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पलायन को धता बताता उत्तरकाशी का बार्सू गांव

20/02/20
in उत्तरकाशी, उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
खेती जो खुशहाली लाए उत्तरकाशी जिले के भटवाड़ी ब्लाक का एक ऐसा गांव, जिसे जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर होने पर भी वहां के लोगों ने स्वप्रयासों से मॉडल के रूप में ढाल दिया। 160 परिवारों वाले इस गांव का नाम है बार्सू। खासियत यह कि गांव से आज तक एक भी परिवार ने पलायन नहीं किया। यहां ग्रामीण कृषि, बागवानी, मौन पालन, मछली पालन व भेड़ पालन ही नहीं, पर्यटन व ट्रेकिंग से भी जीवन को खुशहाल बना रहे हैं। बार्सू उत्तरकाशी के प्रसिद्ध दयारा बुग्याल का बेस कैंप भी है। यहीं से होते हुए पर्यटक छह किलोमीटर दूर दयारा बुग्याल की ट्रेकिंग करने के लिए जाते हैं।
गांव के सात परिवार पूरी तरह पर्यटन व ट्रेकिंग के व्यवसाय से जुड़े हैं। इसमें से तीन परिवार गांव में गेस्ट हाउस चलाते हैं। ख़ास बात ये है कि गांव के 90 फीसदी परिवार सब्जियों का उत्पादन करते हैं। 60 परिवारों ने तो सब्जी उत्पादन के लिए गांव में पॉलीहाउस भी बनाए हुए हैं। गांव में आलूए राजमा और चौलाई की अच्छी पैदावार होती है। एक सीजन में इस गांव के लोग 90 ट्रक आलू और 500 कुंतल राजमा का उत्त्पादन होता है जो कि अचंभित करने वाला आंकड़ा है। बार्सू कृषि, बागवानी व ईको टूरिज्म के लिहाज से महत्वपूर्ण गांव है। गांव के विकास में ग्रामीणों की बड़ी भूमिका है। यही वजह है कि गांव से आज भी एक भी परिवार ने पलायन नहीं किया है। भटवाड़ी की पूर्व प्रमुख विनीता रावत के अनुसार गांव के सड़क से जुड़े होने के बावजूद यहां इंटर कॉलेज न होना काफी अखरता है। गांव के बच्चों को आठवीं से आगे की शिक्षा के लिए सात किलोमीटर दूर भटवाड़ी जाना पड़ता है। बार्सू निवासी एवं भटवाड़ी ब्लाक की पूर्व प्रमुख विनिता रावत बताती हैं कि बार्सू के कुछ लोग पहले उद्यान विभाग और कृषि विभाग में थे। इन्हीं की बदौलत गांव के लोग कृषि व बागवानी के प्रति आकर्षित हुए। वर्तमान में जबकि कई लोग रोजगार और शिक्षा के लिए पलायन कर रहे लेकिन इस गांव का हर परिवार कृषि व पशुपालन से अपनी आर्थिकी संवार रहा है। हम तो कहते हैं ऐसे गांव को पुरिस्कृत किया जाना चाहिएत्रिवेंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण फैसला लेते हुये पारंपरिक फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य और मार्केटिंग के लिए 10 करोड़ का रिवाल्विंग फंड को मंजूरी देकर प्रदेश के किसानों को बड़ी राहत दी है। अब इससे किसानों को फसलों का उचित दाम मिलेगा। तो वहीं, मार्केटिंग के लिए बिचौलियों से छुटकारा मिलेगा।
बता दे कि उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड सीधे किसानों से फसलें खरीदेगा और प्रोसेसिंग कर उसे आगे बेचेगा राजमा 7920 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गयाकिसानों की दोगुनी आय के संकल्प को पूरा करने के लिए सरकार ने यह फैसला लिया है। वही कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल, जो कृषि एवं उद्यान मंत्री है राज्य के उन्होंने कहा कि अब न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होने से किसानों को अपनी फसल का सही मूल्य मिलेगा। साथ ही किसानों के सामने उत्पादन बेचने की समस्या नहीं रहेगी। आने वाले समय में सरकार के इस फैसले से आप देखिएगा आपको कृषि क्षेत्र में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा। बहराल अच्छा है सरकार का ये प्रयास ये सोच बस सरकार बंदरों, सुवरो से बर्बाद होती फसलो के लिए कोई रास्ता निकले, जो लोग खेती करना चाहते है पर पानी की जहा बड़ी समस्या है और सिर्फ मोसम पर ही निर्भर रहना पड़ता है वहा पानी की समस्या। दूर हो जाये। तो एक ये खेती ही है जो पलयान पर लगाम लगा सकती है। और दूसरा कोई उपाय नहीं। पर्वतीय इलाकों उगाए जाने वाले 100ः हर्बल उत्पाद में राजमा प्रोटीन से लबरेज होता है। जिसे पर्वतीय इलाकों मे छेमी के नाम से जानते हैं। इसके लिए सरकार को प्रयास करना चाहिए की कास्तकार अपने उत्पाद आसानी से बाजार तक पहुंचा सके पर्वतीय इलाकों में बीते सीजन में हुई अच्छी बर्फबारी से कास्तकारों के चेहरे खिले हुए हैं। जिसके कारण इस सीजन में मोरी के सीमांत गांवों में फसल की बंफर पैदावार हुई है। अच्छी पैदावार के बाद लोग राजमा, चौलाई, सोयाबिन, उड़द, लोबिया, फाफरा, आलू सहित बारह अनाज को सुखाने के बाद बाजार में लाने की तैयारी में जुटे हैं। राजमा के नाम से बिकने वाली हरकी दून घाटी की राजमा की बाजारों में खूब डिमांड है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक यहां होने वाली राजमा में कृषि रसायनों का प्रयोग नहीं होता। जो पूरी तरह से जैविक है। जौनसार के किसानों ने बताया कि राजमा को बनाने के लिए रात भर भिगाने की भी जरूरत नहीं होती, लेकिन वर्तमान में देखने में आ रहा है कि राजमा की फसल में फूल आते ही इसमें रोग लग रहा है। जिससे पूरा पौधा सूख जाता है। गाता चकराता के पूर्व प्रधान मातवर सिंह ने बताया कि जौनसार बावर क्षेत्र में राजमा की फसल में रोग लगने से इसका उत्पादन घटता जा रहा है। गोठाड चकराता के बाबूराम डोभाल बताते हैं कि समय पर बारिश न होने से किसानों को इसके उत्पादन में दिक्कत आ रही है। राजमा की खेती उत्तराखण्ड में बहुतायात से नकदी फसल के रूप में की जाती है। उत्तराखण्ड में लगभग 4000 हैक्टेयर में 6ण्73 कुन्तल प्रति हैक्टेयर की दर से राजमा का उत्पादन किया जाता है।जैविक बाजार में पहाड़ी राजमा की बहुत अधिक मांग है।

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