डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड जैसा हिमालय राज्य जहां पर लगभग 71 प्रतिशत वन क्षेत्र है, जिसमे 45 प्रतिशत डेंस फॉरेस्ट एरिया है. राज्य में लगातार तेजी से विकास हुआ है, तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा हुआ है, लेकिन इस तेजी से विकास की दौड़ में जंगलों का कटान भी तेजी से हुआ है. फिर चाहे चार धाम ऑल वेदर रोड हो, राज्य में बड़ी छोटी जल विद्युत परियोजनाएं हो, या फिर नेशनल हाईवे, स्टेट हाईवे या फिर जिला हाईवे के अलावा और अन्य सड़क मार्ग को बनाने के लिए पेड़ों की कटाई हुई है.उत्तराखंड देवभूमि है. यहां देवी देवताओं का वास है. ऐसे में उत्तराखंड में प्रकृति की भी पूजा होती है.पर्यावरण प्रेमियों ने कहा प्रकृति और पर्यावरण एक दूसरे से जुड़े हुये हैं. जंगलों का कटान नहीं होना चाहिए. उत्तराखंड के पौड़ी शहर में मुख्यमंत्री घोषणा पर अमल करते हुए प्रशासन ने बुआखाल से सर्किट हाउस तक करीब सात किलोमीटर लंबे मोटरमार्ग के चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण की तैयारी शुरू कर दी है. परियोजना के प्रथम चरण में सड़क चौड़ीकरण के लिए सर्वे का काम किया जा रहा है. इसी सर्वे के दौरान सड़क की जद में आने वाले पेड़ों की गणना भी की जा रही है. बताया जा रहा है कि बुआखाल से सर्किट हाउस तक प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण की जद में करीब हजारों पेड़ आ सकते हैं.बड़ी संख्या में पेड़ों के प्रभावित होने की सूचना के बाद पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है. उनका कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन का भी ध्यान रखा जाना जरूरी है. वहीं, वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार फिलहाल पेड़ों के कटान की कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है. वन विभाग को बुआखाल से सर्किट हाउस तक सड़क चौड़ीकरण से संबंधित प्रस्ताव प्राप्त हुआ है. लोक निर्माण विभाग और वन विभाग की ओर से संयुक्त रूप से सर्वे कराया जा रहा है. सर्वे के दौरान यह चिन्हित किया जा रहा है कि सड़क चौड़ीकरण की जद में कितने पेड़ आ रहे हैं. सड़क चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण की इस योजना से जहां शहर में यातायात व्यवस्था बेहतर होने और सड़क को सुविधाजनक बनाने की उम्मीद है, वहीं हजारों पेड़ों के संभावित प्रभावित होने से पर्यावरण संरक्षण को लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं.पौड़ी में बुआखाल से सर्किट हाउस तक प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण को लेकर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकती है. ऐसे में जहां ट्रैफिक न के बराबर है, वहां इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों को काटकर सड़क चौड़ी करने की जरूरत पर पर्यावरण प्रेमी ने सवाल खड़े किए हैं. पर्यावरण प्रेमी का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण के नाम पर यदि हजारों पेड़ों की कटाई की जाती है तो इसका सीधा असर पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी पर पड़ेगा.उन्होंने चेतावनी दी कि आज विकास के नाम पर काटे जा रहे पेड़ों का खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है. उन्होंने प्रशासन और संबंधित विभागों से अपील की कि सड़क चौड़ीकरण की आवश्यकता और उपयोगिता का गंभीरता से आकलन किया जाए व परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले पर्यावरणीय प्रभावों पर भी विशेष ध्यान दिया जाए. सड़क चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण की इस योजना से जहां शहर में यातायात व्यवस्था बेहतर होने और सड़क को सुविधाजनक बनाने की उम्मीद है, वहीं हजारों पेड़ों के संभावित प्रभावित होने से पर्यावरण संरक्षण को लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं. आज विकास के नाम पर काटे जा रहे पेड़ों का खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है. उन्होंने प्रशासन और संबंधित विभागों से अपील की कि सड़क चौड़ीकरण की आवश्यकता और उपयोगिता का गंभीरता से आकलन किया जाए व परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले पर्यावरणीय प्रभावों पर भी विशेष ध्यान दिया जाए. जैसे-जैसे विकास की गति बढ़ रही है, उत्तराखंड में बुनियादी ढांचे के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है. उत्तराखंड की देवभूमि इस समय एक बड़ी समस्या से गुजर रही है. एक तरफ पर्यटन के लिए सड़कों का जाल बिछाने का विकास मॉडल है, तो दूसरी तरफ हिमालय के अस्तित्व को बचाने की पर्यावरण की पुकार. हिमालय बहुत संवेदनशील पर्वत श्रृंखला है. 9000 फीट की ऊंचाई पर इस तरह पेड़ों का काटना बेहद गलत है क्योंकि लगातार वैज्ञानिक इस बात को बता रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है. तापमान बढ़ रहा है, जहां बर्फबारी होनी चाहिए वहां बारिश हो रही है. सड़क चौड़ीकरण या फिर अन्य निर्माण के लिए पेड़ो की बलि आने वाले समय के लिए बड़ा खतरा है. हिमालय को बचाना है तो यहां की जैव विविधता को बचाना होगा. अगर ऊंचाई पर पेड़ टिके रहेंगे तो हिमालय पर ग्लेशियर भी टिके रहेंगे.” पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि केवल पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें पेड़ बनने तक संरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है. लगातार घटती हरियाली और बढ़ती निर्माण परियोजनाओं के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. .लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.









