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बहुउपयोगी भीमल का पेड़ देवभूमि के लिए वरदान

05/11/19
in उत्तराखंड, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
मध्य शिवालिक की तरंगित पहाड़ियां इसका बसेरा हैं। नाम है भीमल। भीमल कहें भीकू या भ्यूल यह पेड़ मानव आबादी के आसपास खुद उग आता है। भारत के पूर्व में तीस्ता नदी, सिक्किम से पश्चिम नेपाल और उत्तराखंड से कश्मीर होते हुए उत्तरी पाकिस्तान तक भीमल का पेड़ मवेशियों के लिए पौष्टिक चारा है। कोमल हल्की चौड़ी पत्तियों के इस पेड़ में सामान्य वनस्पति के बराबर गुण हैं, लेकिन कुछ गुण अतिरिक्त भी हैं। यह पेड़ घने जंगलों में नहीं उगता। शर्मीले स्वभाव का यह पौधा खुले में भी नहीं उगता। गांवों के आसपास झाडिय़ों में चुपके से जन्म लेता है। जब तक जानवरों से नुकसान की संभावता खत्म न हो जाए, यह सामने नहीं आता। दो.तीन साल की उम्र में जब इसके पत्ते काम लायक हो जाएं तो अचानक सभी की नजरों में आ जाता है। फिर तेजी से ऊंचाई लांघता है और समीप की बेकार झाड़ियों को अपनी छाया और जड़ों से खत्म कर देता है। हरित पत्तियां हल्का पीला रंग लिए प्रोटीनयुक्त जटिल रासायनिक यौगिक क्लोरोफिल.बी से भरपूर होती हैं। जानवरों को ये पौष्टिक पत्तियां बेहद स्वादिष्ट लगती हैं। इस वंडर ट्री की ऊंचाई भी ज्यादा नहीं होती। यदि इसकी टहनियां न काटी जाएं तो पेड़ की उम्र कम हो जाती है। दूध देने वाले जानवरों के लिए इस पेड़ को बचा कर रखा जाता है। दिसंबर.जनवरी की कड़क ठंड में जब बाहर निकलना मुश्किल हो। शीतोष्ण घासें धरती से ऊपर न उठ रही हों, पाले से सभी पेड़ों की पत्तियां सूख जाएं और जानवरों के लिए चारे का संकट गहराने लगे, तब भीमल का पेड़ हराभरा रहता है।
इसकी छोटी.छोटी शाखाओं से पत्तियां तोड़ मवेशी आनंदित हो उठते हैं। यह पौधा मानव और उसके मवेशियों की रक्षा के लिए ही जन्म लेता है। इसे न तो ज्यादा पानी चाहिए और न ही उपजाऊ जमीन। इसे उगने के लिए ढलान और उजड़ती कमजोर पत्थरों की दीवारें पसंद हैं। 20.25 साल के अपने जीवनकाल के अंत तक यह नजदीक में कुछ और पौधे पैदा कर देता है। बाजार में नहाने का बिना साबुन वाला आधुनिक शैम्पू 1930 के दशक में अस्तित्व में आया। हिमालय की तलहटी में सदियों से भीमल की पतली टहनियों की छाल गजब का शैंपू है। नहाने, कपड़े धोने के लिए इसी का इस्तेमाल होता रहा। इसमें साबुन के उच्च अणुभार वाले कार्बनिक वसीय अम्लों के सोडियम या पोटैशियम लवण नहीं होते। इसका चिप.चिपा पदार्थ पानी में घुलकर झाग पैदा करता है और गंदगी को घोल लेता है। यह कार्बोलिक समान औषधीय पदार्थ बालों या कपड़ों से झाग के साथ मैल की छोटी.छोटी गुलिकाएं बना देता है। इस प्रक्रिया में कणों के बीच पृष्ठ तनाव बेहद कम हो जाता है। हाथों से हल्का मलने पर मैल की ये गुलिकाएं वस्त्र से अलग हो जाती हैं और पानी में घुल जाती हैं। इस हल्के तैलीय पदार्थ का इमलशन मैल के कणों को दुबारा शरीर या वस्त्र पर नहीं जमने देता है। इससे शरीर की त्वचा भी नरम बनी रहती है। भीमल जरा मनमौजी भी है। इसका पौधा खुद ही उगता है। यदि एक स्थान से उठा कर दूसरे स्थान पर ले गए तो पौधा जान दे बैठता है और सूख जाता है। इसको अपने मृत शरीर से छेड़छाड़ भी कतई पसंद नहीं। पेड़ सूखते ही इसकी लकड़ी बेहद कमजोर हो जाती है। इसका इमारतों में कोई उपयोग नहीं हो सकता। चूल्हे पर जलाना भी संभव नहीं। आग पकड़ते ही यह तीखी दुर्गंध पैदा करता है। लिहाजा पौधा सूखते ही गिर पड़ता है और मिट्टी में अपनी गति को प्राप्त होता है। पतली टहनियों का रेसा बेहद मजबूत होता है। इसकी मजबूत रस्सी बनती है। रेसा टहनी सूखने पर ही प्राप्त हो सकता है, इसलिए कड़ी मशक्कत करनी होती है।
इसकी पतली शाखाएं सुखा कर नदी.गघेरों के शांत पानी में पत्थरों से दबा दी जाती हैं। जब यह सही से सड़ जाए तो लकड़ी से रेसे अलग किए जाते हैं। जिस स्थान पर रेसे निकाले जाते हैं, वहां फैली दुर्गंध कई दिनों तक दूर नहीं होती। इस काम में लगे लोगों के शरीर में भी यह गंध कुछ दिनों तक बनी रहती है। रेसे निकालने के बाद बची सुर्ख सफेद लकड़ी हालांकि तेज आग पकड़ती है, पर इसमें भी हल्की दुर्गंध बनी रहती है। काफी दिनों तक खुली धूप.हवा में रखने के बाद ही इसे चूल्हे पर जलाना संभव होता है। मानव बस्ती उजड़ते ही भीमल का पेड़ खत्म हो जाता है। आबादी की रक्षा के लिए बसासत के आसपास उगने वाले और भी बहुत सारी वनस्पतियां हैं। इनका जीवन से गहरा नाता है। हिमालय तभी बचेगा जब हिमालय में निवास करने वाले मानव समेत सभी जीव सुरक्षित रहेंगे उत्तराखंड में औषधीय वृक्षों की कोई कमी नहीं है। औषधीय वृक्षों में एक नाम है भीमल, जिसके पेड़ काफी बड़ी मात्रा में पहाड़ों पर खेतों के किनारे पाए जाते हैं। इसे हम भीकू, भीमू और भियुल नाम से भी जानते है। इस पेड़ का कोई ऐसा भाग नहीं है जो काम नहीं आता हो इसका लेटिन नाम ग्रेवीया अपोजीटीफोलिया है। इसकी ऊंचाई 9 से 12 मीटर तक होती है। यह तराई से 2000 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है। इसे वंडर ट्री भी कहा जाता है।
भीमल की टहनियों से पत्तियां तो जानवरों के चारे के लिए उपयोग में ली जाती हैं, टहनियों को सुखा कर, स्थिर जल कुंडों में भिगाने रख देते हैं, जहाँ हफ्ते दो हफ्ते में बाहरी छाल सड़ जाती है, पानी से बाहर निकाल कर इस छाल से रेशे निकाल कर सुखाये जाते हैं, रेशों को पत्थर पर पटकने और झटकने से छाल के अवशेष हट जाते हैं और मुलायम से एक मीटर के लगभग लम्बे, भूसे के रंग के रेशे, प्राप्त होते है। स्थानीय भाषा में यह रेशा स्योल्ल्हू के नाम से जाना जाता है। जिन्हें उँगलियों से कंघी करके बारीक रेशों को अलग करके, बाँटकर पतली रस्सियां बनाई जाती हैं। इन पतली रस्सियों की तीन लड़ों को बाँटकर लम्बी मोटी रस्सियाँ बनाई जाती हैं, जिनका उपयोग जानवरों को खूटों से बांधने के लिए होता है। भीमल की रस्सियों मुलायम, मजबूत और नमी रोधक होती हैं। ये जानवरों की गर्दनों को कोइ हानी नहीं पहुंचाती हैं इसके अलावा, जहाँ भी मजबूत, मोटी रस्सियों की आवश्यकता होती है, वहां यह रस्सी उपयोग में लाई जाती है। भीमल के कच्ची सीटों से चाल निकालकर डंडे से कूटकूटकर अठाला नामक झाग से महिलाएं बालों को शैंपू की तरह धोती है, शहरों की बड़ी पंसारी की दुकानों पर भी शिकाकाई की मिश्रण सामग्री के साथ अब भीमल की छाल भी मिल रहीहै खेतों की मेंड़ों पर उगाये जाने वाले भीमल के पेड़, जाड़ों भर दुधारू जानवरों के लिए हरे चारे का भरोसेमंद जरिया हैं, रेशा और रेशा निकालने के बाद बची सूखी बारीक टहनियां चूल्हे में आग जलाने के लिए और जब सेल वाली टोर्चें नहीं होती थीं, तब बाहर जाने के लिए रोशनी करने के काम आती थीं।
कृषि और पशुपालन के ह्रास के साथ साथ इस इस रेशे की उपलब्धि कम होती जा रही है। दुग्ध उत्पादन बढाने के प्रयासों में अगर भीमल को बढ़ावा दिया जाता है तो यह रेशा उद्द्योग अच्छी आय देनेवाला कुटीर उद्द्योग बन साकता है। भीमल की क्षाल को उबालकर गौमूत्र के साथ सूजन और दर्द वाली जगह पर सेंक करने से तुरंत लाभ मिलता है। नगर के आसपास पहले बड़ी संख्या में भीमल के पेड़ थे। शहरीकरण के कारण जमीन बिकी और भीमल के पेड़ नष्ट कर दिए गए। अब नगरीय क्षेत्र में भीमल के पेड़ों की संख्या बहुत कम हो गई है। यह गंभीर चिंता का विषय है। अलबत्ता ग्रामीण अंचलों में भीमल के पेड़ मिलते हैं। लोग इनके व्यापक उपयोग की जानकारी नहीं रखते। इसे सिर्फ चारा प्रजाति का पौधा माना जाने लगा है। विदेशों में फ्रांस जैसे बड़े और अमीर देश में अब उत्तराखंड की चप्पालें धूम मचा रही हैं। जी हांए उत्तराखंड में बनने वाली भीमल चप्प लों को फ्रांस में बहुत पसंद किया जा रहा है। फ्रांस को ये भीमल चप्पहलें इतनी ज्या दा पसंद आईं कि उसने 10 हज़ार भीमल चप्प लों का ऑर्डर दे दिया। 4 हजार चप्पहलें तो एक्स पोर्ट भी कर दी गईं हैं।
उत्तराखंड की कॉटन इंडस्ट्री के लिए ये उत्सा हित करने वाली बात है। अब उत्तराखंड सरकार इसे ऑनलाइन बेचने की सोच रही है। इस राज्य में छोटे.छोटे समूहों में भीमलए रिंगालए कंडाली जैसे पेड़.पौधों से कई तरह की चीजें तैयार की जा रही हैं और अब इनकी ऑनलाइन बिक्री के बारे में सोचा जा रहा है। हाल ही में अमेजॉन से विभाग ने 20 प्रॉडक्ट्स की बिक्री के लिए एमओयू साइन किया है। उत्तराखंड में कई महिलाएं ये भीमल चप्पसलें तैयार कर रही हैं। ऋषिकेष, यमकेश्वर, ढालवाला और चमोली में इन्हेंं बनाया जा रहा है। भीमल के रेशे से स्लीरपर तैयार की जाती हैं। राज्य् में तो इनकी डिमांड है ही अब विदेशों में भी इन्हें खूब पसंद किया जा रहा है जिससे इनका उत्पा दन भी बढ़ा है और महिलाओं का प्रोत्साडहन भी। भीमल के रेशों से तैयार की गई स्ली पर्स का रिटेल प्राइस 300 रुपए रखा गया है जबकि एक्स्पोर्ट प्राइस 200 रुपए है। इसी रेट पर फ्रांस को चप्प लें सप्लाटई की जा रही हैं।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब विदेशों में भारतीय वस्तुकओं को इतना ज्या दा पसंद किया जा रहा है। भीमल चप्पऐलें देखने में भी बहुत सुंदर हैं और इन्हेंत पहनकर आपको भी अच्छाा लगेगा। यहां तक अब जब इन चप्पकलों की डिमांड फ्रांस तक में हो गई है तो अब आप भी इन्हेंह अपने किसी दोस्ता या रिश्तेंदार को गिफ्ट कर सकते हैं। फ्रांस में भीमल चप्पअलों की डिमांड बढ़ना हमारे देश के लिए गर्व की बात है। इससे उत्तराखंड राज्य की आय में भी वृद्धि हुई है और वहां के लोगोंए खासतौर पर महिलाओं को रोजगार मिला है। अब राज्य सरकार ने इसके संरक्षण और प्रोत्साहन की योजना बनाई है, यदि लोग इस दिशा में काम करें तो यह वास्तव में भीमल उत्तराखंड के ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का जरिया बन गया है।

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