डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड वैसे तो धार्मिक और कई खूबसूरत जगहों के लिए जाना जाता है, मगर राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में ऊखीमठ से लगभग 45 किलोमीटर दूर तुंगनाथ और चोपता में धर्म और खूबसूरती का ऐसा संगम है, जो हर किसी का मन मोह लेता है. चोपता 12 से 14 हजार फीट की ऊंचाई पर बसा हुआ है और यह गढ़वाल-हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है.जनवरी-फरवरी के महीनों में आमतौर पर बर्फ की चादर ओढ़े इस जगह की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है. इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता हर किसी का दिल जीत लेती है. यही वजह है कि पर्यटक इसकी तुलना स्विट्जरलैंड से भी करते हैं. गढ़वाल में स्थित तुंगनाथ मंदिर का पवित्र इलाका जिसे तृतीय केदार कहा जाता है और चोपता की खूबसूरत घाटियां हर साल हज़ारों श्रद्धालुओं, ट्रेकर्स और प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर खींचती हैं। जहां कुछ सैलानी हिमालय के नजारे और बर्फ की चादर देखने आते हैं, वहीं कुछ लोग बाबा तुंगनाथ के मंदिर में आशीर्वाद पाने के लिए मुश्किल ट्रेकिंग करते हैं। लेकिन अब इस इलाके की प्राकृतिक सुंदरता फीकी पड़ रही है। इसकी वजह है इधर-उधर बिखरा प्लास्टिक कचरा और गंदगी।क्षेत्र में बढ़ते पर्यटन और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के सुंदर बुग्याल (घास के मैदान) सिमट रहे हैं। इससे राज्य पक्षी हिमालयन मोनाल सहित कई प्रजातियां भी संकट में हैं। इलाके में हिमालयन मोनाल तो नहीं दिखते, लेकिन पर्यटकों के लिए बने अस्थायी शौचालयों की गंदगी, हर तरफ बिखरे प्लास्टिक रैपर और घास के मैदान की ढलान से बहता गंदा पानी ज़रूर दिखा।चोपता घाटी हिमालयन मोनाल, थार और रेड फॉक्स जैसी प्रजातियों से समृद्ध है। इसे वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा प्राप्त है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पर्यटकों की भारी भीड़ ने इन प्रजातियों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। स्थानीय लोगों और मंदिर के पुजारियों ने प्राकृतिक जैव-विविधता के नुकसान पर चिंता जताई है।तीर्थ पुरोहित ने बताया कि पर्यटक निर्देशों की अनदेखी करते हैं। वे पक्के रास्तों पर चलने के बजाय घास के मैदानों पर चलते हैं। इससे मुलायम घास खराब होती है और मिट्टी का कटाव बढ़ता है। हर साल करीब पांच से छह लाख लोग तुंगनाथ का दौरा करते हैं। पर्यटन का चरम दौर पक्षियों के प्रजनन काल से मेल खाता है। पर्यटक फूल तोड़ते हैं और घास कुचलते हैं, ऐसी हरकतें इस इलाके के पेड़-पौधों और जानवरों के प्राकृतिक पनपने के चक्र को बिगाड़ती हैं।चाय की दुकानों के पास कचरा बिखरा दिखाई देता है। नीले टेंट वाले शौचालयों का गंदा पानी बुग्याल में रिसता है। इससे प्राकृतिक जल स्रोत दूषित हो गए हैं। पिछले 10 वर्षों में घास के मैदान और जंगल बहुत खराब हुए हैं। पूरे साल चोपता इलाके में कैंपिंग गतिविधियों का प्रचार भी जलवायु परिवर्तन की बर्बादी को बढ़ावा दे रहा है। ज़्यादा पर्यटन से प्लास्टिक कचरा भी बढ़ रहा है। हालांकि कई जगहों पर डस्टबिन लगाए गए हैं फिर भी पर्यटक कचरा इधर-उधर फेंक देते हैं। घास के मैदानों में तेज़ हवा चलने के कारण प्लास्टिक से निकलने वाला रिसाव मिट्टी के पोषक तत्वों को बदल देता है, जिससे वहां उगने वाले पौधों पर भी असर पड़ता है। हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे हटने की वजह से, घास के मैदान ऊंचाई की ओर बढ़ रहे हैं और इसी तरह घास और पेड़ों की सीमाएं भी ऊपर खिसक रही हैंइसके अलावा ”बीयर बॉटल पर्यटन” ने जानवरों और पक्षियों की आवाजाही रोक दी है। कचरा फेंकने वाली जगहों के पास अब हिरण और एंटिलोप के झुंड दिखते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बंदर मोनाल और दूसरे तीतर-जैसे पक्षियों के घोंसले नष्ट कर रहे हैं। हाल के वर्षों में बंदरों की आबादी बढ़ी है। पहले इस इलाके में लंगूर पाए जाते थे बंदर नहीं। नेचर व बर्ड फोटोग्राफर राजू पुसोला ने भी पर्यटकों की भीड़ और हेलीकॉप्टरों के शोर से मोनाल के खाना खोजने और प्रजनन व्यवहार में बदलाव देखा है। उन्होंने बताया कि एक बार बारिश के दौरान मोनाल को वहां पड़े पैकेट से कुरकुरे खाते देखा था। इन खाने का असर उनकी प्रजनन क्षमता पर पड़ना स्वाभाविक है।चोपता घाटी में गाड़ियों व पर्यटकों के शोर और हेलिकॉप्टरों की आवाजाही की वजह से पक्षियों के आवाज के ज़रिए होने वाले कम्युनिकेशन में रुकावट आती है। मोनाल साथी को आकर्षित करने के लिए अपनी आवाज को और तेज़ करने की कोशिश करता है। इससे उसकी सेहत और क्षमता पर असर पड़ता है, जिसका प्रभाव प्रजनन पर भी होता है। शोर की वजह से उनके अंडे देने और सेने (इनक्यूबेशन) का समय गड़बड़ा जाता है, जिससे चूजों के जिंदा रहने पर खतरा मंडराता है। भविष्य में यह बदलाव प्रजाति के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है। पर्यावरणविद का कहना है कि ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि पर्यटक प्लास्टिक कचरा लेकर ही न जा सके। वह ट्रेक पर जाएंगे तो कचरा वहीं फेंकेंगे, उन्हें एकत्रित तो कर लेंगे लेकिन उनका शोधन कहां होगा। इसके लिए एक नियंत्रण प्रणाली लागू करनी होगी ताकि यात्रियों को जरूरत का सामान ट्रेक से पहले दिया जाए और वह इधर-उधर न फेंके। पर्यटकों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी विकसित करना होगा। साथ ही स्थानीय लोगों को इसमें योगदान देना होगा। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रशासनिक घोषणाएं और प्रस्तावित योजनाएं समय पर धरातल पर उतर पाएंगी, या फिर प्रकृति की गोद में बसा यह खूबसूरत पर्यटन स्थल धीरे-धीरे गंदगी और प्लास्टिक प्रदूषण की भेंट चढ़ जाएगा? यदि जिम्मेदार विभागों ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए तो संगम व्यू प्वाइंट की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता नहीं, बल्कि कूड़े के ढेर और बदहाल व्यवस्थाएं बनकर रह जाएंगी.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











