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हिमालय के ग्लेशियरों पर महासंकट

24/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हिंदू-कुश हिमालय लगभग 800 किलोमीटर की पर्वत श्रृंखला है, जो अफगानिस्तान से लेकर उत्तरी पाकिस्तान और ताजिकिस्तान में फैली है। हिमालय पर्वतों को भी हिंदू-कुश का विस्तार माना जाता है। इन पहाड़ों में हजारों  बड़े ग्लेशियर मौजूद हैं, जो गंगा, सिंधू और ब्रह्मपुत्रा समेत कई बड़ी नदियों के मुख्य स्रोत हैं।जलवायु वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पिछले कुछ दशकों में हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से इस क्षेत्र के 2 अरब से ज्यादा लोगों पर खतरा मंडरा रहा है। ये लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए हिमालयी ग्लेशियरों से पिघलकर आने वाले पानी पर निर्भर हैं। इन ग्लेशियरों को “एशिया के वॉटर टावर” भी कहा जाता है। यह चेतावनी ‘विश्व ग्लेशियर दिवस’ के मौके पर जारी की गई है। इस मौके पेश की गई दो अहम रिपोर्टों के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों की बर्फ वर्ष 2000 के बाद से दोगुनी तेजी से पिघल रही है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इसमें 0.5 वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियर, बड़े ग्लेशियरों के मुकाबले ज्यादा तेजी से सिकुड़ रहे हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि बर्फ पिघलने की यह रफ्तार, स्थानीय स्तर पर पानी की कमी और जलवायु से जुड़े खतरों के बढ़ने का तत्काल जोखिम पैदा करती है। ये निष्कर्ष ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट’ ने जारी किए हैं। यह काठमांडू स्थित एक अंतर-सरकारी संगठन है, जिसमें भारत और चीन सहित आठ क्षेत्रीय सदस्य शामिल हैं। हिंदू कुश क्षेत्र के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से जिन देशों पर पानी का संकट मंडराने का खतरा है, उनमें भारत, चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, अफगानिस्तान और म्यांमार शामिल हैं। इन देशों की बड़ी आबादी आज भी हिमालयी नदियों के पानी पर निर्भर है। अगर ग्लेशियर सिकुड़ते हैं तो इसका सीधा असर नदियों में पानी के प्रवाह पर पड़ेगा। आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां पानी सिर्फ जीवन का आधार नहीं, बल्कि आने वाले संघर्षों का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है। एक तरफ युद्ध की आग भड़क रही है, तो दूसरी तरफ बढ़ते तापमान और ग्लोबल वार्मिंग ने पृथ्वी की जल व्यवस्था को हिला कर रख दिया है। ऐसे में “जल है तो कल है” यह नारा अब सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रह गया—यह कड़वा सच बन चुका है।दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध अब केवल जमीन या सत्ता के लिए नहीं, बल्कि संसाधनों के नियंत्रण के लिए भी लड़े जा रहे हैं। मध्य पूर्व के देशों में पानी पहले ही एक संवेदनशील मुद्दा है। नदियों पर नियंत्रण, बांधों की राजनीति और जल स्रोतों पर कब्जा—ये सब आने वाले समय में बड़े युद्धों की वजह बन सकते हैं। जब एक देश दूसरे देश की जल आपूर्ति रोकता है, तो वह केवल पानी नहीं, बल्कि जीवन की धारा को ही बाधित करता है।इसी बीच, ग्लोबल वार्मिंग ने स्थिति को और भयावह बना दिया है। पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे एक तरफ बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ भविष्य में मीठे पानी की उपलब्धता घटने का खतरा मंडरा रहा है। हिमालय के ग्लेशियर, जो एशिया की कई प्रमुख नदियों का स्रोत हैं, यदि इसी गति से पिघलते रहे, तो आने वाले दशकों में करोड़ों लोगों के सामने पानी का संकट खड़ा हो सकता है।भारत जैसे देश के लिए यह खतरा और भी गंभीर है। यहां एक ओर गर्मी का प्रकोप हर साल नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है, तो दूसरी ओर भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। महानगरों में पानी के लिए हाहाकार मचता है, तो ग्रामीण इलाकों में महिलाएं आज भी मीलों दूर से पानी लाने को मजबूर हैं। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस देश में गंगा यमुना जैसी नदियां बहती हैं, वहीं पानी के लिए लोग तरस रहे हैं।युद्ध और जल संकट का खतरनाक गठजोड़ अब साफ दिखने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में “वाटर वार” यानी जल युद्ध हकीकत बन सकता है। अफ्रीका, एशिया और मध्य पूर्व में जल संसाधनों को लेकर तनाव पहले ही बढ़ रहा है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पानी को लेकर संघर्ष वैश्विक अस्थिरता का कारण बन सकता है।ग्लोबल वार्मिंग के कारण बारिश का पैटर्न भी पूरी तरह बदल चुका है। कहीं अत्यधिक वर्षा से बाढ़ आती है, तो कहीं सूखा पड़ता है। यह असंतुलन खेती को प्रभावित कर रहा है, जिससे खाद्य संकट भी गहराने लगा है। यानी पानी का संकट केवल प्यास बुझाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता को भी प्रभावित करेगा।ऐसे में सवाल उठता है—क्या हम केवल “विश्व जल दिवस” मना कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर सकते हैं? जवाब साफ है—नहीं! यह समय दिखावे का नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई का है। सरकारों को जल प्रबंधन की नीतियों को सख्ती से लागू करना होगा। वर्षा जल संचयन, जल पुनर्चक्रण और नदियों के संरक्षण पर गंभीरता से काम करना होगा।साथ ही, आम नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। घर घर में पानी बचाने की आदत डालनी होगी। हर बूंद की कीमत समझनी होगी। क्योंकि आने वाले समय में पानी सोने से भी ज्यादा कीमती हो सकता है। आज जब हम विश्व जल दिवस मना रहे हैं, तब यह संकल्प लेने का समय है कि हम पानी को केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की सबसे अनमोल धरोहर मानेंगे। यदि अभी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। पानी की हर बूंद में भविष्य छिपा है—अब यह हम पर निर्भर है कि हम उसे बचाते हैं या बहा देते हैं।इस रिपोर्ट के अनुसार यदि जल्द से जल्द ग्लेशियर को बचाने की दिशा में अहम कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. हिमालय हमारे अस्तित्व की गारंटी है। यह केवल बर्फ और पत्थर का ढेर नहीं, बल्कि एशिया की धड़कन है। यदि हिमालय की बर्फ पिघलती है, तो वह केवल पानी बनकर नहीं बहेगी, बल्कि वह हमारी संस्कृति, कृषि और भविष्य को भी बहा ले जाएगी।  कुल मिलाकर, हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से सिकुड़ना केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़ा बड़ा सामाजिक और आर्थिक संकट बनता जा रहा है। हिमालय में मौजूद ग्लेशियरों के पिघलने से इस क्षेत्र में मौजूद झीलों का आकार तेजी से बढ़ रहा है। इन ग्लेशियर झीलों के लगातार विस्तार से उत्तर भारत में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बेहद बढ़ गया है। ऐसे किसी विनाशकारी खतरे से सशंकित राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने ग्लेशियर झीलों के विस्तार से जुड़े एक मामले में केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले समय में जल संकट, कृषि उत्पादन और ऊर्जा क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है।रिपोर्ट ने साफ कहा है कि इस चुनौती से निपटने के लिए ठोस नीतियां, बेहतर निगरानी और क्षेत्रीय सहयोग बेहद जरूरी है। कुल मिलाकर, हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से सिकुड़ना केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़ा बड़ा सामाजिक और आर्थिक संकट बनता जा रहा है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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