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कैसे पैदा हो बच्चों में पढ़ने-लिखने के लिए दिलचस्पी?

18/01/21
in उत्तराखंड, उधमसिंह नगर, पिथौरागढ़
Reading Time: 1min read
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नई पीढ़ी में नाक़ाफी होती पढ़ने की आदत हरेक के विचार.विमर्श का मुद्दा है। अभिभावक इसे बच्चों के वर्चुअल दुनिया की ओर अधिक झुकाव के रूप में देख रहे हैं, तो तमाम शिक्षाविद् इसे नई पीढ़ी में किताबों के प्रति पैदा हो रही अरूचि के रूप में। कुछ समय तक चिंतन की यह प्रक्रिया एक रुख थी, लेकिन अचानक से आए वायरस ने इस प्रक्रिया में अनेक नए पहलुओं को जोड़ दिया है। पर एक सवाल जो बना पड़ा है, वह यह है कि भला कैसे पैदा की जाए बच्चों में पढ़ने.लिखने के लिए दिलचस्पी!

घर में किताबे ना हों और हो भी तो वह केवल बदलते समय और धूल की साक्षी बन रहीं हों। माता.पिता का किताबों से कोई नाता ना हो। बच्चों के हाथ में साल भर कोर्स की चुनिंदा किताबों को थमाया जाए और स्पष्ट शब्दों में ऐलान कर दिया जाए कि यहीं तुम्हारा दायरा है। साल भर रटने के बाद भी अगर इस दबावपूर्ण ढांचे में कोई व्यक्ति फिट नहीं बैठ पाता तो फिर तो इस मुद्दे को इस तरह बढ़ाया जाता है जैसे यहीं ज़िंदगी.मौत का सवाल हो। यहीं से हमारे भविष्य की उपलब्धियों और नाकामयाबियों का हिसाब भी लगा लिया जाता है। इसके बावजूद भी अगर कभी मौलिकता दिखाने की कोशिश की जाय तो हमारी सीमाओं का बोध शिक्षकगड़ द्वारा करा दिया जाता है।

चिंताजनक विषय लगता है ना यह! जी हांए है यह विषय विचारणीय और अगर आपकी कल्पनाओं में कल सुनहरा है या आप एक समानता वाले कल की आश लगाए बैठे हैं, फिर तो बिल्कुल इस चिंता की छुअन आपके मस्तिष्क में होनी चाहिए। चिंता केवल चिंता के तौर पर ना ली जाए बल्कि उस राह को तलाशा जाए जो इन चिंताओं पर विराम लगाए। यह असमंजस में आप अवश्य पड़ सकते हैं कि एक अकेला क्या कर सकता है क्योंकि यह तो पूरे एजुकेशन सिस्टम की ही नाकामयाबी है। पर यह भी तो सच है कि शुरुआत करने के लिए एक अकेला व्यक्ति ही काफी है और क्योंकि सीखना.सीखाना एक सामाजिक कृत है तो अवश्य ही आपको व्यापक परिदृश्य में फ़ायदे नजर आएंगे। और हां आपको बता दूं खोजने से ज्यादा संतुष्टि देने वाला शायद ही कोई और काम हो क्योंकि खोजना वास्तव में मानवीय भावना का सार है।

एजुकेशन सिस्टम सीखने की प्रक्रिया का पूरक होने के बजायए सीखने की राह पर खाई का काम कर रहा है। अनिश्चितता तो पहले से ही थी पर इस प्रक्रिया को एक अदृश्य से जीव ने और भी ज्यादा अनिश्चित कर दिया है और उम्मीद है, आने वाले समय में सीखने को नए सिरे से परिभाषित किया जाएगा। इसी क्रम में उम्मीद की लौ बन प्रकट हुए है देवलथल, रामनगर और नानकमत्ता के तमाम विद्यार्थी और उनके मार्गदर्शक। कोरोना काल में ही नहीं बल्कि इस अंधकारमय माहौल को उजागर करने का यह अभियान तो बहुत पहले ही शुरू हो गया था।

वह अभियान जो प्रेरणा है, अनुभावों का खजाना है, गतिविधियों का ठिकाना है, अनेकों की उम्मीदों को पिरोए है और नन्हीं कल्पनाओं को जगह देने का माध्यम भी है, यह है सामुदायिक पुस्तकालय अभियान। इस अभियान की राह पिथौरागढ़ के शिक्षक साहित्यकार महेश पुनेठा जी ने दिखाई। उनके सान्निध्य से उनके छात्रों ने पिथौरागढ़ के देवलथल में पुस्तकालय स्थापित किए। समाज की सीखने की संकुचित परिभाषा ने उन पुस्तकालयों को भी केवल समय की बरबादी का एक जरिया समझा। लेकिन देवलथल के साथियों के बुलंद हौंसले और निरंतर कोशिश आज अनेकों पुस्तकालय की नींव की प्रेरणा बन रही है। महेश जी वहीं शख्स है जिन्होंने दीवार पत्रिका की नींव रख पहले ही बच्चों में लिखने पढ़ने की जिज्ञासा को उत्पन्न कर दिया था। वह कहते हैं लिखना और पढ़ना दोनों ही एक दूसरे के पूरक है। पढ़ना आपको लिखने के लिए प्रेरित करता है और लिखना और पढ़ने के लिए। देवलथल के इन साथियों की यह मुहीम सिर्फ पिथौरागढ़ में ही नहीं बल्कि प्रांत के कई हिस्सों के लिए मील का पत्थर साबित हुई।

लॉकडॉउन में हो रहे डिजिटल दुनिया पर ही केंद्रित सारे बदलाव भी विचारणीय थे जिसने बच्चों को इस असंवेदनशील प्लेटफॉर्म पर इस तरह से झोंका कि वह अपनी जड़ों से ही दूर हो रहे थे। डिजिटल प्लेटफॉर्म में गुंजाइश भले ही बहुत हो पर वह प्रत्यक्ष रूप से मिलने.जुलने कि जगह नहीं ले सकता। इसी बारीकी का ख़्याल कर रचनात्मक शिक्षक मंडल व रामनगर के वरिष्ठ अध्यापक नवेंदु मठपाल जी के नेतृत्व में पुस्तकालय खोले गए। वर्तमान में करीबन 20 से अधिक सामुदायिक पुस्तकालय की नींव रखी जा चुकी है उनके द्वारा। प्रशंसनीय बात यह है कि इन पुस्तकालयों का संचालन स्कूली छात्र.छात्रा ही कर रहे हैैं और अनेकों गतिविधियां कर अपने साथियों का रुझान किताबों कि ओर लाने के प्रयास में हैं।

अभियान की इस हवा ने ऊधम सिंह नगर के नानकमत्ता में स्थित नानकमत्ता पब्लिक स्कूल के साथियों को भी प्रभावित किया। स्कूल के बच्चों ने विद्यालय प्रशासन के सान्निध्य से अलग.अलग गांव में खाली मैदानोंए सरकारी स्कूलों और कई जगह पर तो अपने घरों को भी लाइब्रेरी सेंटर बनाकर उजागर किया। सूखे पड़े पेड़ ने अपनी जड़ों की गहराइयों का एहसास कराया और एक के बाद एक पत्ते उगते गए इसकी शाखाओं में। एक.एक करके 17 लाइब्रेरी खुल गई नानकमत्ता में भी और अभी भी यह क्रम जारी है।

वह कहते है ना ष्अकेले ही चले थे जानिब.ए.मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।ष् इसी कड़ी में रामनगर का शाइनिंग स्टार्स स्कूल भी इस अभियान से प्रभावित होकर इस कारवां से जुड़ चुका है और वहां के साथी अपनी पहली लाइब्रेरी खोल चुके हैं।

किसी ने कहा है पुस्तकालय ऊर्जा को संग्रहीत करते हैं जो कल्पना का ईंधन है। वे दुनिया के लिए खिड़कियां खोलते हैं, हमें पता लगाने और हासिल करने के लिए प्रेरित करते हैं, और हमारे जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में योगदान करते हैं। वास्तव में यह पुस्तकालय केवल पुस्तकालय नहीं है एक तरीके का वैल्यू एडिशन है, जो हमारी उन स्किल्स को विकसित कर रहा है जिसकी उम्मीद शायद ही किसी ने कि होगी। आलोचनात्मक विवेक, अनुकूलन क्षमता, समस्या समाधान, सामाजिक बोध, नेतृत्व क्षमता और रचनात्मकता जैसी स्किल्स विकसित कर रहे हैं ये गतिविधि सेंटर। अनेकों साझेदारियां भी हो रही हैं इस अभियान के कारण। साथ ही समूह में काम करने की स्किल भी विकसित हो रही हैं। यह स्किल्स केवल स्किल नहीं हैं बल्कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित की गई इक्कसवीं सदी के कौशल हैं। यह वहीं स्किल्स हैं जिन्हें विकसित करने के लिए लोग अपनी जिंदगी बिता देते हैं और यह नन्हें साथी तो जानते भी नहीं की यह कितना बड़ा काम कर रहे हैं!

पुस्तकालय अभियान को निरंतर विद्वान जनों का सहयोग मिल रहा है। देवन मेवाड़ी जी, अनुराग शर्मा जी, संजय जोशी जी और शंकर बसेड़ा जी ने तो लाइब्रेरी में किताबे देकर इस अभियान को अपना अमूल्य योगदान भी दिया। इस अभियान की व्यापकता का अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि गुज़ारिश बुक्स फॉर आल नामक एनण् जीण् ओ ने नानकमत्ता पब्लिक स्कूल के छात्रों द्वारा चलाई जा रही लाइब्रेरी को अपना ब्रांड एम्बेसडर चयनित किया है। गुज़ारिश समय.समय पर सस्ते दामों पर नानकमत्ता के पुस्तकालयों को किताबें उपलब्ध कराता रहा है।

वह कहते हैं ना भविष्य उन लोगों का है जो अपने सपनों की सुंदरता में विश्वास करते हैं, साथियों का यह जज़्बा और निस्वार्थ मेहनत सच में एक बेहतरीन कल का संकेत देती है। जिस तरह अनेकों प्रसिद्ध व्यक्तित्व और स्कूली साथी अपने सपनों को आकार देने में लगे हुए हैं उनकी यह मेहनत एक दिन अवश्य ही साकार होगी। यूं ही, यह कारवां चलता रहेगा और अनेकों प्रतिभाएं इस कारवां से जुड़ती रहेंगी, बस यही आशा है कल से।

कृति अटवाल दसवीं कक्षा
नानकमत्ता पब्लिक स्कूल

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