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बजट में, बाजरे एमएसपी पर चुप्पी, अन्नश्री कहे गए बाजरे का तो जिक्र तक नहीं

04/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
बाजरा वैज्ञानिक नाम पेनिसिटम टाईफाइडिस यह एक प्रमुख फसल है। एक प्रकार की बड़ी घास जिसकी बालियों में हरे रंग के छोटे छोटे दाने लगते हैं। इन दानों की गिनती मोटे अन्नों में होती है। प्रायः सारे उत्तरी पश्चिमी और दक्षिणी भारत में लोग इसे खाते हैं। बाजरा मोटे अन्नों में सबसे अधिक उगाया जाने वाला अनाज है। प्रागेतिहासिक काल से उगाया जाता रहा है, यद्यपि इसका मूल अफ्रीका में माना गया है। भारत दुनिया का अग्रणी बाजरा उत्पादक देश है। यहां में लगभग 85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बाजरे की खेती की जाती है। जिसमें से 87 प्रतिशत क्षेत्र राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा राज्यों में है। देश के शुष्क तथा अर्धशुष्क क्षेत्रों में यह प्रमुख खाद्य है और साथ ही पशुओं के पौष्टिक चारा उत्पादन के लिए भी बाजरे की खेती की जाती है।पोषण की दृष्टि से जहां इसके दाने में अपेक्षाकृत अधिक प्रोटीन 10.5 से 14.5 प्रतिशत और वसा 4 से 8 प्रतिशत मिलती है, वहीं कार्बोहाइड्रेट खनिज तत्व कैल्शियम केरोटिन राइबोफ्लेविन विटामिन बी2 और नायसिन विटामिन बी6 भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। गेहूं एवं चावल की अपेक्षा बाजरे में लौह तत्व भी अधिक होता है। अधिक ऊर्जा होने के कारण बाजरे को सर्दियों के मौसम में खाने में अधिक प्रयोग किया जाता है। बाजरा के चारे में प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस और खनिज लवण उपयुक्त मात्रा में एवं हाइड्रोरासायनिक अम्ल सुरक्षित मात्रा में पाया जाता है। भारत के कुल बाजरा क्षेत्र का लगभग 95 प्रतिशत असिंचित है जिससे मानसून की निश्चितता की तरह बाजरा की उत्पादकता में भी उतार.चढ़ाव रहता है हाथरस। बीयर कंपनियों के लिए जायद की फसल बाजरा से बीयर बनाना काफी फायदे का सौदा हो गया है। यही कारण है कि आधा दर्जन बीयर निर्माता कंपनियों द्वारा कृषि उत्पादन मंडी समिति से बाजरा की जोरदार खरीद की जा रही है, जिससे मंडी में बाजरा लेकर आने वाले किसानों को उनकी फसल का अच्छा भाव मिल रहा है। किसानों के चेहरे पर खुशी छाई हुईहै।अब तक खरीफ की फसल में पैदा होने वाले बाजरे का प्रयोग आम आदमी के खाने में होता था, लेकिन अब नई तकनीकी के इस दौर में बाजरा की फसल भी काफी व्यवसायिक हो गई है। जायद की फसल में भी अब बडे़ पैमाने पर बाजरे की पैदावार होने लगी है। अब तक जौ से बीयर बनाने का काम करने वाली कंपनियों को बाजरा से बीयर बनाना और अधिक लाभदायक हो गया है। वहीं किसानों को एक अतिरिक्त फसल मिल रही है और बीयर कंपनियों को बीयर बनाने के लिए भी जौ से भी कम रेट पर बाजरा आसानी से उपलब्ध हो रहा है। किसानों द्वारा जायद की फसल में होने वाले बाजरा को बीयर बनाने के लिए खरीदा जा रहा है। इस समय बाजरा की अधिक से अधिक खरीद करने की होड़ लगी हुई है। कृषि उत्पादन मंडी समिति हाथरस में भी जायद के बाजरा की खरीद के लिए करीब आधा दर्जन कंपनी बाजार में आ गई है, जिससे मौजूदा समय में जायद का बाजरा पैदा करने वाले किसानों को 1,100 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास के अच्छे भाव प्राप्त हो रहे हैं।मोटे अनाज वाली फसलों में बाजरा पेन्नीसेटम टाइफोइड्स का महत्वपूर्ण स्थान है। बाजरा कम लागत तथा शुष्क क्षेत्रों में उगाई जाने वाली ज्वार से भी लोकप्रिय फसल है जिसे दाने व चारे के लिए उगाया जाता है। बाजरे के दाने में 12.4 प्रतिशत नमी, 11.6 प्रतिशत प्रोटीन, 5.0 प्रतिशत वसा, 67.5 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 0.05 प्रतिशत कैल्शियम, 0.35 प्रतिशत फास्फोरस तथा 8.8 प्रतिशत लोहा पाया जाता हैै। इस प्रकार बाजरे का दाना ज्वार की अपेक्षा अधिक पौष्टिक होता है। बाजरे को खाने के काम में लाने से पूर्व इसके दाने को कूटकर भूसी अलग कर लिया जाता है। दानों को पीसकर आटा तैयार करते हैं और माल्टेड आटा के रूप में प्रयोग करते हैं। उत्तरी भारत में जाड़े के दिनों में बाजरा रोटी चपाती चाव से खाई जाती है। कुछ स्थानों पर बाजरे के दानों को चावल की तरह पकाया और खाया जाता है। बाजरे की हरी बालियाँ भूनकर खाई जाती हैं। दाने को भूनकर लाई बनाते हैं। बाजरा दुधारू पशुओं को दलिया एंव मुर्गियों को दाने के रूप में खिलाया जाता है। बाजरे का हरा चारा पशुओं के लिए उत्तम रहता है। क्योंकि इसमें एल्यूमिनायड्स अधिक मात्रा में उपस्थित रहते हैं। बाजरा के पौधे ज्वार से अधिक सूखा सहन करने की क्षमता रखते है। देश के अधिक वर्षा वाले राज्यों को छोड़कर लगभग सभी राज्यों में बजारे की खेती की जाती है।
भारत में बजारे की खेती गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, आन्ध्र प्रदेश, पंजाब और मध्यप्रदेश राज्यों में प्रमुखता से की जाती है। भारत विश्व भूख सूचकांक के मामले में 81 राष्ट्रो की सूची में भारत 64वें नंबर पर हैं । बाल कुपोषण के मामले में यह दूसरे नंबर पर है और यह स्थिति बहुत गरीब देशों में पाई जाती है। यह स्थिति तब भी बनी हुई है जब यहां पर लगभग पांच दशक से सार्वजनिक वितरण व्यवस्थाध्लक्षित सार्वजनिक वितरण व्यवस्था पीडीएस टीपीडीएस चल रही है। लेकिन जहां बाजरे की लंबे समय से अनदेखी की गई है, वहीं अब प्रस्ताव है कि इसे खाद्य अनाजों में शामिल कर लिया जाए। भारत के अनेक परिवार उन क्षेत्रों में रहते है जहां सिंचाई सुविधाएं कम हैं अतः ऐसे इलाकों में खाने के लिए उपयुक्त अनाज के रूप में बाजरे की खेती की जा सकती है और इसे लोकप्रिय बनाने की जरूरत है। इसके अलावा बाजरे की फसल पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है। यह जलवायु परिवर्तन के असर को कम करती है। इसके विपरीत धान की फसल जलवालु परिवर्तन में सहायक साबित होती है, क्योंकि उससे मीथेन गैस निकलती है धान की खड़ी फसल में पानी में डूबी जमीन से ग्रीन हाऊस गैस निकलती है। गेंहू एक तापीय संवेदनशील फसल है और बढ़ते हुए तापमान का इस पर बुरा असर पड़ता है।
बाजरा एक ऐसा अनाज है जिसमें लोहा, कैल्सियम, जस्ता, मैग्निसियम, पोटाशियम, फाइबर और कई तरह के विटामिन कैरोटिन, नियासिन, विटामिन बी6 और फोलिक एसिड होते है। इसलिए यह हमारे लिए बहुत उपयोगी और लाभदायी है। बाजरा ऐसी मिट्टी में भी उग सकता है जो कम उपजाऊ और कम नमी वाली हो। इसकी फसल मात्र 65 दिनों में तैयार हो जाती है। यह आसानी से हजम भी हो जाता है। बाजरा उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है जो पेट और मधुमेह की बीमारियों से पीड़ित रहते हैं। कुपोषण से लड़ने में भी बाजरा का इस्तेमाल बखूबी किया जा सकता है।
बाजरे में हाइड्रोकैमिकल्स तथा ऐन्टीऑक्सिडैन्टस् प्रचुर मात्रा मे मिलते हैं। जरूरत है कि हम बाजरे की खेती को समर्थन दें और इसके लिए ऋण और बीमा की व्यवस्था भी उपलब्ध करवाएं। दालों के साथ इस्तेमाल करके बाजरे से पोषक भोजन तैयार किया जा सकता है, जैसे. चपातियां, ब्रेड, लड्डू, पास्ता, बिस्कुट। बाजरे की विशेषता है सूखा प्रभावित क्षेत्र में भी उग जाना, तथा ऊंचा तापक्रम झेल जाना। यह अम्लीयता को भी झेल जाता है। यही कारण है कि यह उन क्षेत्रों में उगाया जाता है जहां मक्का या गेहूं नहीं उगाए जा सकते हैं की गेहूं और चावल के मुकाबले बाजरे में ऊर्जा कई गुना है। बाजरे की रोटी सेहत के लिए बहुत लाभदायक है। इस प्रकार से हो सकता है कि एक ऐसा समय आए, जब गेंहू हमारे खेतों से एक दम गायब हो जाए। बाजरे की खेती में उर्वरकों की जरूरत नहीं पड़ती अतः इस फसल में कीड़े.मकेड़े नहीं लगते। अधिकांश बाजरे की किस्में भंडारण में आसान है और इसमें कीड़े नहीं लगते। अतः इसके भंडारण के लिए कीट.नाशकों की जरूरत नहीं पड़ती। प्रदेश में उच्च गुणवत्तायुक्त का उत्पादन कर देश.दुनिया में स्थान बनाने के साथ राज्य की आर्थिकी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में पलायान को रोकने का अच्छा विकल्प बनाया जा सकता है। पहाड़ी जीवन और ग्रामीण के लिए घोर संकट है। पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य दोनों को ही लाभ होगा। उत्तराखण्ड के लिए सुखद ही होगा किया जाता है तो यदि रोजगार से जोड़े तो अगर ढांचागत अवस्थापना के साथ बेरोजगारी उन्मूलन की नीति बनती है तो यह पलायन रोकने में कारगर होगी उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य फसल उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती है। बजट में घोषित नई पहलें नारियल, कोको, काजू, पहाड़ी इलाकों के मेवे, मखाना, प्राकृतिक रेशे और हाइब्रिड बीजों पर केंद्रित हैं। वित्त मंत्री की घोषणाएं भारत-विस्तार एआई प्लेटफॉर्म जैसे तकनीक-आधारित पहल बाजार एकीकरण और महत्व बढ़ाने का उद्देश्य तो दिखाती हैं, लेकिन भारत के कृषि कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा माने जाने वाले गेहूं, धान, दालों और अन्य खाद्यान्नों पर निर्भर किसान इन घोषणाओं में काफी हद तक अनदेखे रह गए हैं।अहम बात यह है कि बजट में  न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए कानूनी गारंटी की लंबे समय से चली आ रही मांग पर कुछ नहीं कहा गया है। यह एक ऐसी मांग है जो सालों से देश भर में किसानों के आंदोलनों के केंद्र में रही है। यहां तक कि एक सांकेतिक जिक्र भी न होना यह संकेत देता है कि सरकार ऐसे छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय सुरक्षा पर ध्यान देने को तैयार नहीं है, जो अस्थिर बाजारों में जीविका के लिए पक्की खरीद पर निर्भर हैं।यह बदलाव इस बात से भी साफ है कि किन चीज़ों का जिक्र भाषण में नहीं किया गया है। बाजरा, जिसे कभी “श्री अन्न” के तौर पर ज़ोर-शोर से बढ़ावा दिया गया था और जलवायु-अनुकूल फसल के रूप में दिखाया गया था, इस साल उसका कोई खास ज़िक्र नहीं हुआ। उन किसानों के लिए जिन्होंने पहले की नीति के संकेतों पर ध्यान दिया था और बाजरे की खेती शुरू की थी, उनके लिए यह चुप्पी निराश करने वाली है।बजट में कृषि क्षेत्र का आवंटन इस चिंता को और बढ़ाता है। केंद्रीय बजट 2026-27 कृषि में बदलाव की तस्वीर का दावा करता है, लेकिन गौर से देखने पर पता चलता है कि सरकार की प्राथमिकताएं धीरे-धीरे उन किसानों से दूर होती जा रही हैं जो देश का मुख्य अनाज उगाते हैं। वित्त मंत्री ने “हाई-वैल्यू एग्रीकल्चर”, पशुधन, मत्स्य पालन और खास फसलों पर तो काफी जोर दिया है, लेकिन ज़्यादातर किसानों की चिंताएं उनके भाषण से गायब रहीं। बजट में कृषि क्षेत्र का आवंटन इस चिंता को और बढ़ाता है। कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर खर्च पिछले साल के बजट अनुमानों की तुलना में सिर्फ़ 2.41% बढ़ा है, वह भी ऐसे समय में जब सरकार 7% से ज़्यादा की कुल आर्थिक ग्रोथ का अनुमान लगा रही है। असल में, कृषि क्षेत्र से बहुत कम संसाधनों में ज़्यादा काम करने की उम्मीद की जा रही है।किसान नेता ने बढ़ती निराशा को बताते हुए कहा, “सरकार किसानों की इनकम दोगुनी करने का अपना वादा भूल गई है। असल में, किसानों को अब पहले की इनकम का आधा ही मिल रहा है।” यह बजट, जो इनोवेशन पर ज़्यादा और इनकम की गारंटी पर कम ध्यान देता है, इस डर को सही साबित करता दिख रहा है। बाजरा सदियों से भारत के पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहा है, खासकर शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में। आज ये पोषक अनाज स्वास्थ्य लाभ और जलवायु सहनशीलता के कारण दोबारा लोकप्रिय हो रहे हैं। चावल और गेहूं की तुलना में बाजरा कम पानी में, तेज़ी से और कमज़ोर मिट्टी में भी उगता है। वर्षा पर निर्भर देश में बाजरा खाद्य सुरक्षा का प्राकृतिक समाधान है। इनमें फाइबर, लोहा, कैल्शियम और एंटीऑक्सिडेंट प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो ग्रामीण पोषण को भी बढ़ावा देते हैं। बाजरा सबसे महत्वपूर्ण अनाज फसलों में से एक है, जिसे इसके असाधारण पोषण गुणों के कारण पोषक अनाज के रूप में जाना जाता है। देश में बाजरा के कुल उत्पादन में छोटे बाजरे का प्रमुख हिस्सा है, बाजरा, जिसे कभी “श्री अन्न” के तौर पर ज़ोर-शोर से बढ़ावा दिया गया था और जलवायु-अनुकूल फसल के रूप में दिखाया गया था, इस साल उसका कोई खास ज़िक्र नहीं हुआ। उन किसानों के लिए जिन्होंने पहले की नीति के संकेतों पर ध्यान दिया था और बाजरे की खेती शुरू की थी, उनके लिए यह चुप्पी निराश करने वाली है।बजट में कृषि क्षेत्र का आवंटन इस चिंता को और बढ़ाता है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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