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संकट में चकराता का सुर्ख राजमा!

08/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

यह एक छोटे और सुंदर पहाड़ी नगर के रूप में नजर आता है। रोजमर्रा की जिंदगी और महानगरों के शोर से दूर कुछ पल शांति से बिताने वालों के लिए यह खास ठिकाना है। वैसे, यदि आप कुदरती खूबसूरती के साथ-साथ रोमांचक खेलों का लुत्फ भी उठाना चाहते हैं तो इस लिहाज से यह एक आदर्श स्थल है। जौनसार-बावर का यह क्षेत्र यानी चकराता और इसके आसपास कैंपिंग, राफ्टिंग, ट्रेकिंग, रैपलिंग, रॉक क्लाइंबिंग का आनंद उठा सकते हैं। यहां हर तरफ ऐतिहासिक, पुरातात्विक, सामाजिक और सांस्कृतिक वैभव बिखरा हुआ हैउत्तराखंड के देहरादून जिले के जौनसार-बावर जनजातीय क्षेत्र, खासकर चकराता में उगने वाली राजमा अपनी अनूठी गुणवत्ता और बेहतरीन स्वाद के लिए देश–विदेश में मशहूर है. खास रंग के कारण इसे ‘सुर्ख राजमा’ भी कहा जाता है. सदियों से यह राजमा स्थानीय लोगों की पारंपरिक खेती, खान-पान और संस्कृति का अहम हिस्सा रही है. यूपी, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में इस राजमा की भारी मांग है, लेकिन पहाड़ी इलाकों में राजमा की खेती लगातार सिमटती जा रही है.चकराता के कालसी क्षेत्र के किसान बताते हैं कि जौनसार-बावर के किसानों ने पीढ़ियों से राजमा की खेती हमेशा जैविक और प्राकृतिक तरीकों से की है. यही कारण है कि चकराता का राजमा आकार में छोटा, लाल रंग का और बेहद मुलायम होता है. पकने के बाद यह जल्दी गल जाता है और मुंह में डालते ही घुल जाता है. इसकी यही खासियत इसे उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि देश के कई हिस्सों में लोकप्रिय बनाती है. चकराता के राजमा को इस बार जीआई टैग मिलने की संभावना है, लेकिन विडंबना यह है कि किसान इसकी खेती से दूर होते जा रहे हैं, जिससे उत्पादन लगातार घट रहा है. इसकी विशेष पहचान पहाड़ी जलवायु, ऑर्गेनिक कृषि और स्थानीय मिट्टी से जुड़ी है, जो इसे मैदानी क्षेत्रों की राजमा से बिल्कुल अलग बनाती है. चकराता की राजमा का स्वाद अन्य राजमाओं से काफी अधिक विशिष्ट होता है. पकने के बाद इसकी सुगंध दूर तक फैलती है. बिना किसी रासायनिक खाद के, पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से उगाई जाने वाली यह राजमा प्रोटीन और औषधीय गुणों से भरपूर होती है. पहाड़ी क्षेत्रों में सर्दियों में शरीर को ऊर्जा और गर्माहट देने के लिए इसका खूब सेवन होता है. राजमा की बुवाई जून में की जाती है और यह ठंड के मौसम में तैयार हो जाती है. चकराता की ऊंचाई, ठंडा मौसम और 6.0 से 7.0 pH वाली बलुई-दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए बेहद उपयुक्त है. जौनसार–बावर के बनगांव, ऊपरौली, अठगांव, द्वार, बिशलाड़, बौनंदूर, तपलाड़, भरम और मशक जैसे गाँवों में इसकी अच्छी पैदावार होती है. राजमा की खेती उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में होती है, लेकिन चकराता के राजमा की बात ही अलग है. यूपी, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में इसकी भारी मांग है, लेकिन खेती लगातार सिमटती जा रही है. आज भी रासायनिक खादों से दूर रहकर जैविक खेती करते हैं। पहाड़ी मिट्टी और जलवायु इस फसल को और भी खास बना देती है। यह राजमा न सिर्फ स्वाद में बेहतर है, बल्कि पचाने में आसान और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद मानी जाती है। इस राजमा में प्रोटीन, फाइबर, आयरन और विटामिन्स भरपूर होते हैं। जो ऊर्जा का स्रोत है, बल्कि वजन नियंत्रण में भी सहायक है। खासकर शाकाहारी लोगों के लिए यह एक बेहतरीन प्रोटीन विकल्प है।साल 2014 में जहां 1101 हेक्टेयर भूमि पर इसकी खेती होती थी, वहीं अब यह घटकर करीब 981 हेक्टेयर रह गई है. इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं. पहाड़ी इलाकों में खेत छोटे और बिखरे हुए हैं, चकबंदी न होने से खेती और फसल प्रबंधन मुश्किल हो जाता है.सबसे बड़ी समस्या है मंडी तक पहुंच. पहाड़ से मैदानी मंडियों तक राजमा पहुंचाना महंगा और समय लेने वाला काम है.उचित मंडी व्यवस्था और खरीद केंद्रों की कमी किसानों को हतोत्साहित करती है.तापमान में लगातार बदलाव, अनियमित बारिश और रोगों का बढ़ता प्रकोप भी पैदावार को नुकसान पहुमचा रहा है.कई बार अंकुरण के दौरान ही दालें बीमारी से पीली पड़कर सूख जाती हैं, जिससे पूरी फसल प्रभावित होती है जौनसार बावर जनजातीय क्षेत्र में दाल की फसलों को महत्त्व दिया जाता हैं। स्थानीय किसान जरूरत के अनुसार दाल रखने के बाद पूरे साल भर का खर्च चलाने के लिए बची हुई फसल बेच देते हैं। जौनसार क्षेत्र की राजमा चकराता के नाम से शहरों में चर्चित है। लेकिन इस बार क्षेत्र में स्थानीय दालों को ग्रहण लग गया है।  सेहत के लिहाज से यह पौष्टिक है और स्वाद में भी लाजवाब. राज्य के किसान इसे गर्व से अपनी पहचान के रूप में देखते हैं. प्रकृति की गोद में उगने वाली यह फसल न सिर्फ लोगों के स्वाद का हिस्सा है बल्कि स्थानीय किसानों की आय का भी मजबूत जरिया बन चुकी है.
*लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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