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देश में कंप्यूटर क्रांति के जनक थे राजीव गांधी

21/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
राजीव गांधी (20 अगस्त 1944 – 21 मई 1991) को भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री और ‘आधुनिक भारत’ के प्रवर्तक/शिल्पकार के रूप में याद किया जाता है। वे आधुनिक भारत के ऐसे नेता थे जिन्होंने परंपरागत राजनीति में नवाचार, तकनीकी सोच और युवाओं की भागीदारी को प्राथमिकता दी, लेकिन उनके जीवन और कार्यों से जुड़ी कई खास बातें ऐसी हैं, जो आम तौर पर कम ही लोग जानते हैं।राजीव गांधी राजनीति में नहीं आना चाहते थे।दरअसल, वे पेशे से पायलट थे और इंडियन एयरलाइंस में काम करते थे। इंदिरा गांधी की असमय मृत्यु और संजय गांधी के निधन ने उन्हें राजनीति में आने पर मजबूर किया। महज़ 40 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बनने वाले वे भारत के इतिहास के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे।उन्होंने लंदन के इंपीरियल कॉलेज और ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज में पढ़ाई की, लेकिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई अधूरी छोड़ दी थी। सोनिया गांधी से उनकी मुलाकात कैम्ब्रिज में एक इटैलियन रेस्टोरेंट में हुई थी, और दोनों का विवाह 1968 में हुआ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे बहुत ही सादगी पसंद थे तथा उनके दोस्त उन्हें ‘राजा’ कहकर बुलाते थे।आज हम डिजिटल इंडिया की ओर अग्रसर हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते होंगे कि राजीव गांधी ही हमारे देश में कंप्यूटर क्रांति के असली जनक माने जाते हैं। दूसरे शब्दों में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि देश में ‘कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी’ की नींव रखने का असली श्रेय उन्हें ही जाता है। उन्हें कंप्यूटर, संचार और सूचना तकनीक से खास लगाव था। उनके प्रयासों से भारत में कंप्यूटर और टेलीकॉम क्रांति की शुरुआत हुई। हालांकि, 1980 के दशक में कंप्यूटर लाने के कारण उनका खूब विरोध भी हुआ था।उनके कार्यकाल में भारत में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।उन्होंने पंचायती राज को मजबूत किया। युवाओं के लिए 18 वर्ष की उम्र में उन्हें मतदान का अधिकार दिलवाना उनका एक बहुत बड़ा कदम था। सच तो यह है कि उनका यह कदम युवाओं को राजनीति में सीधे तौर पर जोड़ने के लिए ऐतिहासिक माना जाता है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि 64वां संशोधन विधेयक (1989) राजीव गांधी सरकार द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से पेश किया गया था, लेकिन यह राज्यसभा में पारित नहीं हो सका था। तथा 65वां संशोधन अधिनियम, 1990, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग की स्थापना से संबंधित था, और इसमें विशेष अधिकारी के पद को हटा दिया गया था।64वें संविधान संशोधन विधेयक (1989) का उद्देश्य क्रमशः पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देना,उन्हें अधिक शक्तिशाली और व्यापक बनाना तथा राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करना था, वहीं दूसरी ओर 65वें संविधान संशोधन अधिनियम (1990) का उद्देश्य क्रमशः अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए एक बहु-सदस्यीय राष्ट्रीय आयोग की स्थापना करना, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष अधिकारी का पद हटाना तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कल्याण और विकास के लिए आयोग को अधिक प्रभावी बनाना था। सत्ता का विकेंद्रीकरण करने के लिए राजीव गांधी ने 73वां और 74वां संवैधानिक संशोधन लाने की पहल की तथा पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक मान्यता दी।इससे आम जनता को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार मिला। राजीव गांधी विदेश नीति में बहुत ही दूरदर्शी व्यक्तित्व थे और पड़ौसी देश श्रीलंका में शांति सेना(आइपीकेएफ) भेजना उनका बड़ा कदम था। हालांकि, यह विवादास्पद जरूर रहा, लेकिन वे क्षेत्रीय स्थिरता के पक्षधर थे।गुटनिरपेक्ष आंदोलन (एनएएम) और शांति प्रयासों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इतना ही नहीं, उन्होंने देश में आर्थिक उदारीकरण की नींव रखी। इस क्रम में लाइसेंस-परमिट राज को कम करने और अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में पहल की तथा उद्योग और व्यापार को सरल बनाने के कदम उठाए। एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्हें फोटोग्राफी और पश्चिमी संगीत का गहरा शौक था तथा यात्रा में अक्सर अपना कैमरा साथ रखते थे। इतना ही नहीं, उन्हें मोटरबोटिंग और फ्लाइंग का भी शौक था। कहना ग़लत नहीं होगा कि वे भारत को 21वीं सदी में आधुनिक और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। बहुत कम लोग ही यह बात जानते होंगे कि उन्होंने दूरसंचार, टेक्नोलॉजी और शिक्षा में बड़े सुधार किए थे।एमटीएनएल और पीसीओ बूथों का नेटवर्क उन्हीं की पहल का नतीजा था। उन्होंने देश में जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना कर ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का अवसर दिया। साफ-सुथरी, बेदाग राजनीति के कारण मीडिया ने उन्हें ‘मिस्टर क्लीन’ की छवि प्रदान की थी। मरणोपरांत (वर्ष 1991) उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। अंत में यही कहूंगा कि राजीव गांधी ने भारतीय राजनीति को पारंपरिक ढांचे से निकालकर आधुनिक युग की ओर मोड़ा। सूचना प्रौद्योगिकी, शिक्षा, पंचायत सशक्तीकरण और देश के युवाओं को राजनीति में जोड़ने का उनका प्रयास भारत के राजनीतिक इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। सच तो यह है कि उनकी दूरदृष्टि ने भारत को 21वीं सदी की चुनौतियों के लिए तैयार किया। राजनीति में कोई अजातशत्रु नहीं होता है। राजनीति ही नहीं बल्कि जीवन मे भी कोई व्यक्ति अजातशत्रु नहीं हो सकता है। यह शब्द एक नाम तो हो सकता है पर एक विशेषण नहीं । राजीव भी नहीं थे। वे अपने विरोधियों के प्रति सदय भी थे। पूर्व प्रधानमंत्री, अटल बिहारी बाजपेयी के प्रति उनकी सदाशयता, जिसका उल्लेख स्वयं अटल जी ने कई बार किया है, उनके व्यक्तित्व के मानवीय पक्ष को उजागर करती है। राजीव गांधी का सबसे बड़ा योगदान था, जड़ता को तोड़ कर आधुनिकता के सोपान पर बढ़ जाना। संचार क्रांति, आईटी, कम्प्यूटर, आदि जो कभी बेरोजगारी बढाने के साधन समझे गए थे, आज इन क्षेत्रों में भारतीय पेशेवर दुनिया भर में छाये हुये हैं। राजीव को इस वैज्ञानिक क्रांति का अग्रदूत कहा जा सकता है। 1991 में अगर उनकी हत्या न हुयी होती तो क्या हुआ होता, ऐसे सवालों का जवाब नियति ही दे सकती है। आज जब 21 मई को उनकी पुण्यतिथि पर हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो साफ दिखता है कि राजीव गांधी सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक ऐसे शिल्पकार थे जिन्होंने आधुनिक भारत की बुनियाद को गढ़ा. उनका विश्वास था कि युवा अगर देश की नीतियों का हिस्सा बनें, तो बदलाव स्थायी और शक्तिशाली होगा. शायद यही कारण है कि आज भी उनके विचार चाहे वो पंचायती राज की बात हो या सूचना क्रांति की भारत के नीति-निर्माताओं और युवाओं के लिए दिशा-प्रदर्शक बने हुए हैं21 मई 1991 को उनकी हत्या से ठीक पहले उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था, “मुझे मौत का डर नहीं है, क्योंकि मेरा जीवन इस देश के लिए समर्पित है.” यह उनके जीवन का अंतिम सार्वजनिक संदेश बना.किन उनकी नीतियों और विचारों का प्रभाव आज भी भारत की राजनीति और विकास में देखा जा सकता है। उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया, जो उनके योगदान का एक प्रमाण है। राजीव गांधी का जीवन एक ऐसा उदाहरण है कि कैसे एक व्यक्ति जो राजनीति में नहीं आना चाहता था, उसने देश को एक नई दिशा दी और आधुनिक भारत की नींव रखी। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने युवा सोच और तकनीकी ज्ञान के साथ परंपरा को जोड़ा। किन उनकी नीतियों और विचारों का प्रभाव आज भी भारत की राजनीति और विकास में देखा जा सकता है। उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया, जो उनके योगदान का एक प्रमाण है। राजीव गांधी का जीवन एक ऐसा उदाहरण है कि कैसे एक व्यक्ति जो राजनीति में नहीं आना चाहता था, उसने देश को एक नई दिशा दी और आधुनिक भारत की नींव रखी। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने युवा सोच और तकनीकी ज्ञान के साथ परंपरा को जोड़ा। किन उनकी नीतियों और विचारों का प्रभाव आज भी भारत की राजनीति और विकास में देखा जा सकता है। उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया, जो उनके योगदान का एक प्रमाण है। राजीव गांधी का जीवन एक ऐसा उदाहरण है कि कैसे एक व्यक्ति जो राजनीति में नहीं आना चाहता था, उसने देश को एक नई दिशा दी और आधुनिक भारत की नींव रखी। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने युवा सोच और तकनीकी ज्ञान के साथ परंपरा को जोड़ा।
आज जब भारत तकनीकी प्रगति, डिजिटल क्रांति और युवा शक्ति के बल पर विश्व मंच पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, तब राजीव गांधी के विचार और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। उनकी पुण्यतिथि हमें यह प्रेरणा देती है कि राष्ट्र निर्माण के लिए दूरदृष्टि, नवाचार, शिक्षा और युवाओं की शक्ति पर विश्वास अत्यंत आवश्यक है।राजीव गांधी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो भविष्य को पहचानकर देश को नई दिशा देने का साहस रखता हो। आधुनिक भारत के निर्माण में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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