डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
ग्लोबल वॉर्मिंग का असर अंटार्कटिका से लेकर हिमालय तक देखने को मिल रहा है. भारत सहित एशिया की 200 करोड़ आबादी को पानी और भोजन देने वाले हिंदुकुश हिमालय पर खतरा मंडरा रहा है. जलवायु परिवर्तन के साथ ही, ग्रीन हाउस इफेक्ट, कार्बन उत्सर्जन और प्राकृतिक संसाधनों के दुरुपयोग, लगातार बढ़ती आबादी तक की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं. बर्फ का कवर लगातार कम हो रहा है. म्यांमार से लेकर अफगानिस्तान तक फैली इस विशाल पर्वत श्रृंखला का दायरा साल-दर-साल घटता ही जा रहा है. बर्फबारी के स्तर में रिकॉर्ड गिरावट आई है. इस हिमालयी इकोसिस्टम में हो रहे बदलाव से 50 करोड़ तक की आबादी पर सीधा असर पड़ेगा.एशिया का ‘वॉटर टॉवर’ कहे जाने वाले हिमालयी क्षेत्र के शिखर अब सूख रहे हैं. एक नई रिपोर्ट के अनुसार, इस साल हिंदू कुश हिमालय इलाके में बर्फ के कवर का औसत से 27.8% कम रहा है, जो पिछले दो दशकों में सबसे निचला स्तर है. उत्तराखंड का गंगोत्री ग्लेशियर का इलाका गंगा नदी का मुख्य सोर्स है. इसके पिघलने की दर भी पिछले दो दशकों में दोगुनी हो गई है. 1940 के दशक से लेकर 2025 तक के समय पर गौर करें तो इसमें 1700 मीटर की कमी दर्ज की गई है. हर साल 28 से 30 मीटर की दर से पिघल रहा है. हिमालय क्षेत्र में बे-मौसम बर्फबारी और बारिश का सिलसिला पिछले कुछ दशकों से लगातार जारी है. जिसका असर सीधे ग्लेशियर पर पड़ता दिखाई दे रहा है. ग्लेशियर का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिक बदलते इस चक्र को लेकर काफी चिंता जाहिर कर रहे हैं. हाल ही में पिंडारी ग्लेशियर पर हुए अध्ययन में तमाम चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. अगर स्थिति ऐसी ही रही तो आने वाले समय में पिंडारी ग्लेशियर का वॉल्यूम काफी अधिक सीमित हो जाएगा.वैज्ञानिकों के अध्ययन में चौंकाने वाले मामले भी सामने आए हैं. जिसके तहत दिसंबर महीने में जहां ग्लेशियर के आगे सर्फेस का तापमान माइंस डिग्री सेल्सियस में होना चाहिए तो वहीं, ये तापमान 5 डिग्री सेल्सियस के आसपास पाया गया है. उच्च हिमालय क्षेत्र पर मौजूद ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं. खासकर, सेंट्रल और वेस्टर्न हिमालय में मौजूद ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं. ये घटनाएं वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं. खास बात ये है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी होने के बावजूद भी ग्लेशियर सेहतमंद नहीं हो रहे हैं. जिसके पीछे बेमौसमी बर्फबारी एक बड़ी वजह मानी जा रही है. जिसके चलते स्नो ग्लेशियर पिघल जा रहे हैं. उच्च हिमालय क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियरों को लेकर समय-समय पर वैज्ञानिक अध्ययन करते रहे हैं. इसी क्रम में वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी के ग्लेशियोलॉजिस्ट ने पिंडर एवं काफनी बेसिन में पिछले कुछ सालों में हुई बर्फबारी पर अध्ययन किया. जिसमें यह जानने की कोशिश की गई है कि आखिर बर्फबारी अधिक होने के बावजूद ग्लेशियर का दायरा क्यों नहीं बढ़ रहा है? अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, पिंडर एवं काफनी बेसिन ग्लेशियर घाटियों में 2008 से 2022 के बीच हुई बर्फबारी का अध्ययन किया गया है. अध्ययन के दौरान पाया गया कि साल दर साल स्नो कवर एरिया में बढ़ोतरी हुई है. खासकर मार्च और अप्रैल के महीने में दिसंबर और जनवरी की तुलना में अधिक बर्फबारी हुई है, लेकिन क्लाइमेट चेंज की वजह से मौसम चक्र में हुए बदलाव के चलते स्नो के तेजी से पिघलने के संकेत मिले हैं. ऐसे में इस रिपोर्ट में पाया गया कि उच्च हिमालय क्षेत्र में ठीक ठाक बर्फबारी तो हो रही है लेकिन क्लाइमेट चेंज की वजह से हुए मौसम चक्र में बदलाव के चलते बे-मौसम बर्फबारी हो रही है. यही वजह है कि बे मौसम बर्फबारी का लाभ ग्लेशियर को नहीं मिल पा रहा है. पिंडारी ग्लेशियर में साल 2025-26 में हुई बर्फबारी के आंकड़ों पर गौर करें तो उसके अनुसार, दिसंबर जनवरी महीने में कुल 136 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बर्फबारी हुई है. वहीं मार्च अप्रैल महीने में 238 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बर्फबारी हुई है. वर्तमान समय में पिंडारी ग्लेशियर कुमाऊं रीजन का सबसे अधिक तेजी से पिघलने वाला ग्लेशियर है. यह सालाना 15 मीटर प्रति ईयर की रफ्तार से पिघल रहा है. पिंडारी ग्लेशियर के अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि ग्लेशियर के आसपास के क्षेत्र का तापमान शून्य से नीचे होना चाहिए लेकिन वहां का तापमान 1 से 2 डिग्री सेल्सियस तक पाया गया है. खासकर डेबरी ग्लेशियर का तापमान 3 से 4 डिग्री सेल्सियस दिसंबर महीने में रिकॉर्ड किया गया. इसी तरह क्लीन ग्लेशियर का तापमान 0 से 1 डिग्री सेल्सियस दिसंबर महीने में रिकॉर्ड किया गया है, जबकि वहां का तापमान -5 डिग्री से कम होना चाहिए. यही वजह है कि वैज्ञानिक इस बात को मान रहे हैं कि क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग ग्लेशियर पर काफी अधिक प्रभाव डाल रहे हैं. यही वजह है कि पिंडारी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है. वेस्टर्न हिमालय और काराकोरम हिमालय में मौजूद ग्लेशियर में काफी अधिक भिन्नता है. काराकोरम हिमालय में मौजूद ग्लेशियर न सिर्फ स्टेबल हैं बल्कि एडवांस भी हो रहे हैं.सेंट्रल हिमालय और वेस्टर्न हिमालय में मौजूद ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं. यह क्लाइमेट चेंज की वजह से हो रहा है. हालांकि, पूर्व में हुए अध्ययन में इस बात को कहा गया कि पहले जितनी बर्फ पड़ती थी उतनी बर्फ अब नहीं पड़ रही है, लेकिन पिछले साल उन्होंने इसको लेकर स्टडी की है जो हाल ही में पब्लिश हुई है. उस अध्ययन में पाया गया कि बर्फबारी का अमाउंट, दिसंबर- जनवरी महीने से शिफ्ट होकर मार्च- अप्रैल महीने से चला गया है. यही नहीं, दिसंबर जनवरी महीने में पड़ रही बर्फ से करीब दोगुना बर्फबारी मार्च- अप्रैल महीने में हो रही है. ये जरूर है कि मार्च- अप्रैल महीने के दौरान धरती का तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है. जिसके चलते इस दौरान होने वाली बर्फबारी भी तेजी से पिघलती है. लिहाजा, स्नो को पिघलने में वायु का तापमान ही नहीं बल्कि धरती के तापमान की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने करीब पिछले 20 सालों के आंकड़ों के अध्ययन में पाया कि दिसंबर- जनवरी महीने में अधिक बर्फबारी होने के बजाय मार्च- अप्रैल महीने में अधिक बर्फबारी हुई है. पिंडर व काफनी बेसिन में हुई बर्फबारी के अध्ययन में पाया गया कि मार्च- अप्रैल महीने में अधिक बर्फबारी हुई है. इसके साथ ही पिंडर व काफनी बेसिन के सर्फेस टेंपरेचर को भी मापा गया है. दिसंबर 2025 में ग्लेशियर के आगे मौजूद स्थान के सर्फेस का टेंपरेचर एक से लेकर पांच डिग्री सेल्सियस तक पाया गया है. यही वजह है कि बर्फबारी तो हो रही है लेकिन उसी स्पीड से पिघल भी रही है. जिसके चलते ग्लेशियर एडवांस नहीं हो पा रहे हैं. वे पिघल रहे हैं. ऐसे में मार्च अप्रैल महीने में अच्छी खासी बर्फबारी से स्नो कवर्ड एरिया तो बढ़ रहा है लेकिन वो स्नो ग्लेशियर के लिए फायदेमंद साबित नहीं हो रही है.उन्होंने कहा पर्वतीय क्षेत्रों में ट्री लाइन बढ़ रही है. जिसका मतलब है कि ग्लेशियर के समीप पेड़ उग गए हैं. इससे ये पता चलता है कि ग्लेशियर के समीप का तापमान पेड़ पौधों को ग्रो करने के लिए बेहतर है, जो भविष्य के लिए खतरे का निशान है, क्योंकि ट्री लाइन बढ़ने से ग्लेशियर पीछे खिसकते जाएंगे. जिसके लिए क्लाइमेट चेंज के साथ ही मानवीय गतिविधियां, सर्फेस टेंपरेचर और एयर टेंपरेचर के साथ ही अन्य तमाम पहलू जिम्मेदार हैं. मौसम और क्लाइमेट चेंज के नजरिए से देखें तो मौजूदा साल 2026 के लिए जलवायु मॉडल लगातार चिंताजनक संकेत दे रहे हैं. वैज्ञानिक हर अपडेट पर पैनी नजर बनाए हुए हैं क्योंकि एक विनाशकारी ‘मेगा अल नीनो’ की आशंका गहराती ही जा रही है. शुरुआती अनुमान के मुताबिक यह आज से डेढ़ सौ साल पहले 1877-78 के उस भयावह दौर के वापसी की याद दिला रहा है, जिसे इतिहास की सबसे घातक जलवायु संबंधी घटनाओं में से एक माना जाता है. प्रशांत महासागर पर स्टडी कर रहे रिसर्चर्स का कहना है कि समुद्र की सतह का तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जो अल नीनो के विकसित होने का मुख्य संकेत है. मौजूदा रुझान अगर जारी रहा, तो 2026 में एक ‘सुपर अल नीनो’ आकार ले सकता है.जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर यह घटना 2027 तक ग्लोबल तापमान को नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा सकती है. आज से करीब 150 साल पहले आए उस अल नीनो ने दुनिया के एक बड़े हिस्से में भीषण लू, लंबा सूखा और अकाल पैदा किया था. आंकड़ों के अनुसार उस दौरान तत्कालीन वैश्विक आबादी के लगभग 4 प्रतिशत हिस्से की मौत हो गई थी, जिस वजह से करोड़ों की आबादी का खात्मा हो गया था. वैज्ञानिकों को इस बात की चिंता सता रही है कि क्या 2026 में इतिहास खुद को फिर से दोहराने जा रहा है? 2026 के अल नीनो अनुमान भारत के मानसून के लिए गंभीर खतरे पैदा कर रहे हैं. यह मुख्य रूप से अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी लाने वाली वायु प्रणालियों को कमजोर कर देता है. ऐतिहासिक रूप से, ऐसी घटनाओं के कारण कम से कम 50 प्रतिशत बार सामान्य से कम बारिश हुई है, जबकि शक्तिशाली अल नीनो के दौरान देश के किसी ना किसी हिस्से में सूखे की स्थिति बनने की 60 फीसदी तक की संभावना बनी रहती है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











