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चारधाम यात्रा उमड़ा आस्था का सैलाब

25/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

सरकार और स्थानीय प्रशासन को उम्मीद है कि इस साल यात्रा पिछले सभी वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ सकती है. सरकार और स्थानीय प्रशासन को उम्मीद है कि इस साल यात्रा पिछले सभी वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ सकती है. सरकार और स्थानीय प्रशासन को उम्मीद है कि इस साल यात्रा पिछले सभी वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ सकती है.देेश के मैदानी इलाकों में पड़ रही भयंकर गर्मी से निजात पाने और इसी बहाने हिमालयी तीर्थों में पुण्य लाभ कमाने के लिए इस वर्ष उत्तराखण्ड के विख्यात चार धामों और पर्यटन स्थलों पर अत्यधिक भीड़ उमड़ रही है जिसे संभालना उत्तराखण्ड सरकार के बूते से बाहर हो गया है। आशा से अधिक जनसमुदाय के हिमालय पर उमड़ पड़ने के कारण चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से लेकर परिवहन, आवास एवं शौचालय की जैसी सुविधाएं नाकाफी हो गई हैं।ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर इन दिनों यात्रा सीजन के चरम पर पहुंचने के साथ लंबा जाम आम लोगों और यात्रियों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन गया है. बदरीनाथ धाम और हेमकुंड साहिब यात्रा में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है, लेकिन यातायात व्यवस्था के लिए अब तक कोई प्रभावी रोड मैप तैयार नहीं हो पाया है. हालात ऐसे हैं कि कई स्थानों पर यात्रियों को घंटों तक वाहनों में फंसे रहना पड़ रहा है. जाम की समस्या केवल जोशीमठ तक सीमित नहीं है, बल्कि कर्णप्रयाग समेत कई प्रमुख पड़ावों पर भी लगातार लंबी वाहनों की कतारें देखने को मिल रही हैं. पहाड़ी क्षेत्रों की संकरी सड़कों और बढ़ते वाहनों के दबाव ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है.स्थानीय लोगों का कहना है कि यात्रा सीजन शुरू होते ही बाजारों और मुख्य मार्गों पर आवाजाही प्रभावित हो जाती है. जरूरी कार्यों के लिए निकलने वाले लोगों को भी घंटों जाम में फंसना पड़ रहा है. कई बार मरीजों और स्कूली बच्चों तक को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. पुलिस प्रशासन और यातायात व्यवस्था संभालने वाले अधिकारी लगातार जाम खुलवाने में जुटे हैं, लेकिन यात्रियों की बढ़ती संख्या के आगे व्यवस्थाएं नाकाफी साबित हो रही हैं. चारधाम यात्रा के दौरान हर वर्ष जाम की समस्या सामने आती है, लेकिन इस बार श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने से हालात और अधिक चुनौतीपूर्ण बन गए हैं. स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि यात्रा सीजन के लिए स्थायी ट्रैफिक प्लान तैयार किया जाए, ताकि आम लोगों और यात्रियों को राहत मिल सके. सिखों के पवित्र तीर्थस्थल हेमकुंड साहिब के कपाट 23 मई को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खुलने के बाद यात्रा ने रफ्तार पकड़ ली है. देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु हेमकुंड साहिब पहुंच रहे हैं. श्रद्धा और आस्था के इस महापर्व को सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित बनाने के लिए चमोली पुलिस और आतंकवादी निरोधक दस्ता (एटीएस) पूरी तरह अलर्ट मोड पर हैं. बद्नीनाथ और केदारनाथ में क्षमता से कहीं अधिक तीर्थ यात्रियों के पहुंचने से आवासीय व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। नैनीताल में तो हालत इतनी खराब है कि पर्यटकों के वाहनों को 10 किमी पीछे ही रोक दिया जा रहा है। चारों धामों में इस बार एक माह की अवधि में ही हृदय गति रुकने और ठण्ड आदि से मरने वाले की संख्या 41 तक पहुंच गई है। इन मौतों में सड़क दुघटनाओं में मरने वाले शामिल नहीं हैं। संवेदनशील हिमालय पर इतनी भीड़ ने पर्यावरण प्रेमियों की पेशानी पर भी बल डाल दिए हैं शासन प्रशासन द्वारा पर्यटन और तीर्थाटन के लिए की गई तमाम व्यवस्थाएं यात्रा मार्ग के आधार ऋषिकेश में ही जवाब दे गई हैं। ऋषिकेश के अलाया चारधाम यात्रा मार्ग पर 10 बायोमीट्रिक रजिस्ट्रेशन केन्द्र बनाए गए हैं। भारी भीड़ के कारण चारधाम यात्रा के आधार केन्द्र ऋषिकेश में यत्रियों को चारधाम ले जाने वाली बसों का भारी टोटा पड़ गया है। गढ़वाल की दो सबसे बड़ी परिवहन कंपनियों में से एक टीजीएमओ कम्पनी के अध्यक्ष के अनुसार कंपनी की कुल 600 बसों में से लगभग 300 बसें यात्रा में लगी हुई हैं। नेगी के अनुसार लोग अब प्रायः अपने निजी वाहनों से ही चारधाम यात्रा कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार वहां पर आजकल हर रोज यात्रियों को भेजने के लिए लगभग 200 बसों की जरूरत है, मगर इतनी बसों की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। कुमाऊं मण्डल से भी बसें मंगाने पर समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। मजबूरन यात्रियों को या तो होटल और धर्मशालाओं में बसें मिलने तक शरण लेनी पड़ रही है या फिर ऊंची दरों पर टैक्सियां और जीपें लेनीं पड़ रहीहैं।ऋषिकेश में सफाई व्यवस्था चरमरा रही है और स्वच्छ पेयजल के लिए आम यात्रियों को बोतलबंद पानी का सहारा लेना पड़ रहा है। इतनी भीड़ के लिए टीकाकरण की व्यवस्था भी नाममात्र की रह गई है। अधिकांश बसें तीर्थ यात्रियों को ढोने पर लगा दिए जाने से प्रदेश के स्थानीय यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इतनी विशाल अनियंत्रित भीड़ का हिमालय पर पहुंचना पारितंत्र के लिए नुकसानदेह माना जा रहा है। पर्यावरणविदों के अनुसार हिमालय पर ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने की लालसा केदारनाथ जैसी एक और आपदा का निमंत्रण दे सकती है। गढ़वाल गजेटियर के अनुसार 20 वीं सदी के मध्य तक प्रति वर्ष लगभग 50 से लेकर 60 हजार तक तीर्थयात्री बद्रीनाथ आते थे। लेकिन आज लाखों की संख्या में यात्री अपने वाहनों समेत बदरीनाथ और गंगोत्री तक जा रहे हैं। तीर्थयात्रा के नाम पर इस तरह लाखों की संख्या में वाहनों के सीधे सतोपन्थ ग्लेशियर और गंगोत्री ग्लेशियर के एकदम निकट पहुंचने से उत्पन्न लोकल वार्मिंग से भी पारितंत्र प्रभावित हो रहा है।वैज्ञानिकों का मत है कि ये वाहन मैदान की तुलना में पहाड़ पर चार गुना प्रदूषण करते हैं। मैदानों में प्रायः 60 किलोमीटर प्रति घण्टा चलने वाले वाहन पहाड़ों की चढ़ाइयों और तेज मोड़ों पर पहले और दूसरे गेयर में 20 किलोमीटर से भी कम गति से चल पाते हैं। जिससे उनका ईंधन दोगुना खर्च होता है। इस स्थिति में वाहन न केवल कई गुना अधिक काला दूषित धुआं छोड़ते हैं बल्कि इतना ही अधिक वातावरण को भी गर्म करते हैं। समुद्रतल से ऊंचाई के साथ ही पर्यावरणीय संवेदनशीलता भी बढ़ती जाती है।हिमालय पर ऊंचाई बढ़ने के साथ ही ऑक्सीजन और वर्षा कम होने लगती है। उत्तराखण्ड की चारधाम यात्रा ऋषिकेश से शुरू होती है, जो कि समुद्रतल से लगभग 300 मीटर की उंचाई पर स्थित है। वाहन यहां से शुरू होकर समुद्रतल से 3042 मीटर की उंचाई पर स्थित गंगोत्री और 3133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ पहुंचते हैं।एक अनुमान के अनुसार एक यात्रा सीजन में लगभग 30 हजार वाहन सीधे गंगोत्री पहुचंते हैं। इतने वाहन अगर गोमुख के इतने करीब पहुंचेंगे तो वाहनों की आवाजाही का सीधा असर गंगोत्री ग्लेशियर पर पड़ना स्वाभाविक ही है। ॥लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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