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प्रकृति के सुकुमार कवि’ सुमित्रानंदन पंत

21/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
सुमित्रानंदन पंत जन्म 20 मई 1900; मृत्यु: 28 दिसंबर, 1977) हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार स्तंभों में से एक हैं। सुमित्रानंदन पंत नये युग के प्रवर्तक के रूप में आधुनिक हिन्दी साहित्य में उदित हुए। सुमित्रानंदन पंत ऐसे साहित्यकारों में गिने जाते हैं, जिनका प्रकृति चित्रण समकालीन कवियों में सबसे बेहतरीन था। आकर्षक व्यक्तित्व के धनी सुमित्रानंदन पंत के बारे में साहित्यकार राजेन्द्र यादव कहते हैं कि ‘पंत अंग्रेज़ी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रहकर प्रकृति केन्द्रित साहित्य लिखते थे।’ जन्म के महज छह घंटे के भीतर उन्होंने अपनी माँ को खो दिया। पंत लोगों से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते थे। पंत ने महात्मा गाँधी और कार्ल मार्क्‍स से प्रभावित होकर उन पर रचनाएँ लिख डालीं। हिंदी साहित्य के विलियम वर्ड्सवर्थ कहे जाने वाले इस कवि ने महानायक अमिताभ बच्चन को ‘अमिताभ’ नाम दिया था। पद्मभूषण, ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से नवाजे जा चुके पंत की रचनाओं में समाज के यथार्थ के साथ-साथ प्रकृति और मनुष्य की सत्ता के बीच टकराव भी होता था। हरिवंश राय ‘बच्चन’ और श्री अरविंदो के साथ उनकी ज़िंदगी के अच्छे दिन गुजरे। आधी सदी से भी अधिक लंबे उनके रचनाकाल में आधुनिक हिंदी कविता का एक पूरा युग समाया हुआ है। सुमित्रानंदन पंत के नाम से जानते हैं, उनका नाम बचपन में कुछ और था। बाल्यावस्था में इन्हें ‘गोसाईं दत्त’ के नाम से पुकारा जाता था, लेकिन इससे उन्हें गोसाईं तुलसीदास का स्मरण होता था, जिनका जन्म काफी अभावों में बीता था। वे नहीं चाहते थे कि उनके साथ भी ऐसा कुछ हो। इसलिए उन्होंने आगे चलकर अपना नाम गोसाईं दत्त से बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया। जन्म के कुछ ही घंटों के बाद अपनी माता खो देने के कारण, इनका लालन-पालन इनकी दादी ने ही किया। उन्हें सजने-संवरने का खूब शौक था। इसलिए वे बचपन में भी तरह-तरह के कोट, टोपी, टाई आदि पहना करते थे। सजने-संवरने के प्रति उनके प्रेम को आप उनकी कई तस्वीरों में देख सकते हैं। एक साक्षात्कार में भी वे इस बारे में बात कर चुके हैं कि अगर पत्नी होती, तो उसे खूब संवारता, लेकिन पत्नी है नहीं। इसलिए खुद को संवारता रहता हूं। बचपन से ही सुमित्रानंदन पंत का रुझान कविताओं की ओर खूब था। जब यह चौथी कक्षा में थे, तभी से इन्होंने कविताएं लिखनी शुरू की और ऐसे मिला हिंदी साहित्य को उसका एक प्रमुख कवि। छायावाद शैली में लिखने वाले सुमित्रानंदन पंत को ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि, उन्हें देखन और उनकी कविताओं को पढ़ने के बाद आप भी कहेंगे कि यह नाम इन्हीं के लिए बना है। वे ताउम्र अविवाहित रहें। जिसका कारण भी वे एक साक्षात्कार में यह बता चुके हैं कि पहाड़ों पर रहते हुए, आपका स्त्री की ओर आकर्षित होना काफी मुश्किल है। हालांकि, उन्होंने कभी विवाह नहीं किया, लेकिन उनकी कविताओं में ऐसा सौंदर्य और प्रेमबोध आपको देखने को मिलेगा कि आप इनकी रचनाओं के कायल हो जाएंगे। मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे’ जैसी इनकी कई रचनाओं में प्रकृति और मानवीय भावनाओं का अनोखा सौंदर्यबोध देखने को मिलता है। इन्हें नदियों और पहाड़ों से अत्यधिक प्रेम था। प्रकृति के प्रति अपने इसी प्रेम के कारण, उन्होंने अपनी कई कविताओं में ऐसा मार्मिक चित्रण किया है कि आप उन्हें पढ़कर भाव-विभोर हो जाएंगे।इनकी रचनाओं को पढ़कर ही आप समझ पाएंगे कि क्यों इन्हें छायावाद का प्रमुख सतंभ माना जाता है। इनकी कविता ‘याद’ की कुछ पंक्तिया याद आती हैं, जिसमें वे कहते हैं-
बिदा हो गई सांझ, विनत मुख पर झीना आंचल धर,
मेरे एकाकी आंगन में मौन मधुर स्मृतियां भर!
वह केसरी दुकूल अभी भी फहरा रहा क्षितिज पर,
नव असाढ़ के मेघों से घिर रहा बराबर अंबर!
ऐसी ही इनकी रचनाएं हैं, जो मानवीय भावनाओं और प्रकृति के सौंदर्य की उधेर-बुन का एक अनोखा संगम हैं। इनकी कुछ प्रमुख रचनाओं में वीणा, पल्लव, गुंजन, युगवाणी, उत्तरा, युगपथ, चिदंबरा, कला व बूढ़ा चांद, गीतहंस, युगांत जैसी कई रचनाएं शामिल हैं। इनमें से कुछ रचनाएं, जैसे पल्लव, चिदंबरा और कला व बूढ़ा चांद सुमित्रानंदन पंत की सर्वश्रेष्ठ रचनाएं मानी जाती हैं।
कई पुरस्कार से नवाजा गया
इन रचनाओं के लिए इन्हें कई पुरस्कार भी मिले। ‘कला व बूढ़ा चांद’ काव्य संग्रह के लिए इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, ‘चिदंबरा’ के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।सुमित्रानंदन पंत ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे जाने वाले पहले हिंदी साहित्यकार थे, जिनमें पद्म भूषण पुरस्कार भी शामिल है। इनके अलावा भी उन्हें कई तमाम पुरस्कार मिलेसमुत्रिानंदन पंत की रचनावलियों को अगर आप पढ़ेंगे, तो आप पाएंगे कि वे सिर्फ प्रकृति से प्रेरित हो कर रचनाएं नहीं लिखते थे

 

मिट्टी का गहरा अंधकार,
डूबा है उस में एक बीज
वह खो न गया, मिट्टी न बना
कोदों, सरसों से शुद्र चीज!
उस छोटे उर में छुपे हुए
हैं डाल–पात औ’ स्कन्ध–मूल
गहरी हरीतिमा की संसृति
बहु रूप–रंग, फल और फूल!
वह है मुट्ठी में बंद किये
वट के पादप का महाकार
संसार एक! आशचर्य एक!
वह एक बूंद, सागर अपार!
बंदी उसमें जीवन–अंकुर
जो तोड़ निखिल जग के बंधन
पाने को है निज सत्त्व, मुक्ति!
जड़ निद्रा से जग, बन चेतन
आः भेद न सका सृजन रहस्य
कोई भी! वह जो शुद्र पोत
उसमे अनंत का है निवास
वह जग जीवन से ओत प्रोत!
मिट्टी का गहरा अंधकार
सोया है उसमें एक बीज
उसका प्रकाश उसके भीतर
वह अमर पुत्र! वह तुच्छ चीज?

हिंदी साहित्य की बात करें, तो इसके कुछ अमर लेखकों में एक नाम सुमित्रानंदन पंत का भी लिया है। छायावाद शैली के प्रमुख कवि सुमित्रानंदन पंत का जीवन भी उनकी रचनाओं की तरह ही प्रेरणादायक रहा है। कम उम्र से ही कविताओं की ओर रुझान और पहाड़ों के प्रति उनका अटूट प्रेम उनकी रचनाओं में साफ झलकता है। भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया और उनपर डाक टिकट जारी किया है।कौसानी गाँव के उनके घर को ‘सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका’ नामक संग्रहालय में परिणत किया गया है जहाँ उनकी व्यक्तिगत चीज़ों, प्रशस्तिपत्र, विभिन्न संग्रहों की पांडुलिपियों को सुरक्षित रखा गया है। संग्रहालय में उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष ‘पंत व्याख्यान माला’ का आयोजन किया जाता है।सुमित्रानंदन पंत हिंदी साहित्य के एक महान व्यक्तित्व थे, जो प्रकृति, आध्यात्मिकता और मानवीय भावनाओं को खूबसूरती से पिरोने वाली अपनी प्रेममयी और दार्शनिक कविताओं के लिए प्रसिद्ध थे। छायावादी आंदोलन के एक प्रमुख कवि के रूप में, उन्होंने अपनी जीवंत कल्पना और गहन भावनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से आधुनिक हिंदी साहित्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रकृति और ग्रामीण भारत से उनके गहरे जुड़ाव से प्रभावित उनकी रचनाएँ आज भी पाठकों और कवियों को प्रेरित करती हैं।।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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