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भारत दुनिया का दूसरा बेर उत्पादक देश

26/02/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
बेर का वैज्ञानिक नाम ज़िज़िफस मौरिशियाना है जो कुछ हद तक खजूर के समान दिखता है और इसलिए दुनिया भर में रेड डेट लाल खजूर, चाइनीज़ डेट, चीनी खजूर, कोरियन डेट, कोरियाई खजूर आदि के रूप में भी जाना जाता है। इस फल का पेड़ छोटा तथा सदाबहार झाड़ी के रूप में होता है, बेर में बहुत कम मात्रा में कैलोरी होती है, लेकिन ये ऊर्जा का एक बहुत अच्छा स्त्रोत है। इसमें कई प्रकार के पोषक तत्व, विटामिन और लवण पाए जाते हैं। समुद्र तल से लगभग 740-1400 मी0 तक की ऊॅचाई वाले शुष्क क्षेत्र में उगने वाले इस फल की विश्वभर में लगभग 135 से 170 प्रजातियां पाई गयी हैं, जिसमें से प्रमुख 17 प्रजातियॉ तथा 90 उप प्रजातियां केवल भारत में पाई जाती है।

बेर की उत्पत्ति सामान्यतः एशिया के इण्डो मलेशियन क्षेत्र से मानी जाती है इसके अलावा यह भारत चीन, आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, अफ्रिका, अफगानिस्तान, ईरान, सीरिया, बर्मा, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, रूस में भी पाया जाता है। भारत में महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, कर्नाटक, आध्र प्रदेश, तमिलनाडू, पं0 बंगाल तथा असम आदि जगहों पर बेर का उत्पादन किया जाता है। प्रदेश में बेर का उत्पादन सामान्यतः बहुत कम किया जाता है। मगर बेर जंगलों से एकत्रित किया जाता है। भारत दुनिया का दूसरा बेर उत्पादक देश है तथा कुल 1 लाख हेक्टेयर भूमि में बेर का उत्पादन करता है। पंजाब में प्रति वर्ष लगभग 25000 है0 भूमि पर 42847 मैट्रिक टन बेर का उत्पादन किया जाता है, जबकि चीन ने वर्ष 2009 में 30,000 है0 क्षेत्र से लगभग 6 लाख मैट्रिक टन बेर का उत्पादन किया था।

विदेशों में बेर की विभिन्न प्रॅजातियों का वृहद मात्रा में व्यवसायिक उत्पादन भी किया जाता है।बेर में विभिन्न औषधीय रसायनों की प्रचूरता पायी जाती है, जिस कारण यह डाइरिया, अतिसार, लीवर, अस्थमा, रक्तचाप, त्वचा तथा मानसिक रोगों के इलाज में उपयुक्त पाया गया है। इसमें टेनिन्स, एल्केलॉइड्स, फ्लेलोनोइडस, फीनोल्स, सेपोनिन्स आदि पाये जाते हैं। औषधीय महत्व के साथ बेर पौषक गुणों से भी भरपूर है, इसमें प्रौटीन.0.8ग्रा0, फाइबर.0.6ग्रा0, आयरन.1.8मि0ग्रा0, केरोटीन.0.021 मि0ग्रा0, नियासीन. 0.9मिग्रा0, सिट्रिक एसिड. 1-1मि0ग्रा0, एस्कोर्बिक एसिड. 76.0 मि0ग्रा0, फ्लोराइड. 0.1.0.2 पी0पी0एम0 प्रति 100 ग्राम तक पाया जाता है।

फल के अलावा बेर की पत्तियों का औषधीय उपयोग तथा पशुचारे के लिए भी प्रयोग किया जाता है। इसकी लकडी की कठोरता को देखते हुए यह नाव बनाने, खम्भे बनाने तथा अन्य उपकरणों को बनाने में प्रयुक्त किया जाता है। बेर की छाल, जड, बीज आदि को भी विभिन्न औषधीय के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। बेर की पौष्टिकता को देखते हुए व्यवसायिक रूप से कच्चे फल के अलावा अचार, जैम, पेय पदार्थों, बेर मक्खन तथा क्रीम बनाने में भी किया जाता है। ऑन लाइन बाजार में बेर की कीमत रू0 200 प्रति किलो से रू0 300 प्रति किलो0 तक है। बरे की औषधीय, पौष्टिकता तथा व्यवसायिक महत्व को देखते हुए राज्य में भी बेर के व्यवसायिक उत्पादन की आवश्यकता है। फल हमारे दैनिक आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इनमें पाये जाने वाले पोषक तत्व हमारे शरीर का विकास करते हैं तथा हमारे स्वास्थ्य को उत्तम बनाये रखते हैं। मौसम चाहे कोई भी हो, फलों की आवश्यकता हमारे शरीर को हर दम होती है। बेर भी इन्हीं फलों में से एक है। प्रदेश में उच्च गुणवत्तायुक्त का उत्पादन कर देश, दुनिया में स्थान बनाने के साथ राज्य की आर्थिकी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में पलायान को रोकने का अच्छा विकल्प बनाया जा सकता है।

किसान इन फसलों से अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं। उत्तराखंड में तमाम कंपनियां और संस्थाएं यहां के जैव संसाधनों का व्यावसायिक इस्तेमाल कर रही हैं, मगर स्थानीय समुदाय को लाभांश में से हिस्सेदारी देने में वे आनाकानी कर रही हैं। दरअसल, उत्तराखंड में जैव विविधता अधिनियम लागू है। इसमें स्पष्ट प्रविधान है कि यहां के जैव संसाधनों का व्यावसायिक उपयोग करने वाली कंपनियां, संस्थाएं, व्यक्ति अपने सालाना लाभांश में से आधे से लेकर पांच फीसद तक की हिस्सेदारी स्थानीय ग्रामीणों के लिए देंगे। यह राशि उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड के माध्यम से ग्राम स्तर पर बनी जैव विविधता प्रबंधन समितियों बीएमसी तक पहुंचेगी, ताकि वे जैव संसाधनों का संरक्षण कर सकें। राज्य में 1256 कंपनियां व संस्थाएं जैव संसाधनों का व्यावसायिक इस्तेमाल कर रहीं, मगर तमाम प्रयासों के बाद भी इनमें से करीब सौ के लगभग ही लाभांश से हिस्सेदारी दे रही हैं। हालांकि, अब इस मुहिम में तेजी लाने की तैयारी है।

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