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अद्वैत का अद्भुत पाठ, जब शंकराचार्य को मिला सच्चा ज्ञान

22/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देश भारत में सन 788 में जगतगुरू आदि शंकराचार्य जी पैदा हुए थे। आदि शंकराचार्य जी के पैदा होने की कथा भी बड़ी रोचक है, जिसके अनुसार आदि शंकराचार्य के जो माता-पिता थे़ उन्हें लंबे समय तक कोई संतान नहीं थी, जिसके बाद आदि शंकराचार्य की माता ने भगवान शंकर की कड़ी तपस्या की और आदि शंकराचार्य की माता जी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए।और शंकर भगवान ने आदि शंकराचार्य जी की माता से कहा कि पहले बेटे के रूप में वह खुद ही पैदा होंगे, परंतु उनकी उम्र बहुत ही कम होगी और इसीलिए वह जल्दी से वापस देवलोक चले जाएंगे।शंकराचार्य जी बहुत ही गंभीर और शांत स्वभाव के थे। आदि शंकराचार्य जी की याददाश्त इतनी तेज थी कि यह जो कुछ भी एक बार पढ़ते थे या फिर सुनते थे, उन्हें वह लंबे समय तक याद रहता था, क्योंकि इनकी याददाश्त शक्ति बहुत ही तेज थी।आदि शंकराचार्य ने अपने घर के पास स्थित गुरुकुल से सभी प्रकार के वेद और कुल 6 से भी ज्यादा वेदांतो में पारंगत हासिल कर ली थी। समय बढ़ने के साथ-साथ आदि शंकराचार्य जी के ज्ञान में भी बढ़ोतरी होती गई और उन्होंने अपने ज्ञान को अलग-अलग मठ की स्थापना करके विभिन्न प्रकार के ग्रंथों की रचना करके और लोगों को उपदेश देकर फैलाने का काम किया।संस्कृत, हिंदी जैसी भाषाओं का यूज करके आदि शंकराचार्य जी ने 10 से भी ज्यादा शास्त्र, उपनिषद, गीता संस्करण और विभिन्न प्रकार के उपदेशों को भाषण के तौर पर और लेख के तौर पर लोगों के पास पहुंचाने का काम किया था।अपनी जिंदगी में भगवान को बेहद खूबसूरती के साथ अपनी आत्मा और अपने मन से जोड़ने का काम आदि शंकराचार्य जी ने किया था और इन्हें जो भी अनुभव प्राप्त हुआ था, उन्होंने लोगों के साथ बांटा था।महापंडित एवं विद्धंत दार्शनिक आदिगुरु शंकराचार्य जी ने समस्त भारतवर्ष का भ्रमण कर पूरे देश में हिन्दू धर्म का जमकर प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने गोर्वधन मठ, वेदान्त मठ, ज्योतिमठ एवं शारदा मठ की स्थापना कर देश को हिन्दू धर्म, संस्कृति और दर्शन की झलक दिखाई एवं उन्होंने भारत देश में चारों तरफ हिन्दुओं का परचम लहराया।सबसे पहला मठ वेदांत मठ दक्षिण भारत रामेश्वरम में स्थापित किया। इसके बाद दूसरा मठ गोवर्धन मठ जन्नाथपुरी में स्थापित किया। तीसरा मठ जो कि कलिका एवं शारदा मठ के नाम से भी मशहूर है, इसके पश्चिम भारत, द्धारकाधीश में स्थापित किया।इसके बाद उन्होंने मठ ज्योतिपीठ मठ उत्तर भारत में बद्रीनाथ में स्थापित किया। वहीं हिन्दू धर्म में इन चारों मठों का बेहद महत्व है, वहीं इन चारों मठों को चार धाम के रुप में भी जाना जाता है, जिसको लेकर ये मान्यता है कि जो भी अपने जीवन में इन चारों धामों और तीर्थस्थलों की यात्रा करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।भारत की आध्यात्मिक परंपरा में आदि शंकराचार्य का स्थान अत्यंत ऊंचा है. वे केवल एक दार्शनिक ही नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले महान गुरु थे. उनकी जयंती हर वर्ष पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है, जो प्रायः अप्रैल या मई में पड़ती है. इस वर्ष यह पावन दिन 21 अप्रैल, मंगलवार को मनाया जा रहा है. यह अवसर उनके अद्वैत वेदांत के सिद्धांत और समाज सुधार के संदेश को स्मरण करने का होता है.शंकराचार्य का जीवन अत्यंत अनुशासित था. वे प्रतिदिन प्रातःकाल गंगा में स्नान कर तर्पण करते और सूर्योदय से पूर्व अपनी संध्या-पूजा पूर्ण कर लेते थे. इसके बाद वे दर्शन के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर जाया करते थे. उनका यह नियम केवल धार्मिक आचरण नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और साधना का प्रतीक था.एक दिन जब वे पूजा समाप्त कर मंदिर की ओर जा रहे थे, तब एक संकरी गली में उन्हें एक व्यक्ति दिखाई दिया, जो श्मशान में कार्य करता था. वह चार कुत्तों को चार दिशाओं में बैठाकर रास्ता रोके खड़ा था. शंकराचार्य ने विनम्रता से उससे हटने का अनुरोध किया, ताकि वे आगे बढ़ सकें.किन्तु उस व्यक्ति ने शुद्ध संस्कृत में उत्तर देते हुए एक गूढ़ प्रश्न पूछाआप किसे हटाना चाहते हैं, शरीर को या आत्मा को?” उसने आगे कहा कि यदि ब्रह्म सर्वत्र है, तो किसी में भेद कैसे संभव है? शरीर तो अन्न से बना है और आत्मा सर्वव्यापी है. उसने उदाहरण देते हुए कहा कि गंगा में दिखने वाला सूर्य और किसी गंदे जल में दिखने वाला सूर्य अलग नहीं होते.उस व्यक्ति के तर्क और ज्ञान को सुनकर आदि शंकराचार्य आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने तुरंत उसे प्रणाम किया और समझ लिया कि सच्चा ज्ञान किसी जाति या सामाजिक स्तर का मोहताज नहीं होता. उन्होंने उसकी स्तुति में पाँच श्लोकों की रचना की, जिसे मनीषा पंचक कहा जाता है.इन श्लोकों में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप को समझ लेता है, वही सच्चा ज्ञानी और गुरु है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ब्रह्म सच्चिदानंद है और वह सबमें समान रूप से विद्यमान है.जैसे ही ‘मनीषा पंचक’ की रचना पूरी हुई, वह व्यक्ति अचानक अदृश्य हो गया और उसके स्थान पर स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए. उन्होंने शंकराचार्य को आशीर्वाद देते हुए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया.उन्होंने कहा कि समाज में अंधविश्वास और कर्मकांड का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. लोग शास्त्रों का वास्तविक अर्थ समझे बिना केवल बाहरी आडंबर में उलझ गए हैं, जिससे ज्ञान का ह्रास हो रहा है. उन्होंने शंकराचार्य को आदेश दिया कि वे वेद और शास्त्रों की तर्कसंगत व्याख्या करें और लोगों को सही मार्ग दिखाएं.भगवान शिव ने यह भी बताया कि अज्ञान के कारण समाज की धार्मिक, सामाजिक और बौद्धिक शक्तियां कमजोर हो रही हैं. इसका समाधान केवल सही ज्ञान और विवेकपूर्ण समझ में ही निहित है. शंकराचार्य को यह जिम्मेदारी दी गई कि वे लोगों को अंधविश्वास से मुक्त कर सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान की ओर प्रेरित करें.इस दिव्य अनुभव से आदि शंकराचार्य को नई ऊर्जा और प्रेरणा मिली. वे भगवान शिव के संदेश को अपने हृदय में धारण कर अपनी कुटिया लौट आए. यह घटना हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान समानता, विवेक और अद्वैत की भावना में निहित है, जो जीवन को सही दिशा प्रदान करता है. मानव कल्याण का काम करने वाले आदि शंकराचार्य जी की मृत्यु स्थित सन 820 में हो गई थी। उस टाइम इनकी उम्र सिर्फ 32 साल थी और इन 32 सालों में उन्होंने मानव कल्याण के लिए कई काम किए थे।आदि शंकराचार्य जी की मौत को लेकर अलग-अलग लोगों की विभिन्न राय है कई इतिहासकारों का ऐसा मानना है कि आदि शंकराचार्य जी का निधन देश के तमिलनाडु राज्य के कांचीपुरम नाम की जगह पर हुआ था।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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