डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
डा० डी०डी० पन्त, जिनका पूरा नाम देवी दत्त पन्त था, उनका जन्म आज के पिथौरागढ जिले के गणाईगंगोली से आगे बनकोट के पास एक गांव देवराड़ी पन्त में 14 अगस्त, 1919 को श्री अम्बा दत्त पन्त जी के घर जन्म हुआ। इनके पिता एक वैद्य थे प्रो. पन्त का जन्म 1919 में आज के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ गांव देवराड़ी में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई। पिता अम्बा दत्त वैद्यकी से गुजर-बसर करते थे। बालक देवी की कुशाग्र बुद्घि गांव में चर्चा का विषय बनी तो पिता के सपनों को भी पंख लगने लगे। किसी तरह पैसे का इंतजाम कर उन्होंने बेटे को कांडा के जूनियर हाईस्कूल और बाद में इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा भेजा। अल्मोड़ा तक आजादी की लड़ाई की आंच पहुंच चुकी थी। देवी दत्त को नई आबोहवा से और आगे जाने की प्रेरणा मिली।धर के माली हालात आगे पढ़ने की इजाजत नहीं देते थे। तभी पिता के एक मित्र बैतड़ी (सीमापार पश्चिमी नेपाल का एक जिला) के एक संपन्न परिवार की लड़की का रिश्ता लेकर आए। पिता-पुत्र दोनों को लगा कि शायद यह रिश्ता आगे की पढ़ाई का रास्ता खोल दे। इस तरह इंटरमीडिएट के परीक्षाफल का इंतजार कर रहे देवीदत्त पढ़ाई का रास्ता खुलने की आस में दांपत्य जीवन में बंध गए।इंटरमीडिएट के बाद देवी दत्त ने बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी में दाखिला लिया। यहां से उन्होंने भौतिकविज्ञान में मास्टर्स डिग्री पाई। ख्यातिनाम विभागाध्यक्ष प्रो. आसुंदी को इस प्रतिभाशाली गरीब छात्र से बेहद स्नेह था। देवी भी उन्हीं के निर्देशन में पीएच.डी. करना चाहते थे। प्रो. आसुंदी ने वजीफे के लिए तत्कालीन वाइस चांसलर डा. राधाकृष्णन से मिलने का सुझाव दिया। पन्त डा. राधाकृष्णन के पास अपनी अर्जी लेकर पहुंचे। बड़ा रोचक प्रसंग है। राधाकृष्णन स्पांडिलाइटिस के कारण आरामकुर्सी पर लेट हुए काम कर रहे थे। पन्त की अर्जी देकर उनका जायका बिगड़ गया। बोले- आसुंदी अपने हर छात्र को स्कॉलरशिप के लिए मेरे पास भेजे देते हैं। हमारे पास अब पैसा नहीं है। निराश देवी दत्त वापस लौट आए। आसुंदी ने उन्हें ढाढ़स बंधाया और बेंगलूर में रमन साहब के पास जाकर रिसर्च करने का निर्देश दिया। इस तरह द्योराड़ी का देवी दत्त महान वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन का शिष्य बन गया। यद्यपि उनका पीएच़डी़ रजिस्ट्रेशन बीएचयू में प्रो. आसुंदी के साथ ही था। शोधकार्य पूरा होने पर देवी दत्त को डी.एससी. की उपाधि मिली। स्पेक्ट्रोस्कोपी में उनके योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया। इनमें अमेरिका का प्रतिष्ठित सिगमा-साई अवार्ड, इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस की फैलोशिप, रमन सेंटेनरी अवार्ड, आसुंदी सेंटेनरी अवार्ड आदि को गिना जा सकता है। नैनाताल परिसर की फोटोफिजिक्स लैब एक तरह से प्रो. पन्त के नाम से देश की विज्ञान बिरादरी में जानी जाती है। प्रो. पन्त को इस लैब से बेहद प्यार था। फोटोफिजिक्स लैब प्रो. पन्त के लिए जीवनीशक्ति से कम नहीं थी। अपनी अधूरी आत्मकथा की भूमिका में उन्होंने लिखा है, ‘‘मेरी आकांक्षा मृत्युपर्यन्त काम में लगे रहने की है। परिस्थितियों के घेरे में सम्भवत: लैब में आता ही रहूंगा। जमीन से तेल ड्रिल करने वाली कम्पनियां कहती हैं यदि तेल निकलना बंद हो जाय तो बोर करना बन्द कर दें। इस नियम का यथासंभव पालन मैं करना चाहूंगा। पर तेल न निकलता हो तो भी बोर तो चलाना ही पड़ेगा, इस आशा में कि शायद कुछ निकले ही।’’ लेकिन नियती को कुछ और मंजूर था। रहस्यमय परिस्थितियों में एक दिन फिजिक्स डिपार्टमेंट का पूरा भवन आग की भेंट चढ़ गया। संभवत: यह फोटोफिजिक्स लैब के अवसान की भी शुरुआत थी। कई वर्षों तक अस्थाई भवन में लैब का अस्तित्व बनाए रखने की कोशिश की गई। बाद में फिजिक्स डिपार्टमेंट के भवन का पुनर्निर्माण हुआ तो फोटोफिजिक्स लैब को भी अपनी पुरानी जगह मिल गई। लेकिन अब इसका निश्चेत शरीर ही बाकी था, आत्मा तो शायद आग के साथ भस्मीभूत हो गई। प्रो. पन्त का स्वास्थ्य भी अब पहले जैसा नहीं रहा। वह नैनीताल छोड़ हल्द्वानी रहने लगे। इस लैब ने कई ख्यातनाम वैज्ञानिक दिए और कुमाऊं जैसे गुमनाम विश्वविद्यालय की इस साधनहीन प्रयोगशाला ने फोटोफिजिक्स के दिग्गजों के बीच अपनी खास जगह बनाई।जिस किसी को प्रो. पन्त के साथ काम करने का सौभाग्य मिला, वह उनकी बच्चों जैसी निश्छलता, उनकी बुद्घिमत्ता, ईमानदारी से सनी उनकी खुद्दारी और प्रेम का मुरीद हुए बिना नहीं रहा। निराशा जैसे उनके स्वभाव में थी ही नहीं। चाहे वह रिसर्च का काम हो या फिर कोई सामाजिक सरोकार, प्रो. पन्त पहल लेने को उतावले हो जाते थे। अपने छात्रों को वह अक्सर उनके चुप बैठे रहने पर लताड़ते और सामाजिक सरोकारों के लिए आवाज उठाने को कहते। गांधी के विचारों को उनकी जुबान ही नहीं, जीवन में भी पैठे हुए देखा जा सकता है। जो कहते वही करते और ढोंग के लिए वहां कोई जगह नहीं थी। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर आप अपने विचारों पर दृढ़ रहें तो हताशा, निराशा और दु:ख मुश्किल से मुश्किल हालात में भी आपको नहीं घेरेंगे। समय के सूक्ष्मतम हिस्सों के पारखी इस विज्ञानी ने उत्तराखंड के अच्छे समय के लिए अपना जीवन तभी से खपाना शुरू कर दिया, जब सीवी रमन के भारतीय मौसम विज्ञान विभाग में वैज्ञानिक बनने के प्रस्ताव को ठुकराया। उत्तराखंड के आम आदमी के विकास के लिए चिंतित इस विज्ञानी को अनेक सम्मान मिले। 1960-61 में फुलब्राइट फैलोशिप, 1969 में अमेरिका की सिग्मा-साई फैलोशिप, इंडियन अकादमी ऑफ बंगलौर की फैलोशिप, सीवी रमन सेंटेनरी सम्मान, पहला आसुंदी सेंटेनरी सम्मान, लेकिन तत्कालीन कुलाधिपति से वैचारिक मतभेद के चलते विवि के कुलपति से इस्तीफा देने के बाद जिस प्रकार जनता आंदोलित हुई और कुलाधिपति को अपना कदम पीछे खींच उन्हें दोबारा यह दायित्व दिया गया, वह सम्मान निश्चितरूप से अप्रतिम कहा जाएगा। आणविक भौतिकी को पंत किरण से जगमगाने वाले उत्तराखंड के महान वैज्ञानिक प्रो. डीडी पंत की मेधा को सम्मान देने वाली पूरी दुनिया के इतर भारत ने उन्हें भुला दिया है। नोबल पुरस्कार से सम्मानित महान वैज्ञानिक सीवी रमन के प्रिय शिष्य रहे पंत का यह जन्म शताब्दी वर्ष है, जिसकी खबर उत्तराखंड सरकार ने ली न केंद्र सरकार ने।विज्ञान के आविष्कारों के अलावा पंत के योगदान शिक्षा के उन्नयन में भी कम नहीं हैं। 1973 में स्थापित कुमाऊं विश्वविद्यालय को इसके पहले कुलपति के रूप में अपनी विस्तृत दृष्टि से उन्होंने जिस प्रकार देश-दुनिया में विख्यात किया, अब तक की राज्य सरकारें उसी का संज्ञान ले लेतीं तो वैज्ञानिक, ब्यूरोक्रेट, शिक्षाविद, ईमानदार नागरिकों की भावी खेप निरंतर प्राप्त होती रहती। यूरेनियम के लवणों की स्पेक्ट्रोस्कोपी पर हुए इस शोध पर अब तक लिखी गई सबसे चर्चित पुस्तक फोटोकेमिस्ट्री ऑफ यूरेनाइल कंपाउंड, ले. राबिनोविच एवं बैडफोर्ड में दर्जनों बार पंत के काम का वर्णन पंत की महानता को ही दर्शाता है। यह वही पुस्तक है, जिसे भौतिकी का बाइबिल भी कहा जाता है। उन्होंने अमेरिका में अपना भविष्य तलाशने के बजाय अपने देश में रहकर काम करने को प्राथमिकता दी. उनकी पहली महिला शोध छात्रा इस पर विस्तार से बताते हुये कहती हैं- ‘प्रतिदीप्ति’) पर दुनिया में पहला शोध प्रो. पंत जी ने ही किया. प्रतिदीप्ति किसी पदार्थ का वह गुण है जिसके कारण वह अन्य स्त्रोतों से निकले विकिरण को अवशोषित कर तत्काल उत्सर्जित कर देता है. इसके परीक्षण के लिये हमें मद्रास जाना पड़ा. इस कार्य को देखकर वहां के वैज्ञानिक आश्चर्यचकित रह गये. इस शोध ने वैज्ञानिक जगत में हलचल मचा दी. उसके तीन साल बाद तीन वैज्ञानिकों को इस पर नोबेल पुरस्कार मिला. ऐसे में यह विचारणीय है कि यदि पंत जी को भारत में ऐसी सुविधा मिल जाती या वे स्वयं अमेरिका चले गये होते तो निश्चित रूप से अपने गुरु प्रो. सीवी रमन के बाद यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले डीडी पंत दूसरे भारतीय वैज्ञानिक होते.यूरेनियम के लवणों की स्पेक्ट्रोस्कोपी पर हुये शोध पर राबिनविच एवं वेल्डफोर्ड की सबसे चर्चित पुस्तक ‘फोटोकेमिस्ट्री ऑफ यूरेनाइल कंपाउंड’ जिसे भौतिकी की बाइबिल कहा जाता है में प्रो. डीडी पंत के काम का दर्जनों बार जिक्र है. यह उनके काम को समझने के लिये काफी है. स्व. पंत ने उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए युवाओं के साथ मिलकर उत्तराखंड क्रांति दल का गठन किया। दल के संस्थापक अध्यक्ष बनकर राज्य आंदोलन की शुरुआत की डा० पन्त जी की इकोलाजी के साथ ही खेल, राजनीति और साहित्य में भी रुचि थी, वह स्माल इज ब्यूटीफुल के जबरदस्त समर्थक थे। 1979 में जब पृथक उत्तराखण्ड राज्य के लिये एक राजनीतिक दल बनाने की बात हुई तो वह तत्समय गठित उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के संस्थापक अध्यक्ष भी बने और उन्होंने भविष्य में राज्य निर्माण और उसके पुर्नगठन का भी खाका खींचा। अल्मोडा-पिथौरागढ़ लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा, लेकिन लोगों को नेता ही पसन्द आये और उदार सोच के पन्त जी चुनाव हार गये। डा० पन्त एक बहुआयामी तथा सरल व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे, यदि वह अपने ही देश में रहकर सेवा करने के लिये लालायित न होते तो अवश्य ही उनकी मेधा उनको नोबल पुरस्कार भी दिला सकती थी। यह वर्ष उनका जन्म शताब्दी वर्ष है, इस अवसर पर मेरा पहाड उनका सादर स्मरण करता है और सरकार से मांग करता है कि उनके नाम पर एक विश्वविद्यालय पिथौरागढ में खोला जाय, जिसमें उनके सारे शोध, शोध पत्र आदि का एक संग्रहालय भी बनाया जाय। हमारा समाज उनका ऋणी है. गांधी के रास्ते पर चलने वाले प्रो. पन्त का पारिस्थिकी में गहरा विश्वास है. वह अक्सर कहते हैं कि कुदरत मुफ़्त में कुछ नहीं देती और हर सुविधा की कीमत चुकानी पड़ती है. अपने जीवन में उन्होंने बहुत कम सुविधाएं इस्तेमाल कीं लेकिन बदले में उनकी जरूरत से ज्यादा कीमत चुकाई. दुनिया ने अपनाया और अपनों ने भुलाया प्रो. पन्त को. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.









