग्रेजों की रुचि नहीं रही, इस कारण समाज की आन्तरिक व्यवस्था में भी अंग्रेजों द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया गया. इस कारण 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में काली कुमाऊं (चम्पावत), हल्द्वानी भाबर को छोडकर समूचा क्षेत्र लगभग शांत रहा. काली कुमाऊं चम्पावत में कालू सिंह मेंहरा, आनन्द सिह फर्त्याल, बिशन सिंह करायत जो कि बिशंग पट्टी से थे और रूहेलखंड के नबाब के संपर्क में थे, ने बागी दल बनाकर बगावत का बिगुल फूका और लोहाघाट में ब्रिटिश बैरक में हमला किया. खबर अल्मोड़ा में हमला करने की भी थी जिस कारण ब्रिटिश परिवार सुरक्षा की दृष्टि से नैनीताल आ गए. बागी दल के विद्रोह को सहायक कमिश्नर सर कैल्विन ने काबू कर लिया. आनन्द सिंह फर्त्याल और बिशन सिंह करायल को गोली मार दी गई, जबकि कालू सिंह महर को भेदिये की मदद से बाद में गोली मार दी गई. 1868 में अल्मोड़ा में साम्य विनोद अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ और 1871 में अल्मोड़ा से ही अल्मोड़ा अखबार का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ. इसके संपादक कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी और राम सिंह धौनी हुए, जो कि सभी प्रगतिशील विचारो के थे. सामाजिक कुरीतियों छूआछूत उन्मूलन और शिक्षा के विस्तार में चेतना का कार्य इस अखबार द्वारा किया और इस क्षेत्र को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोडने में महत्वपूर्ण योगदान देकर स्वतंत्रता संग्राम की चेतना का विस्तार किया, जो आगे चलकर कुमाऊं परिषद 1917 के गठन के रुप में दिखाई दिया. कुमाऊं परिषद का विलय कालान्तर में राष्ट्रीय कांग्रेस में हुआ. परिषद के श्री हरगोविन्द पन्त तब सम्मानित नेता थे, जो लगातार क्षेत्र में भ्रमणशील रहकर युवाओं को विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों के माधयम से परिषद और कांग्रेस से जोड जोड रहे थे. अंग्रेज पुलिस कप्तान गोली चलाना चाहते थे लेकिन एस.डी. एम ने जमीनी हकीकत समझ गोली चलाने से मना कर दिया. यह सल्ट के ग्रामीणों की नैतिक विजय थी लेकिन इस घटना से क्षेत्र में व्यापक असंतोष व्याप्त हुआ. पान सिंह पटवाल ने इसके विरोध में मोलेखाल के टीले में बैठक कर स्वयं की सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तारी देने की घोषणा की और एस.डी. एम को नोटिस दिया. एस.डी.एम. हालात पर नजर रखने देवालय पहुंच गया. यहाँ पुलिस कप्तान को कुर्सी नहीं दी गई.
खुमाड़ में पुरुषोत्तम उपाध्याय के घर बैठक कर यह निर्णय लिया गया कि जिन सत्याग्रहियों के विरुद्ध वारंट हैं वे स्वयं अपनी गिरफ्तारी देंगे और लक्ष्मण सिंह अधिकारी बाहर रहकर आंदोलन की रणनीति बनाते रहेंगे. इस सहमति के आधार पर पुरुषोत्तम उपाध्याय, धर्म सिंह, चंदन सिंह आदि सत्याग्रही 24 अक्टूबर 1930 को बड़े जुलूस के साथ गिरफ्तारी देने रानीखेत को रवाना हुए.रास्ते में डूंगला गांव में जसोद सिंह ने सत्याग्रहियों का भव्य स्वागत किया.दूसरे दिन सत्याग्रह का जुलूस भारतीयों के लिए प्रतिबंधित माल रोड में पहुंचा.जहां सत्याग्रहियों ने अपनी गिरफ्तारी दी. स्वयं गिरफ्तारी से क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम के प्रति व्यापक चेतना का विकास हुआ और समझा जाने लगा कि ब्रिटिश हुकूमत अब थोड़े दिनों की मेहमान है.अन्य क्षेत्रों में भी आन्दोलन का विस्तार किया गया. 30 नवम्बर 1930 को जंगल सत्याग्रह में गिरफ्तारी देने को पुरुषोत्तम उपाध्याय के नेतृत्व में 404 सत्याग्रहियों का दल मौलेखाल पहुंचा. पुरुषोत्तम उपाध्याय सहित 58 सत्याग्रही गिरफ्तार किये गयै लेकिन कोई केस नहीं बनाया गया. पहले उन्हें काशीपुर हवालात में रखा गया फिर मुरादाबाद जेल भेज दिया गया. रिहाई के बाद पुरुषोत्तम उपाध्याय 16 मार्च 1931 को खुमाड़ पहुंचे. फरवरी 1932 में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया जहां, दिसंबर 1932 में गले की बीमारी के कारण बरेली जेल में उनका देहांत हो गया.पुरुषोत्तम उपाध्याय की मृत्यु से सल्ट क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन की गति में कमी आ गई.फरवरी 1939 में खुमाड़ में रघुवर दत्त उपाध्याय,हरिदत्त वैद्य,लालमणि आदि ने विशाल सभा कर संकल्प लिया कि स्वर्गीय पुरुषोत्तम उपाध्याय के सपने पूरे किये जाएगें और उनके अधूरे काम आगे बढ़ायै जाएगे. सल्ट क्षेत्र में आन्दोलन की सक्रियता से अंग्रेज चौकन्ने हो गए. उन्होंने 7 मार्च 1939 को देवालय में रघुवर दत्त उपाध्याय, हरिदत्त भट्ट, लक्ष्मण सिंह आदि को गिरफ्तार कर लिया जबकि क्वैराला में लक्षमण सिंह तथा हरिद्वारी गिरी को गिरफ्तार किया. पूरे सल्ट क्षेत्र में इस अवधि में राजनीतिक चेतना बढ़ती गई.देघाट क्षेत्र में भी भारी विरोध था. एस.डी.एम. जानसन के देघाट पटवारी चौकी में 19 अगस्त 1942 को 7-8 आन्दोलनकारी बंद कर दिए जाने की खबर क्षेत्र में आग की तरह फैल गई, पटवारी चौकी का जबरदस्त घेराव हुआ. जानसन ने गोली चला दी जिससे दो व्यक्ति शहीद हुए – हरि कृष्ण उप्रेती और हीरामणि बडोला. हीरामणि अविवाहित थे. 1 सितंबर 1942 को 20-25 सत्याग्रहियों द्वारा 4-5 सितंबर 1942 को पोबरी में एकत्रित होने तथा आगे की रणनीति पर कार्य करने की योजना बनाई गयी. इस योजना से रानीखेत में तैनात एस.डी.एम जानसन के कान खड़े हो गए और वह 3 सितंबर 1942 को पुलिस पेशकार तथा लाइसेंस दारान के कोई 200 का सशस्त्र जत्था लेकर भिक्यासैण, चौकोट, देघाट होकर खुमाड़ के लिए बढ रहा था.रास्ते में लोगो ने इस दल का विरोध किया तो चौकोट में गोली चला दी गई. देघाट में सैकडो की संख्या में लोग सड़क पर आ गए थे. जानसन ने यहां पहले ही बडी गोलीबारी की थी जिससे देघाट में दो लोगो की गोली लगने से मौत हो गई थी. इस घटना से जन असंतोष पहले से ही उफान पर था.जब जानसन का यह खूनी जत्था खुमाड़ पहुंचा तो क्षेत्र के लोग अपने आप खुमाड़ पहुंच गए जहां हजारों की संख्या में आक्रोशित ग्रामीण अंग्रेजों से पहले पहुंच गए. 5 सितम्बर 1942 को अल्मोड़ा केखुमाड़ पहुंचने पर उत्साह और आक्रोश से भरे ग्रामीणो का मेला सा लगा था. उत्साही युवक गोविंद ध्यानी ने जत्थे का रास्ता रोक, नारेबाजी शुरु कर दी. माहौल उत्तेजना पूर्ण हो गया.एस.डी.एम जानसन ने सत्याग्रहियों का पता मालूम करने के लिए गोली चलाने तथा गांव में आग लगाने की धमकी दी तो उत्तेजना और बढ़ गई. इसी बीच नैनमणी उर्फ नैनुआ ने जानसन पर हमला कर उसकी पिस्टल छीनने का प्रयास किया तो जानसन ने गोली चलाने का आदेश दे दिया. सरकारी दल में अधिकांश सिपाही और लाइसेंसदार स्थानीय थे. इस कारण उन्होंने सीधे गोलीबारी न कर हवा में गोलियां चलाईं. यह देख जानसन ने स्वयं सीधे गोलियां चलाई जिससे कई लोग जख्मी हुए. गंगाराम और खीमराम जो कि दो सगे भाई थे, की मौके पर मृत्यु हो गई. 4 दिन बाद गोली लगने से घायल चूड़ामणि और बहादुर सिंह की भी मृत्यु हुई. जनाक्रोश के आगे जानसन को भी वापस लौटना पड़ा. सल्ट क्षेत्र का नाम आजादी की लड़ाई में बड़े गर्व से लिया जाता है. उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी ने खुमाड़ को कुमाऊं की वारदोली कहा था.देश की आजादी में हमारे शहीदों का अभूतपूर्व योगदान है, जिसे भुलाया नही जा सकता है। शहीदों को हमारी सच्ची श्रद्धाजंलि तभी सिद्ध होगी जब हम उनकी भावनाओं के अनुरूप क्षेत्र के विकास के लिए संगठित होकर कार्य करेंगे।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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