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स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद

03/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

राजेंद्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे. 26 जनवरी ,1950 को जब हमारा गणतंत्र लागू हुआ तब डॉ प्रसाद को इस पद से सम्मानित किया गया था. आजादी के बाद बनी पहली सरकार में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को नेहरू की सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर खाद्य व कृषि विभाग का काम सौंपा गया. इसके साथ ही इन्हें भारत के संविधान सभा में संविधान निर्माण के लिए अध्यक्ष नियुक्त किया गया. राजेन्द्र प्रसाद गाँधी जी मुख्य शिष्यों में से एक थे, उन्होंने भारत की आजादी के लिए प्राण तक न्योछावर करने की ठान राखी थी. ये स्वतंत्रता संग्राम के रूप में इनका नाम मुख्य रूप से लिया जाता है. राजेन्द्र प्रसाद बिहार के मुख्य नेता थे. नमक तोड़ो आन्दोलन व भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान इन्हें जेल यातनाएं भी सहनी पड़ी. राष्ट्रपति बनने के बाद, प्रसाद जी गैर–पक्षपात व स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कांग्रेस पार्टी से सन्यास ले लिया. प्रसाद जी भारत में शिक्षा के विकास के लिए अधिक जोर देते थे, नेहरु जी की सरकार को उन्होंने कई बार अपनी सलाह भी दी.भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का बस्ती जिले से भी सम्बन्ध देखा गया है। उनका जन्म 3 दिसम्बर, 1884 को बिहार के जिला सिवान के एक गाँव जीरादेई में हुआ था। वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी अपना योगदान दिया था जिसकी परिणति 26 जनवरी 1950 को भारत के एक गणतंत्र के रूप में हुई थी। बाबू राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वज मूलरूप से कुआँगाँव, अमोढ़ा ( बस्ती-उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। यह गांव हर्रैया तहसील के विक्रमजोत विकासखण्ड में अभी भी स्थित है। यह बस्ती जिला मुख्यालय से 40 किमी. की दूरी पर यह बसा है। यह एक कायस्थ परिवार वाला गाव था। कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ कर बलिया जा बसे थे। कुछ परिवारों को बलिया भी रास नहीं आया इसलिये वे वहाँ से बिहार के पूर्ववर्ती जिला सारन तथा वर्तमान जिला सीवान के एक गाँव जीरादेई में जा बसे। इस समय यह एक विकास खण्ड मुख्यालय भी है। इनके परिवारों में राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वजों का परिवार भी था। जीरादेई के पास ही एक छोटी सी रियासत थी– हथुआ। चूँकि राजेन्द्र बाबू के दादा पढ़े-लिखे थे, अतः उन्हें हथुआ रियासत की दीवानी मिल गई। पच्चीस-तीस सालों तक वे उस रियासत के दीवान रहे। उन्होंने स्वयं भी कुछ जमीन खरीद ली थी। राजेन्द्र बाबू के पिता महादेव सहाय इस जमींदारी की देखभाल करते थे। राजेन्द्र बाबू के चाचा जगदेव सहाय भी घर पर ही रहकर जमींदारी का काम देखते थे। अपने पाँच भाई-बहनों में वे सबसे छोटे थे इसलिए पूरे परिवार में सबके प्यारे थे। उनके चाचा के चूँकि कोई संतान नहीं थी इसलिए वे राजेन्द्र प्रसाद को अपने पुत्र की भाँति ही समझते थे। दादा, पिता और चाचा के लाड़-प्यार में ही राजेन्द्र बाबू का पालन-पोषण हुआ। दादी और माँ का भी उन पर पूर्ण प्रेम बरसता था। बचपन में राजेन्द्र बाबू जल्दी सो जाते थे और सुबह जल्दी उठ जाते थे। उठते ही माँ को भी जगा दिया करते और फिर उन्हें सोने ही नहीं देते थे। अतएव माँ भी उन्हें प्रभाती के साथ-साथ रामायण महाभारत की कहानियाँ और भजन कीर्तन आदि रोजाना सुनाती थीं डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रपौत्र डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि राजनीति में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आदर्श बहुत उच्च थे। सिफारिश आदि करना उन्हें कभी पसंद नहीं रहा। उन्होंने अपने परिवार के किसी सदस्य के लिए पैरवी नहीं की। सरकारी नौकरी के दौरान नियम विरुद्ध काम करने के लिए अपने परिवार के एक सदस्य के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश भी कर दी थी।डॉ प्रसाद, अपने कार्यकाल के अंत में केवल 2500 रूपये ही लेते थे. यही नहीं, वे अपने सारे काम खुद ही करते थे और अपने पास केवल एक पर्सनल कर्मचारी रखा था. सादगी पसंद इंसान राजेंद्र बाबू को तोहफों से नफरत थी. वे तो बस लोगों से दुआएं और आशीर्वाद लेना पसंद करते थे न केवल उनके समर्थक, बल्कि विरोधी भी उनकी सादगी और विनम्रता के कायल थे. राजेन्द्र बाबू की पढ़ाई फारसी और उर्दू से शुरू हुई थी. फिर भी उन्होंने बीए में उन्होंने हिंदी ही ली. वे अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी और बंगाली भाषा और साहित्य से पूरी तरह परिचित थे. गुजराती का व्यावहारिक ज्ञान भी उन्हें था. हिन्दू कानून का उन्होंने संस्कृत ग्रंथों से ही अध्ययन किया था. हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था. हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं जैसे भारत मित्र, भारतोदय, कमला आदि में उनके लेख छपते थे. डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी भी थे. वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे. उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई. उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था. राजेन्द्र बाबू महात्मा गांधी की निष्ठा, समर्पण और साहस से बहुत प्रभावित हुए और 1928 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर का पदत्याग कर दिया. गांधीजी ने जब विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की थी तो उन्होंने अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद, जो एक अत्यंत मेधावी छात्र थे, उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय से हटाकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था. उन्हें 1962 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. उन्होंने अपने जीवन के आखिरी दिन पटना के सदाकत आश्रम में बिताए. 138वीं जयंती है. इसको लेकर उनके पैतृक आवास सिवान के जीरादेई में पूरे जोर-शोर से तैयारी चल रही है. आज प्रशासनिक अधिकारी और कई बड़े नेता प्रतिमा पर माल्यार्पण करने पहुंचेंगे. हालांकि देश की आजादी के बाद आज तक उनके पैतृक गांव जीरादेई में आज भी विकास की लोग है राह देख रहे हैं.सिवान जिला मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जीरादेई. देश के पहले राष्ट्रपति और देशरत्न की उपाधि से नवाजे जाने वाले बाबू राजेंद्र प्रसाद का जन्म सन 1884 में इसी जीरादेई की धरती पर हुआ था. विद्वता और सादगी की प्रतिमूर्ति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने तीन बार देश का राष्ट्रपति बन देश की कमान संभाली थी लेकिन आजादी के 75 साल गुजर जाने के बाद भी इस गांव की दशा और दिशा में कोई भी खास परिवर्तन नहीं हुआ. जीरादेई रेलवे स्टेशन पर यात्रियों के बैठने के लिए बने दो चार बेंच के अलावा कोई सुविधा नहीं है. ना तो यहां बड़ी गाड़ियों (ट्रेन) का ठहराव है और ना शौचालय और प्रतीक्षालय. गांव में देशरत्न की धर्मपत्नी राजवंशी देवी के नाम पर एक राजकीय औषधालय की स्थापना हुई थी, लेकिन आज सरकार की उपेक्षा का शिकार होकर वह खंडहर में तब्दील हो गया है. हालांकि देशरत्न की गरिमा और उनके धरोहर को बरकरार रखने की नीयत से केंद्र सरकार द्वारा जीरादेई स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद के पैतृक मकान को पुरातत्व विभाग को सुपुर्द कर दिया गया है. इस कारण देशरत्न का पैतृक मकान उनकी स्मृति शेष के रूप में बच गया है.राज्य सरकार ने इसे पर्यटन स्थल बनाने की घोषणा की थी, लेकिन इस दिशा में भी अब तक कोई कवायद शुरू नहीं हुई है. बावजूद इसके रोजाना यहां पर्यटक आते रहते हैं. प्रधानमंत्री ग्राम विकास योजना के तहत सिवान के तत्कालीन सांसद ने जीरादेई को गोद लिया था लेकिन सांसद के गोद लिए जाने पर भी जीरादेई का विकास नहीं हो पाया. लोगों की मानें तो अधिकारी और नेताओं को सिर्फ जयंती पर जीरादेई और डॉ. राजेंद्र प्रसाद की याद आती है और माल्यार्पण कर सभी वादों को भूल जाते हैं.भारत रत्न बाबू राजेंद्र प्रसाद को शत-शत नमन करता है. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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