डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं में गंगा दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और प्रकृति संरक्षण का अद्भुत संगम माना जाता है. यहां सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार गंगा दशहरा के अवसर पर घरों की चौखट पर विशेष द्वार पत्र लगाया जाता है. मान्यता है कि यह पत्र घर को बुरी नजर, नकारात्मक शक्तियों, आग, चोरी और आकाशीय बिजली जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखता है. कुमाऊं के गांवों में आज भी यह परंपरा उतनी ही श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जाती है, जितनी वर्षों पहले निभाई जाती थी.गंगा दशहरा के इस विशेष द्वार पत्र को आकर्षक ज्यामितीय आकृतियों और रंग-बिरंगे डिजाइनों से सजाया जाता है. पत्र के बीच में एक वृताकार चक्र बनाया जाता है, जिसे पेंसिल और परकार की सहायता से तैयार किया जाता है. इसके बाद इसमें हरे, पीले और लाल रंगों से सुंदर सजावट की जाती है. वृत के बाहर पांच ऋषियों अगस्त्य, पुलस्त्य, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्त के नाम लिखे जाते हैं. साथ ही इसमें “वज्र निवारक मंत्र” अंकित किया जाता है, जिसे अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंत्र घर को वज्रपात, अग्नि दुर्घटना और नकारात्मक शक्तियों से बचाता है. यही कारण है कि कुमाऊं अंचल के लगभग हर गांव में गंगा दशहरा पर यह परंपरा विशेष उत्साह के साथ निभाई जाती है. पहले इन पत्रों को प्राकृतिक रंगों से तैयार किया जाता था. दाड़िम, अखरोट, बुरांश और किलमोड़ जैसे पेड़-पौधों से रंग बनाकर इन पत्रों को सजाया जाता था, लेकिन समय के साथ अब बाजार में मिलने वाले वाटर कलरों का इस्तेमाल बढ़ गया है. कुमाऊं में ब्राह्मण समाज गंगा दशहरा से पहले इन द्वार पत्रों को हाथों से तैयार कर अपने यजमानों को वितरित करता है. पर्व के दिन लोग सुबह नदी, नौले या अन्य जल स्रोतों में स्नान करते हैं और घर लौटकर विधि-विधान से द्वार पत्र को मुख्य दरवाजे की चौखट के ऊपर स्थापित करते हैं. लोगों का विश्वास है कि यह पत्र पूरे वर्ष घर की रक्षा करता है और सुख-समृद्धि बनाए रखता है. राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हुईं, लेकिन उनके तीव्र वेग को संभालना धरती के लिए संभव नहीं था. तब भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में समाहित कर उनके वेग को नियंत्रित किया और धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया. यही कारण है कि गंगा दशहरा को जल संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक भी माना जाता है. कुमाऊं की यह अनोखी परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें प्रकृति, जल स्रोतों और पर्यावरण के संरक्षण का संदेश भी देती है. आधुनिकता के इस दौर में भी जब गांवों की चौखट पर रंग-बिरंगे द्वार पत्र सजते हैं, तो ऐसा लगता है मानो सदियों पुरानी संस्कृति आज भी जीवित होकर लोगों के जीवन में सुरक्षा और विश्वास का भाव भर रही हो. उत्त्तराखंड के कुमाऊंनी क्षेत्रों में तीज त्योहारों की अपनी अलग पहचान है। लगभग हर माह में कुछ न कुछ त्योहार तो होते ही है। इन उत्सवों में कुछ न कुछ किवदंतियां भी जुड़ी हुई है। इसी में एक है गंगा दशहरा द्वार पत्रक। जो पुरानी परम्परा एवं कुमाऊंनी संस्कृति से जुड़ी हुई है। गंगादशहरा पर्व के दिन दरवाजों के उपर गंगा दशहरा पत्रक लगाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। गंगा मैय्या के पृथ्वी पर आने की खुशी और अग्नि व भय से बचने के लिए गंगा दशहरा मनाया जाता है। इस गंगा दशहरा देने कुल ब्रह्माण आते है। गंगा दशहरा की प्रतिष्ठा कर अपने यजमान को देते है। यह पर्व जेष्ठ मास की दशमी शुक्ल पक्ष को मनाया जाता है। पंडित घर-घर जाकर गंगा दशहरा पत्र बाटते है।आज के आधुनिक युग में यह गंगा दशहरा पत्र बाजारों में आसानी से उपलब्ध हो जाता है। लेकिन पूर्व में पंडितों द्वारा खुद तैयार किया जाता था। एक चक्र बनाकर उसके अंदर विभिन्न रंगों व लक्ष्मी, गणेश जी, शिव पार्वती, ऊं आदि के चित्र बनाए जाते है। गोल चक्र के अंदर एक श्लोक अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च वैशमपायनमेव व, जैमिनिश्च सुमन्तुश्च पंचैते वज्रवारका लिखा रहता है। पंडितों द्वारा जब गंगा दशहरा अपने यजमानों को दिया जाता है। बदले में दक्षिणा दी जाती है। पहले के समय में गंगा दशहरा पत्र के बदले में पंडित को अनाज दिया जाता था। गंगा जी के धरती में आने के पर्व को पूरे देश मे मनाया जाता है। लेकिन गंगा दशार पत्र कुमाऊंनी क्षेत्रों में बांटने की परम्परा है। गंगा दशहरा हमें केवल पूजा की विधि नहीं सिखाता, बल्कि जीवन की संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाता है। यदि गंगा हमारी संस्कृति की सांसें हैं, तो उन सांसों को जीवित रखने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। आज आवश्यकता केवल गंगा की आरती उतारने की नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व की रक्षा करने की भी है। क्योंकि सभ्यताएं तब तक जीवित रहती हैं, जब तक उनकी नदियां जीवित रहती हैं। मां गंगा के प्रति हमारी श्रद्धा तब सार्थक होगी, जब आने वाली पीढ़ियां भी उसी निर्मल धारा को देखें, जिसे हमारे पूर्वजों ने “मोक्षदायिनी” कहा था। गंगा केवल नदी नहीं — वह भारत की बहती हुई संस्कृति है, और संस्कृति की सांसें कभी रुकनी नहीं चाहिए। गंगा दशहरा का पर्व बेहद पवित्र माना जाता है. कहा जाता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति को दस प्रकार के पापों से मुक्ति मिलने का आशीर्वाद प्राप्त होता है. इनमें तीन कायिक यानी शरीर से जुड़े पाप शामिल हैं. हिंसा करना, चोरी करना और अनुचित आचरण अपनाना. वहीं वाणी से होने वाले चार पापों में झूठ बोलना, कटु शब्द कहना, चुगली करना और दूसरों की निंदा करना शामिल माना गया है. इसके अलावा मन से जुड़े तीन पाप लालच, ईर्ष्या और नकारात्मक या अशुद्ध विचार भी इसमें आते हैं. मान्यता है कि गंगा दशहरा पर श्रद्धा से स्नान और पूजा करने से आत्मिक शुद्धि का लाभ मिलता है.नमामि गंगे तव पाद पंकजम्,सुरासुरैः वंदित दिव्य रूपम्।भुक्तिं च मुक्तिं च ददासि नित्यं,भावानुसारेण सदा नराणाम्॥लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











