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उत्तराखंड की भागीरथी देवी ने बंजर जमीन पर खड़ा कर डाला जंगल

24/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भागीरथी देवी की दिनचर्या पिछले 25 वर्षों से एक जैसी ही रही है। वे सुबह तड़के उठकर अपने गांव मनार के पास के जंगल में गश्त लगाने निकल जाती हैं। दोपहर तक घर लौट आती हैं और फिर दोपहर करीब 2 बजे जंगल में दोबारा गश्त लगाने के लिए निकल जाती हैं, जो सूर्यास्त तक चलती है। 75 वर्षीय भागीरथी कहती हैं, “जंगल का दोहन करने वाले किसी भी व्यक्ति का मैं विरोध करती हूं,” वे उन लोगों के बारे में बात करती हैं जो मवेशी चराते हैं, पेड़ काटते हैं या हरियाली को नुकसान पहुंचाते हैं। उनकी इस लगन ने उन्हें ‘वन अम्मा’ यानी जंगल की माता का नाम दिलाया है।उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित मनार गांव, जहां लगभग 700 लोग रहते हैं, कभी इसके बगल में 12 हेक्टेयर (हेक्टेयर) का जंगल हुआ करता था। लेकिन अत्यधिक चराई और वृक्षों की कटाई के कारण लगभग 2000 में यह जंगल बंजर हो गया। इससे स्थानीय झरनों के जल प्रवाह पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। भागीरथी देवी कहती हैं, “मुझे याद है कि चारा और सूखी लकड़ी इकट्ठा करने के लिए मुझे 7-8 किलोमीटर चलकर सिद्धमंदिर नामक दूसरे जंगल तक जाना पड़ता था। इसमें प्रतिदिन पांच-छह घंटे लगते थे। गांव की सभी महिलाओं को इस समस्या का सामना करना पड़ता था।” तब उन्होंने मनार के जंगल को पुनर्जीवित करने का निश्चय किया और अन्य महिलाओं को भी इसके लिए राजी किया। 2000 में वे एक साथ आईं और उन्होंने वन पंचायत का गठन किया—जो भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत स्वायत्त वन प्रबंधन समितियां हैं। भागीरथी देवी को सर्वसम्मति से वन पंचायत की पहली सरपंच चुना गया और वे 2024 तक निर्विरोध इस पद पर रहीं। चंपावत जिले के जंगल और प्राकृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र ग्राम मानर मल्ला (खेतीखान) की 80 वर्ष की श्रीमती भागीरथी देवी ने अपने अदम्य साहस, अत्यधिक परिश्रम और पर्यावरण के प्रति प्रतिभावान प्रदर्शन की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जो न केवल जिला बल्कि पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई है।उनके इस अतुलनीय योगदान को कीर्तिमान स्थापित करते हुए श्री मनोहर कुमार ने उन्हें शॉल ओढ़ाकर की उपाधि दी और उनके कार्यों को भूरि-भूरि प्रशंसा की।एक समय ऐसा था जब मनार क्षेत्र का जंगल धीरे-धीरे उजड़ता जा रहा था। अवैध कटान, अनदेखी और प्राकृतिक पौधों के निर्माण से हरियाली खत्म होने की ओर थी। ऐसे समय में, बिना किसी सहायता के, भागीरथी देवी ने अकेले ही इस स्थिति को तय करने का संकल्प लिया। उन्होंने न केवल दवा का कार्य शुरू किया, बल्कि उसे जीवन का उद्देश्य बनाया।वर्षों तक लगातार मेहनत करते रहे उन्होंने सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों मेहनत की और अपने अध्ययन किए। वह सभी उद्यमों को अपने नियमित जीवन का हिस्सा बनाकर पानी देना, उनकी सुरक्षा करना, वन्यजीवों से बचाव करना और उन्हें विकसित करना देखना। उनकी यह साधना किसी तपस्या से कम नहीं रही।कठोर तापमान, तेज़ धूप, वर्षा और शारीरिक समस्याओं के बावजूद उन्हें कभी भी कोई नुकसान नहीं होता है। उम्र के इस निरीक्षण पर भी जोश उनके और छोटे बच्चों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।उनके काफी प्रकार के प्रयासों का ही परिणाम है कि आज मानर का संबंधित क्षेत्र पुनः हरित वन में परिवर्तित हो गया है, जहां अब विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे, पक्षी और प्रतिमाओं का दर्शन संभव है।इस अवसर पर नामांकित श्री मनीष कुमार ने कहा है कि भागीरथी देवी का जीवन और कार्य इस बात का प्रमाण है कि यदि व्यक्ति के भीतर दृढ़ इच्छाशक्ति और सेवा भाव हो, तो वह अकेले भी बड़े से बड़ा परिवर्तन ला सकता है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भागीरथी देवी का योगदान महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक, सामाजिक और जनभागीदारी का भी उत्कृष्ट उदाहरण है।प्रसिद्धि ने आगे कहा कि उनके द्वारा रोपे गए वृक्ष अगले कुछ वर्षों में क्षेत्र के खनिज संतुलन को प्रभावित करेंगे, भू-क्षरण को रोकेंगे, जल संसाधनों को पुनर्जीवित करेंगे और स्वच्छ वायु प्रदान कर जनस्वास्थ्य को भी बेहतर लाभ प्रदान करेंगे। यह कार्य सतत विकास और प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक अनुकरणीय पहल है।उन्होंने भागीरथी देवी से प्रेरणा लेकर पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी लेने के लिए जिलेवासियों, किशोरों और युवाओं से अनुरोध किया कि वे अपनी देखभाल सुनिश्चित करें। स्थानीय लोगों द्वारा सरकार द्वारा नियंत्रित जंगलों को जलाने के लिए व्यापक अभियान चलाया गया, जिससे पहाड़ों में प्रशासन लगभग ठप्प हो गया। इस स्थिति ने ब्रिटिश सरकार को स्थानीय आबादी की मांगों पर विचार करने के लिए कुमाऊं फॉरेस्ट ग्रीवांस कमिटी गठित करने को बाध्य किया। समिति की सिफारिशों के आधार पर डिस्ट्रिक्ट शेड्यूल्ड एक्ट 1874 के तहत 1931 में वन पंचायत के गठन का प्रावधान किया गया।वन पंचायत ने ग्रामीणों को पहाड़ी जंगलों के लिए स्वायत्त प्रबंधन समितियां बनाने का अधिकार दिया। निर्वाह के उद्देश्य से वनों को नियंत्रित करने और प्रबंधित करने की शक्तियों का यह हस्तांतरण भारत में राज्य और स्थानीय समुदायों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के सह-प्रबंधन का सबसे पहला उदाहरण है। मौजूदा समय में वन पंचायत भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 28 (2) के तहत शामिल है।इनका उद्देश्य वनों की रक्षा और विकास करने के साथ ही उनके उत्पादों को हितधारकों के बीच समान रूप से वितरित करना है। वन पंचायत के नियमों में 1976, 2001 और 2005 में तीन बार बड़े संशोधन हुए हैं। अध्ययन के मुताबिक, उत्तराखंड में लगभग 12,064 वन पंचायतें स्थापित की गई हैं। ये पंचायतें उत्तराखंड राज्य के 11 पहाड़ी जिलों में लगभग 5,23,289 हेक्टेयर वन क्षेत्र का प्रबंधन करती हैं, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 14 प्रतिशत है। कहते हैं कि 2000 में हमें पता चला कि वन पंचायत का गठन कर जंगल को बचाया जा सकता है। महिलाओं ने आगे बढ़कर इसका गठन तो कर लिया लेकिन कोई सरंपच बनने को तैयार नहीं था क्योंकि कोई जंगल की व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहता था। इस काम की जिम्मेदारी उठाने के लिए भागीरथी देवी आगे आईं। वह पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन जंगल को फिर से बनाने के लिए प्रतिबद्ध थीं।भागीरथी देवी उस समय निर्विरोध वन पंचायत की सरपंच चुन ली गईं। वह 2024 तक सर्वसम्मति से इस पद पर बनीं रहीं। उन्होंने बताया, “जंगल खत्म होने पर हमें एहसास हो गया था कि इसके बिना महिलाओं और हमारी आने वाली पीढ़ियों का गुजारा मुश्किल है। उनके बारे में सोचकर ही हमने जंगल को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया।” उत्तराखंड में वन पंचायत की अवधारणा अपने आप में अनूठी है और इसकी उत्पत्ति अंग्रेजों के जमाने में हुई थी भगीरथी देवी सिर्फ जंगल की रखवाली नहीं कर रही, बल्कि पूरे समाज को यह सिखा रही हैं कि छोटे-छोटे कदमों से कैसे बड़े परिवर्तन संभव है। उनके प्रयासों के कारण वन विभाग ने मनार गांव को जंगल-आग रोकने के लिए मॉडल क्षेत्र बनाने का निर्णय लिया है। उनका जीवन यह बताता है कि जब लोग मिलकर काम करें, तो प्रकृति पुनर्जीवित हो सकती है और जीवन में संतुलन लौट सकता है। अम्मा की कहानी हम सभी के लिए प्रेरणा देने वाली है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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