• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

अद्वैत का अद्भुत पाठ, जब शंकराचार्य को मिला सच्चा ज्ञान

22/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
7
SHARES
9
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देश भारत में सन 788 में जगतगुरू आदि शंकराचार्य जी पैदा हुए थे। आदि शंकराचार्य जी के पैदा होने की कथा भी बड़ी रोचक है, जिसके अनुसार आदि शंकराचार्य के जो माता-पिता थे़ उन्हें लंबे समय तक कोई संतान नहीं थी, जिसके बाद आदि शंकराचार्य की माता ने भगवान शंकर की कड़ी तपस्या की और आदि शंकराचार्य की माता जी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए।और शंकर भगवान ने आदि शंकराचार्य जी की माता से कहा कि पहले बेटे के रूप में वह खुद ही पैदा होंगे, परंतु उनकी उम्र बहुत ही कम होगी और इसीलिए वह जल्दी से वापस देवलोक चले जाएंगे।शंकराचार्य जी बहुत ही गंभीर और शांत स्वभाव के थे। आदि शंकराचार्य जी की याददाश्त इतनी तेज थी कि यह जो कुछ भी एक बार पढ़ते थे या फिर सुनते थे, उन्हें वह लंबे समय तक याद रहता था, क्योंकि इनकी याददाश्त शक्ति बहुत ही तेज थी।आदि शंकराचार्य ने अपने घर के पास स्थित गुरुकुल से सभी प्रकार के वेद और कुल 6 से भी ज्यादा वेदांतो में पारंगत हासिल कर ली थी। समय बढ़ने के साथ-साथ आदि शंकराचार्य जी के ज्ञान में भी बढ़ोतरी होती गई और उन्होंने अपने ज्ञान को अलग-अलग मठ की स्थापना करके विभिन्न प्रकार के ग्रंथों की रचना करके और लोगों को उपदेश देकर फैलाने का काम किया।संस्कृत, हिंदी जैसी भाषाओं का यूज करके आदि शंकराचार्य जी ने 10 से भी ज्यादा शास्त्र, उपनिषद, गीता संस्करण और विभिन्न प्रकार के उपदेशों को भाषण के तौर पर और लेख के तौर पर लोगों के पास पहुंचाने का काम किया था।अपनी जिंदगी में भगवान को बेहद खूबसूरती के साथ अपनी आत्मा और अपने मन से जोड़ने का काम आदि शंकराचार्य जी ने किया था और इन्हें जो भी अनुभव प्राप्त हुआ था, उन्होंने लोगों के साथ बांटा था।महापंडित एवं विद्धंत दार्शनिक आदिगुरु शंकराचार्य जी ने समस्त भारतवर्ष का भ्रमण कर पूरे देश में हिन्दू धर्म का जमकर प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने गोर्वधन मठ, वेदान्त मठ, ज्योतिमठ एवं शारदा मठ की स्थापना कर देश को हिन्दू धर्म, संस्कृति और दर्शन की झलक दिखाई एवं उन्होंने भारत देश में चारों तरफ हिन्दुओं का परचम लहराया।सबसे पहला मठ वेदांत मठ दक्षिण भारत रामेश्वरम में स्थापित किया। इसके बाद दूसरा मठ गोवर्धन मठ जन्नाथपुरी में स्थापित किया। तीसरा मठ जो कि कलिका एवं शारदा मठ के नाम से भी मशहूर है, इसके पश्चिम भारत, द्धारकाधीश में स्थापित किया।इसके बाद उन्होंने मठ ज्योतिपीठ मठ उत्तर भारत में बद्रीनाथ में स्थापित किया। वहीं हिन्दू धर्म में इन चारों मठों का बेहद महत्व है, वहीं इन चारों मठों को चार धाम के रुप में भी जाना जाता है, जिसको लेकर ये मान्यता है कि जो भी अपने जीवन में इन चारों धामों और तीर्थस्थलों की यात्रा करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।भारत की आध्यात्मिक परंपरा में आदि शंकराचार्य का स्थान अत्यंत ऊंचा है. वे केवल एक दार्शनिक ही नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले महान गुरु थे. उनकी जयंती हर वर्ष पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है, जो प्रायः अप्रैल या मई में पड़ती है. इस वर्ष यह पावन दिन 21 अप्रैल, मंगलवार को मनाया जा रहा है. यह अवसर उनके अद्वैत वेदांत के सिद्धांत और समाज सुधार के संदेश को स्मरण करने का होता है.शंकराचार्य का जीवन अत्यंत अनुशासित था. वे प्रतिदिन प्रातःकाल गंगा में स्नान कर तर्पण करते और सूर्योदय से पूर्व अपनी संध्या-पूजा पूर्ण कर लेते थे. इसके बाद वे दर्शन के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर जाया करते थे. उनका यह नियम केवल धार्मिक आचरण नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और साधना का प्रतीक था.एक दिन जब वे पूजा समाप्त कर मंदिर की ओर जा रहे थे, तब एक संकरी गली में उन्हें एक व्यक्ति दिखाई दिया, जो श्मशान में कार्य करता था. वह चार कुत्तों को चार दिशाओं में बैठाकर रास्ता रोके खड़ा था. शंकराचार्य ने विनम्रता से उससे हटने का अनुरोध किया, ताकि वे आगे बढ़ सकें.किन्तु उस व्यक्ति ने शुद्ध संस्कृत में उत्तर देते हुए एक गूढ़ प्रश्न पूछाआप किसे हटाना चाहते हैं, शरीर को या आत्मा को?” उसने आगे कहा कि यदि ब्रह्म सर्वत्र है, तो किसी में भेद कैसे संभव है? शरीर तो अन्न से बना है और आत्मा सर्वव्यापी है. उसने उदाहरण देते हुए कहा कि गंगा में दिखने वाला सूर्य और किसी गंदे जल में दिखने वाला सूर्य अलग नहीं होते.उस व्यक्ति के तर्क और ज्ञान को सुनकर आदि शंकराचार्य आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने तुरंत उसे प्रणाम किया और समझ लिया कि सच्चा ज्ञान किसी जाति या सामाजिक स्तर का मोहताज नहीं होता. उन्होंने उसकी स्तुति में पाँच श्लोकों की रचना की, जिसे मनीषा पंचक कहा जाता है.इन श्लोकों में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप को समझ लेता है, वही सच्चा ज्ञानी और गुरु है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ब्रह्म सच्चिदानंद है और वह सबमें समान रूप से विद्यमान है.जैसे ही ‘मनीषा पंचक’ की रचना पूरी हुई, वह व्यक्ति अचानक अदृश्य हो गया और उसके स्थान पर स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए. उन्होंने शंकराचार्य को आशीर्वाद देते हुए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया.उन्होंने कहा कि समाज में अंधविश्वास और कर्मकांड का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. लोग शास्त्रों का वास्तविक अर्थ समझे बिना केवल बाहरी आडंबर में उलझ गए हैं, जिससे ज्ञान का ह्रास हो रहा है. उन्होंने शंकराचार्य को आदेश दिया कि वे वेद और शास्त्रों की तर्कसंगत व्याख्या करें और लोगों को सही मार्ग दिखाएं.भगवान शिव ने यह भी बताया कि अज्ञान के कारण समाज की धार्मिक, सामाजिक और बौद्धिक शक्तियां कमजोर हो रही हैं. इसका समाधान केवल सही ज्ञान और विवेकपूर्ण समझ में ही निहित है. शंकराचार्य को यह जिम्मेदारी दी गई कि वे लोगों को अंधविश्वास से मुक्त कर सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान की ओर प्रेरित करें.इस दिव्य अनुभव से आदि शंकराचार्य को नई ऊर्जा और प्रेरणा मिली. वे भगवान शिव के संदेश को अपने हृदय में धारण कर अपनी कुटिया लौट आए. यह घटना हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान समानता, विवेक और अद्वैत की भावना में निहित है, जो जीवन को सही दिशा प्रदान करता है. मानव कल्याण का काम करने वाले आदि शंकराचार्य जी की मृत्यु स्थित सन 820 में हो गई थी। उस टाइम इनकी उम्र सिर्फ 32 साल थी और इन 32 सालों में उन्होंने मानव कल्याण के लिए कई काम किए थे।आदि शंकराचार्य जी की मौत को लेकर अलग-अलग लोगों की विभिन्न राय है कई इतिहासकारों का ऐसा मानना है कि आदि शंकराचार्य जी का निधन देश के तमिलनाडु राज्य के कांचीपुरम नाम की जगह पर हुआ था।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

Share3SendTweet2
Previous Post

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बुधवार को देश के प्रथम सीमांत गांव माणा पहुंचे

Next Post

मुख्यमंत्री धामी ने बीआरओ गेस्ट हाउस में बद्रीनाथ धाम मास्टर प्लान की समीक्षा की

Related Posts

उत्तराखंड

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में योगाभ्यास एवं योगा मैट वितरण कार्यक्रम आयोजित

June 18, 2026
5
उत्तराखंड

डोईवाला: पेट्रोनेट एलएनजी के सहयोग से सिपेट में रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण कार्यक्रम

June 18, 2026
20
उत्तराखंड

डोईवाला: नव निर्मित मंदिर में मूर्ति स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा संपन्न

June 18, 2026
38
उत्तराखंड

दिव्यांगजनों को व्हील चेयर व सहायक उपकरण किए वितरित

June 18, 2026
5
उत्तराखंड

कोटद्वार-गोपेश्वर एवं कोटद्वार-ऋषिकेश एम्स हेतु 2 रोडवेज बस सेवा का शुभारंभ, विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खण्डूडी भूषण ने दिखाई हरी झंडी

June 18, 2026
15
उत्तराखंड

उत्तराखंड कैबिनेट में लिये गये तेरह अहम निर्णय’

June 18, 2026
8

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67700 shares
    Share 27080 Tweet 16925
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45782 shares
    Share 18313 Tweet 11446
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38060 shares
    Share 15224 Tweet 9515
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37448 shares
    Share 14979 Tweet 9362
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37338 shares
    Share 14935 Tweet 9335

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में योगाभ्यास एवं योगा मैट वितरण कार्यक्रम आयोजित

June 18, 2026

डोईवाला: पेट्रोनेट एलएनजी के सहयोग से सिपेट में रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण कार्यक्रम

June 18, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.