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सेप्टेज मैनेजमेंट प्रोटोकॉल का उल्लंघन पड़ेगा भारी

18/10/25
in उत्तराखंड, डोईवाला, देहरादून
Reading Time: 1min read
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
नदियों और जलाशयों को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम लगातार नए प्रयासों की दिशा में बढ़ रहा है. इसी क्रम में अब प्रत्येक जिले में सीवेज से संबंधित एक्शन प्लान तैयार करने और नए प्रोजेक्ट्स की पहचान करने पर जोर दिया जा रहा है. न केवल गंगा, बल्कि उसकी सहायक नदियों और अन्य महत्वपूर्ण जलाशयों, नदियों, झीलों और तालाबों को भी प्रदूषण से बचाने के लिए योजनाएं बनाई जा रही हैं. इस दौरान यह महसूस किया गया कि जिलों में कोई ऐसा नोडल अधिकारी मौजूद नहीं है, जो जल निगम और जल संसाधन विभाग से जुड़ा हो और इन परियोजनाओं का प्रभावी अनुश्रवण कर सके.
नोडल अधिकारी की इसी कमी को दूर करने के लिए केंद्रीय सचिव के निर्देशन में राज्य के सभी 13 जिलों में नोडल ऑफिसर्स की नियुक्ति की गई है. इन अधिकारियों की जिम्मेदारी होगी कि वे डीपीआर तैयार करें, योजनाओं की निगरानी करें और नए प्रोजेक्ट्स की पहचान कर उन्हें आगे बढ़ाएं.पर्यावरण के साथ नदियों की स्वच्छता को लेकर भी देशभर में यूं तो तमाम योजनाएं चल रही हैं लेकिन कई बार विभागों या आम लोगों का गैर जिम्मेदाराना रवैया इन योजनाओं पर पलीता लगा देता है. नमामि गंगा प्रोजेक्ट की समीक्षा बैठक में भी कुछ ऐसे ही मामले सामने आए हैं. जिसमें नगर निगम हरिद्वार, रुड़की और ऋषिकेश में सेप्टिक वेस्टेज को ठीक से डंप नहीं किया जा रहा. इससे पर्यावरण और नदियों की स्वच्छता पर खतरा मंडरा रहा है.पर्यावरण के साथ नदियों की स्वच्छता को बनाए रखने के लिए अब सभी नगर निगम और पालिकाओं में सेप्टेज मैनेजमेंट प्रोटोकॉल को तैयार किया जाएगा. यही नहीं इनमें सेप्टेज मैनेजमेंट सेल का गठन करना भी अनिवार्य होगा. जिससे न केवल वेस्टेज की सही डंपिंग को लेकर एक पूरे प्रोटोकॉल का पालन हो सके बल्कि इसकी निगरानी के लिए भी उचित व्यवस्था हो सके. इसके लिए सभी नगर निगम और पालिकाओं को चरणबद्ध तरीके से इस प्रोटोकॉल और सेल के गठन के काम को पूरा करना होगा.दरअसल यह पाया गया है कि कई जगह पर सेप्टिक वेस्टेज को ठीक से डंप नहीं किया जा रहा है. नगर निगमो में कई ऐसे वाहन है जिनका रजिस्ट्रेशन नहीं है. इसके बावजूद वह वेस्टेज को इधर उधर डालने का काम कर रहे हैं. इसके अलावा ऐसे भी कई वाहन है जिनका नगर निगम में रजिस्ट्रेशन तो हैं लेकिन उसमें GPS सिस्टम ही नहीं लगाया गया है. इतना ही नहीं इन वाहनों द्वारा नदियों या खुले में कचरा फेंका जा रहा है. जिससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है.खास बात यह है कि ऐसी स्थितियों के कारण नदियों में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट को भी नुकसान हो रहा है या ऐसे प्लांट अपना बेहतर प्रदर्शन नहीं दे पा रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि कई बार यह वाहन इस कचरे को सीधे नदियों में भी डालने का काम कर रहे हैं. इस तरह के मामले सामने आने के बाद अब इनकी निगरानी बढ़ाने के लिए एक पूरा सिस्टम तैयार करने पर विचार होने लगा है.नमामि गंगा के प्रोजेक्ट डायरेक्टर कहते हैं कि इस संदर्भ में नगर निगम हरिद्वार, रुड़की और ऋषिकेश के अधिकारियों के साथ बैठक की गई. जिसमें उन्हें ऐसे मामलों पर सख्ती के साथ कार्रवाई करने के लिए कहा गया है. इसके अलावा यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस तरह की गतिविधि सामने आने के बाद अधिकारियों की भी जिम्मेदारी तय की जाए. जिससे इस तरह के मामलों को रोका जा सके.नमामि गंगा परियोजना के तहत कई जगहों पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए हैं. इसके जरिए नदियों के जल को स्वच्छ करने का प्रयास किया जा रहा है. कई बार लापरवाही या गैर जिम्मेदाराना रवैया इस परियोजना के मकसद को पलीता लगा रहा है. नगर निगमों के उप नगर आयुक्त और दूसरे अधिकारियों को ऐसे मामलों में कोताही नहीं बरतने के लिए कहा गया है. राष्ट्रीय गंगा योजना (सीएस) को वर्ष 2025-26 के लिए 3400 करोड़ रुपये का वित्तीय परिव्यय आवंटित किया गया है। इस निवेश का उद्देश्य सीवेज उपचार क्षमता को बढ़ाना, पानी की गुणवत्ता में सुधार करना और गंगा नदी का संरक्षण करने तथा 2025 तक निर्धारित स्नान मानकों को प्राप्त करने के लिए औद्योगिक कचरे के निर्वहन को विनियमित करना है। दुनिया की सबसे पवित्र नदियों में से एक गंगा नदी को अत्यधिक जल दोहन और प्रदूषण के कारण गंभीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है। भारत की सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण हिस्से और जीविका के प्रमुख संसाधन के रूप में इस नदी की स्वच्छता सबसे महत्वपूर्ण है। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए, नमामि गंगे कार्यक्रम को प्रदूषण को प्रभावी ढंग से कम करने और गंगा नदी को संरक्षित करते हुए उसे फिर से पवित्रता और शुद्धता के पुराने रूप में लाने के दोहरे उद्देश्यों के साथ शुरू किया गया था।

हालांकि, कुछ क्षेत्रों में अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं, जिन्हें दूर करने के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन मिलकर काम कर रहे हैं। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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