डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जिले की गंगा-यमुना घाटी में प्रकृति ने अपने सौंदर्य का खजाना बिखेरा है। बावजूद इसके कुछ खास स्थल आज भी पर्यटकों की नजर से ओझल हैं। क्यारकोटी इन्हीं में से एक है। यहां, प्रकृति ने तो नेमतें बिखेरी हैं, लेकिन सरकार ने इसकी तरफ निगाह फेरी हुई है। भारत-चीन सीमा से लगे क्यारकोटी क्षेत्र में बुग्याल (मखमली घास के मैदान), झील, झरने व गगनचुंबी पहाड की कोई कमी नहीं है। लेकिन, जिम्मेदारों की नजर इधर नहीं गई। यही वजह है कि अब पर्यटन से जुड़े व्यवसायियों ने क्यारकोटी को ‘ट्रैक ऑफ द ईयर’ घोषित करने की मांग की है। ताकि यह क्षेत्र पर्यटन मानचित्र पर आ सके। जिले की गंगा-यमुना घाटी में प्रकृति ने अपने सौंदर्य का खजाना बिखेरा है। बावजूद इसके कुछ खास स्थल आज भी पर्यटकों की नजर से ओझल हैं। क्यारकोटी इन्हीं में से एक है। यहां, प्रकृति ने तो नेमतें बिखेरी हैं, लेकिन सरकार ने इसकी तरफ निगाह फेरी हुई है। भारत-चीन सीमा से लगे क्यारकोटी क्षेत्र में बुग्याल (मखमली घास के मैदान), झील, झरने व गगनचुंबी पहाड की कोई कमी नहीं है। लेकिन, जिम्मेदारों की नजर इधर नहीं गई। यही वजह है कि अब पर्यटन से जुड़े व्यवसायियों ने क्यारकोटी को ‘ट्रैक ऑफ द ईयर’ घोषित करने की मांग की है। ताकि यह क्षेत्र पर्यटन मानचित्र पर आ सके।प्राकृतिक सौंदर्य और जैव विविधता से भरपूर हर्षिल घाटी में पर्यटन की अपार संभावनाएं होने के बावजूद बुनियादी विकास और सरकारी पहल की कमी स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि यदि यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों को व्यवस्थित रूप से विकसित और प्रचारित किया जाए तो पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।हर्षिल घाटी में बुग्याल सहित ताल व ट्रैक, ऊंचे वॉटरफाल और जैव विविधता का सुंदर संसार बसता है लेकिन आज भी धार्मिक सहित रोमांच और जैव विविधता व ट्रैकिंग के दृष्टिकोण से पर्यटन मानचित्र पर स्थान नहीं मिल पाया है। हालांकि स्थानीय लोगों की ओर से इन पर्यटक स्थलों के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य किया जा रहा है लेकिन शासन-प्रशासन की ओर से सहयोग नहीं मिल पाया है। लोगों का कहना है कि बुग्याल, तालों व ट्रैक को विकसित किया जाता है तो इससे घाटी के आठ गांव के लोग रोजगार से जुड़ेंगे।गढ़वाल माउंटेनियरिंग व ट्रैकिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष ने बताया कि हर्षिल घाटी में ब्रहमीताल सहित काणाताल, ऋषि वन, मोनाल ट्रेल, अवाणा, कंडारा, मंगला छु ताल, खादरा वाटरफाल और सुमेरू पर्वत आदि स्थित है। यह स्थान अपनी जैव विविधता सहित ट्रैक व प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। साथ ही इन सभी स्थानों का केदारखंड में धार्मिक महत्व है लेकिन आज तक इन स्थानों को पर्यटन मानचित्र पर स्थान नहीं मिल पाया है।अगर इनको विकसित किया जाता है तो इससे स्थानीय लोगों को भी होमस्टे, गाइड, वाहनों के माध्यम से रोजगार मिलेगा। बताया कि यह सभी स्थान समुद्रतल से करीब 11 से 13 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। साथ ही वहां पर भी दुर्लभ वन्य जीव सहित औषधियां, पक्षियों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। हर्षिल घाटी की सुंदरता का आनंद लेते हुए, जिम्मेदार पर्यटन के महत्व को समझना आवश्यक है। पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना और स्थानीय संस्कृति का सम्मान करना यह सुनिश्चित करता है कि यह स्वर्ग आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित स्थान बना रहे। त्तरकाशी जनपद की भगीरथी नदी में एक शिला समाई हुई है जिसे हरि शिला कहा जाता है. इसी कारण इस गांव का नाम हरिशिला पड़ा और बाद में इसे हर्षिल कहा गया. कहा जाता है कि भगवान विष्णु यहां बैठकर तप किया करते थे. नदी में ग्रे रंग की ये शिलाएं विशेष महत्व की थीं क्योंकि यह भगवान विष्णु का आसन हुआ करती थी. इसी कारण पास में ही भगवान विष्णु का लक्ष्मी नारायण मंदिर स्थापित किया गया था. आज हरसिल और इसके आसपास के इलाकों में बारिश के बाद तबाही देखने को मिलती है, लेकिन पहले हर्षिल में वर्ष भर बर्फ जमी रहती थी और साल के अधिकतर समय यहां बर्फ गिरती थी. जलवायु परिवर्तन और मानव हस्तक्षेप ने यहां का मौसम बदल दिया.भगीरथी, विष्णुगंगा और जालंधरी नदियों के संगम के नजदीक बसा हर्षिल, जिसे पहले ‘हरिशिला’ कहा जाता था, भगवान विष्णु से जुड़ा हुआ स्थल है. पौराणिक काल में यहां भगीरथी और जालंधरी नदियों की धाराएं तेज हुआ करती थीं, जिन्हें भगवान विष्णु ने हरि के रूप में अवतरण कर शांत किया. 1857 में ब्रिटिश ऑफिसर फेड्रिक विल्सन उत्तरकाशी के हरिशिला आए, जिन्हें यहां की वादियों की खूबसूरती बहुत भायी. वह कई सालों तक यहां रहे और हरिशिला का उच्चारण नहीं कर पाने के कारण इसका नाम उन्होंने हर्षिल रखा. उत्तरकाशी जनपद की हर्षिल घाटी एक खूबसूरत हिल स्टेशन है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और पौराणिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है. हरिशिला नाम ‘हरि’ (भगवान विष्णु) और ‘शिला’ (चट्टान) से बना है. कहा जाता है कि हर्षिल में भगवान विष्णु ने भागीरथी नदी के तट पर तपस्या की थी. यद्यपि हर्षिल का उल्लेख प्रमुख पुराणों में कम मिलता है, इसका संबंध गंगोत्री जैसे धार्मिक स्थलों से है, जो हर्षिल से लगभग 22 किमी दूर स्थित है. हर्षिल गंगोत्री मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहां से तीर्थयात्री आगे यात्रा करते हैं. यहां के स्थानीय मंदिर, जैसे लक्ष्मी नारायण मंदिर, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का प्रमाण देते हैं. हर्षिल न केवल पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका धार्मिक महत्व भी है. इस घाटी में सेब के बगीचे, खूबसूरत घाटियां और लकड़ियों के घर पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. ग्राम प्रधान बगोरी भवान सिंह राणा कहते हैं कि पर्यटन विभाग ने बीते वर्षों में चाईंशिल और दयारा बुग्याल ट्रैक को ‘ट्रैक ऑफ द ईयर’ घोषित किया गया था। इसी तरह अब क्यारकोटी ट्रैक को भी ‘ट्रैक ऑफ द ईयर’ घोषित किया जाना चाहिए। उत्तरकाशी के सहायक जिला पर्यटन अधिकारी बीपी टम्टा के मुताबिक किसी भी ट्रैक को ‘ट्रैक ऑफ द ईयर’ घोषित करना शासन स्तर का मामला है। ट्रैक कितना विकसित हो रहा है, यहां कितने सैलानी पहुंच रहे है, यह जानकारी शासन को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी पर्यटन विभाग की है।











