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अपनी शायरी में दर्द का सैलाब दर्शा गए मीर

04/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
मोहम्मद मीर उर्फ मीर तकी ‘मीर’ उर्दू एवं फारसी भाषा के महान शायर थे। मीर का जन्म आगरा में हुआ था। उनका बचपन अपने पिता की देखरेख में बीता। उनके जीवन में प्यार और करुणा के महत्व के प्रति नजरिये का, मीर के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसकी झलक उनके शेरों में भी देखने को मिलती है। पिता के मरणोपरांत क्क् की आयु में वे आगरा छोड़कर दिल्ली आ गए। दिल्ली आकर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और शाही शायर बन गये। अहमद शाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले के बाद वह अशफ-उद-दुलाह के दरबार में लखनऊ चले गये। अपनी जि़न्दगी के बाकी दिन उन्होंने लखनऊ में ही गुजारे। अहमद शाह अब्दाली और नादिरशाह के हमलों से कटी-फटी दिल्ली को मीर तकी मीर ने अपनी आंखों से देखा था। इस त्रासदी की व्यथा उनके कलामों में दिखती है, अपनी गजलों के बारे में एक जगह उन्होंने कहा था
हमको शायर न कहो मीर कि साहिब हमने
दर्दो गम कितने किए जमा तो दीवान किया
उनकी विरासत उर्दू अदब
3 फरवरी को साहित्यकार, उर्दू साहित्य के महानतम शायर मीर तकी मीर (1723–1810) का जन्मदिन मनाया जाता है।मीर तकी मीर सिर्फ़ ग़ज़ल के शायर नहीं थे, वे अपने समय की टूटी हुई रूह की आवाज़ थे।मीर उर्दू ग़ज़ल को शिखर तक पहुँचाने वाले बड़े कवि थे। पाठकों को बताता चलूं कि उन्हें ‘ख़ुदा-ए-सुख़न’ यानी कि शायरी का ख़ुदा/भगवान् कहा जाता है। उनकी शायरी में दर्द, मोहब्बत, तन्हाई और मानवीय संवेदना गहराई से झलकती है।उर्दू ही नहीं फ़ारसी भाषा पर भी उनकी मज़बूत पकड़ थी। मीर को उर्दू के उस प्रचलन के लिए याद किया जाता है जिसमें फ़ारसी और हिन्दुस्तानी के शब्दों का अच्छा मिश्रण और सामञ्जस्य हो। विकीपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनका जन्म आगरा में तथा मृत्यु लखनऊ में हुई।मीर तक़ी मीर को उर्दू में शेर कहने का प्रोत्साहन अमरोहा के सैयद सआदत अली ने दिया। पाठकों को बताता चलूं कि उनका मूल नाम मोहम्मद तकी था।उनकी प्रमुख कृतियों की यदि हम यहां पर बात करें तो इनमें क्रमशः ज़िक्र-ए-मीर (आत्मकथा), कुल्लीयते-मीर (उर्दु रचनाओं के छह दीवानों का संग्रह), कुल्लीयते-फ़ारसी (फ़ारसी रचनाओं का संग्रह), फ़ैज़-ए-मीर (पाँच कहानियों का संग्रह), नुकत-उस-शूरा (फ़ारसी ज़बान में लिखी तत्कालीन उर्दु रचनाकारों की जीवनियाँ) आदि को शामिल किया जाता है। वैसे,वे ‘दर्द के शायर’ कहलाते हैं। दरअसल, मीर की ज़िंदगी मुफ़लिसी (गरीबी), अपनों को खोने के गम और दिल्ली की बर्बादी को देखने में गुजरी। यही वजह है कि उनकी शायरी में ‘हूक’ और ‘टीस’ महसूस होती है। उन्होंने खुद एकबार यह कहा था-‘मुझको शायर न कहो मीर कि साहब मैंने, कितने ग़म जमा किए तो दीवान किया।’ कहना ग़लत नहीं होगा कि दिल्ली के उजड़ने, परिवार की मौतों, गरीबी और बेघर होने ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था। उनकी शायरी दरअसल आत्मकथा की पंक्तियाँ हैं। उनकी यह पंक्ति देखिए-‘पत्थर की भीत क्या करूँ, आँसू जो ढल गए।’ पाठकों को बताता चलूं कि नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली के हमलों के बाद दिल्ली उजड़ चुकी थी।मीर ने दिल्ली छोड़कर लखनऊ जाना तो स्वीकार किया, लेकिन वे वहाँ दिल से कभी बस नहीं पाए।मीर की सबसे बड़ी खूबी उनकी भाषा थी। वास्तव में, वे बहुत ही आसान शब्दों में दिल की गहरी बात कह देते थे। इसे तकनीकी भाषा में ‘सह़ल-ए-मुमत़ना’ कहा जाता है-यानी ऐसी चीज़ जो देखने में आसान लगे, पर उसे दोबारा लिखना नामुमकिन हो।महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब भी उनके कायल थे।सच तो यह है कि ग़ालिब ने मीर को अपना उस्ताद माना। ग़ालिब जैसे आत्मविश्वासी शायर ने कहा-‘ रेख़्ते के तुम ही उस्ताद नहीं हो ग़ालिब,कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था।’ वास्तव में यह मीर की श्रेष्ठता की सबसे बड़ी गवाही है। मोहब्बत की कैफियत को बयां करते हुए उन्होंने कहा था-‘इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या।’ ‘हस्ती अपनी हबाब की सी है, ये नुमाइश सराब की सी है।’,’नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए, पंखुड़ी एक गुलाब की सी है।’,’मीर उन नीम-बाज़ आँखों में, सारी मस्ती शराब की सी है।’ उनकी कुछ अमर पंक्तियों में से एक हैं। आत्मस्वीकृति के बारे में एक बार उन्होंने कहा था -‘शायर मुझमें और भी हैं, पर मीर का मुक़ाबला कौन करे।’ अंत में यही कहूंगा कि मीर सिर्फ़ उर्दू ग़ज़ल के शायर ही नहीं, बल्कि अपने समय के टूटे हुए समाज, उजड़ती दिल्ली और बिखरते इंसान की संवेदनाओं के सच्चे दस्तावेज़ हैं। उनकी शायरी में बनावटी सौंदर्य नजर नहीं आता है। वास्तव में उनकी शायरी जीवन के गहरे ज़ख़्मों से निकली हुई सच्चाई है। अपने जीवन में निजी दुख, मानसिक पीड़ा, गरीबी और उपेक्षा के बावजूद मीर ने उर्दू और फ़ारसी भाषा को आम आदमी के दिल तक पहुँचाया और ग़ज़ल को आत्मा की आवाज़ बना दिया। उनका दर्द रचना है। अन्य शायरों की तरह वे कभी शोर नहीं करते, बल्कि रचनाओं में फुसफुसाते हैं और उनकी वही फुसफुसाहट सदियों बाद भी पाठकों के दिल में उतर जाती है
मीर की गजलों के कुल म् दीवान हैं। इनमें से कई शेर ऐसे हैं जो मीर के हैं या नहीं इस पर विवाद है। इसके अलावा कई शेर या कसीदे ऐसे हैं जो किसी और के संकलन में हैं पर ऐसा मानने वालों की कमी नहीं कि वे मीर के हैं। शेरों (अरबी में अशआर) की संख्या कुल क्भ्000 है। इसके अलावा कुल्लियात-ए-मीर में दर्जनों मसनवियां (स्तुतिगान), क़सीदे, वासोख्त और मर्सिये संकलित हैं। विविध उर्दु के महानतम शायरों में से एक। उर्दु भाषा स्वरूप को संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मूल नाम मोहम्मद तकी। ‘शायरी के ख़ुदा’ के तौर पर मीर को याद किया जाता है।
बात क्या आदमी की बन आई
आस्मां से जमीन नपवाई
चरख जन उसके वास्ते है मदाम
हो गया दिन तमाम रात आई
माह-ओ-ख़ुर्शीद-ओ-बाद सभी
उसकी खातिर हुए हैं सौदाई
कैसे-कैसे किये तरद्दद जब
रंग-रंग उसको चीज पहुंचाई
उसको तरजीह सबके ऊपर दे
लुत्फ-ए-हक ने की इज्जत अफजाई
हैरत आती है उसकी बातें देख
ख़ुद सरी ख़ुद सताई ख़ुदराई
शुक्र के सज्दों में ये वाजिब था
ये भी करता सदा जबीं साई
सो तो उसकी तबीयत-ए-सरकश
सर न लाई फरों के टुक लाई
‘मीर’ नाचीज मुश्त-ए-खाक अल्लाह
उनने ये किबरिया कहां पाई
इसलिए मीर को पढ़ना सिर्फ़ साहित्य का अनुभव नहीं, बल्कि इंसान होने का अनुभव है।जन्मजयंती के उपलक्ष्य में उन्हें शत शत नमन!लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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