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कस्तूरी मृग अभयारण्य में भी वनाग्नि, आफत में वन्यजीवों की जान

24/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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*कस्तूरी मृग अभयारण्य में भी वनाग्नि, आफत में वन्यजीवों की जान* डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला उत्तराखंड के पिथौरागढ़ शहर से करीब 54 किलोमीटर दूर स्थित है अस्कोट कस्तूरी मृग अभयारण्य। समुद्र तल से करीब 5412 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस अभयारण्य की स्थापना वर्ष 1986 में कस्तूरी मृगों (मोस्कस ल्यूकोगैस्टर) व उसके आवास के संरक्षण के उद्देश्य से की गई है। इसके अलावा अभयारण्य बनाने का मूल उद्देश्य क्षेत्र की दुर्लभ वनस्पतियों और वन्यजीवों की वृहद जैव विविधता का संरक्षण करना भी था। 600 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैले इस अभयारण्य में लगभग 67 कस्तूरी मृग हैं। यह मृग अभयारण्य वन्यजीव और प्रकृति प्रेमियों के बीच काफी लोकप्रिय है। यह जगह कस्तूरी हिरणों के अलावा हिम तेंदुए , हिमालयन थार , ब्लू भेड़ , सेरोव , चाइर , काकड़ , घोरड़ , हिमालयी काले भालू , फेशियंस , चूकर्स , तहर , भरल और कोक्लासों के लिए भी सुरक्षित घर है। यह अभयारण्य सागौन और नीलगिरी के घने जंगलों व बर्फीले पहाड़ों के बीच स्थित है। इस अभयारण्य से पंचचुली , नौकना पहाड़ और हिमालय की सुंदरता देखते ही बनती है। यह अभयारण्य धौली और इकली नदियों का उद्गम स्थान है।अस्कोट अभयारण्य, जिसे अस्कोट कस्तूरी मृग अभयारण्य के नाम से भी जाना जाता है, उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले में अस्कोट शहर के पास स्थित एक संरक्षित क्षेत्र है। अस्कोट कस्तूरी मृग अभयारण्य की स्थापना 1986 में लुप्तप्राय कस्तूरी मृग और उसके आवास के संरक्षण के लिए की गई थी। यह अभयारण्य लगभग 600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और 1,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। अभयारण्य की भौगोलिक स्थिति विविध है, जिसमें समुद्र तल से ऊंचाई 6,905 मीटर तक है। अभयारण्य लगभग 599.93 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।वन्यजीव अभयारण्य उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में है. यह अभयारण्य मुख्य रूप से कस्तूरी मृग के संरक्षण के लिए जाना जाता है. यहां हिम तेंदुआ, तेंदुआ, भालू और कई दुर्लभ पक्षी पाए जाते हैं. घने जंगल, ऊंचे पहाड़ और समृद्ध जैव विविधता इसे विशेष बनाती है. यहां की ऊंचाई 600 मीटर से लेकर 6900 मीटर तक है, जिसकी वजह से कई प्रकार की जलवायु और वनस्पति पाई जाती है. कई छोटे स्तनधारी जीव भी पाए जाते हैं, जो इस पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखते हैं. गर्मियां बढ़ते ही प्रदेश के जंगल एक बार फिर से धधक उठे हैं. आग की इतनी तेजी से आबादी की तरफ बढ़ रही है कि जंगल के आसपास रहने वाले लोग दहशत में हैं. अस्कोट का कस्तूरी मृग अभयारण्य भी वनाग्नि की चपेट में है. हर साल जंगलों की आग गर्मियों में आपदा जैसे हालात पैदा कर देती है. इससे बड़े-बड़े जंगल तो तबाह होते ही हैं, साथ ही इन वनों में मौजूद वनस्पतियां भी प्रभावित होती हैं. गर्मियां शुरू होते ही पिथौरागढ़ समेत जिले के अधिकांश जंगलों में आग लगने की घटनाओं मैं तेजी से बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है. पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय सहित आसपास के क्षेत्र के जंगलों में पिछले एक सप्ताह से आग लगी हुई है. आग से जंगल जलकर खाक हो गए हैं. बेरीनाग, गंगोलीहाट, गणाई, थल, डीडीहाट, मुनस्यारी, धारचूला सहित बागेश्वर जनपद के धरमघर, कपकोट, कांडा और गरुड़ क्षेत्र के जंगलों में इन दिनों भीषण आग लगी है. इससे अमूल्य वन संपदा जलकर खाक हो रही है. वहीं दूसरी ओर वायुमंडल और इंसानों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है. जंगल आग उगल रहे हैं. वनाग्नि के कारण चारों तरफ धुआं छाया हुआ है. जंगलों की लगी आग का धुला नगरों तक फैल चुका है. इन हालात ने वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों को चिंता में डाल दिया है.  वनाग्नि को बुझाने के लिए पूर्व में की गई तैयारी और माॅक ड्रिल पर पर कितनी सच्चाई है, लेकिन अधिकांश स्थानों पर जंगल जल रहे थे. कुछ स्थानों पर वन विभाग कर्मी पुराने आग बुझाने के तरीके से आग बुझा रहे थे. अन्य कई जगह आग बुझाता हुआ कोई नहीं दिखाई दे रहा था. 15 फरवरी से 15 जून तक का फायर सीजन प्रदेश के जंगलों के लिए बेहद संवेदनशील होता है. शीतकाल में यदि अच्छी वर्षा और बर्फबारी हो जाए, तो जंगलों में आग लगने की अवधि पीछे खिसक जाती है. मगर इस वर्ष अन्य वर्षों की अपेक्षा बर्फबारी की बेरुखी के परिणाम गर्मी के मौसम के शुरुआत में ही नजर आने लगे हैं. अप्रैल में ही अनियंत्रित रूप से सामने आ रही वनाग्नि की घटनाओं ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है. इससे पहाड़ों पर चारों और धुआं छाया हुआ है. जंगलों में लगी आग जहां एक तरफ वायुमंडल के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रही है, तो वहीं इंसानों के स्वास्थ्य के लिए इसका धुआं बेहद खतरनाक साबित हो रहा है. नई फायर लाइन बनाने में रुचि नहीं होने से हर साल वनाग्नि की समस्या विकराल होती जा रही है. वनाग्नि के नाम पर हर साल सरकार और वन विभाग करोड़ों रुपए फूंक देते हैं, लेकिन नतीजा शून्य ही निकलता है. प्रदेश का वन विभाग भी अन्य देशों की तरह जंगल की आग पर काबू पाने के नये-नये तरीके खोज कर रहा है, लेकिन सालों पुरानी तरकीब भूलता जा रहा है. इसका परिणाम वन्यजीवों और प्रदेश की जनता को भुगताना पड़ रहा है. वन विभाग तब सक्रिय होता है, जब जंगलों में आग की घटनाएं शुरू हो जाती हैं और आनन-फानन में फायर लाइन को साफ करने का काम विभाग के कर्मचारी करते हैं. 100, 50 और 30 फीट के साथ ही सड़कों के किनारे भी फायर लाइन तैयार होती हैं. राज्य में फायर लाइन की स्थिति देखें तो 2876.49 किलोमीटर क्षेत्र में 100 फीट की फायर लाइन बनी हुई है. 50 फीट की फायर लाइन की लंबाई 2520 किलोमीटर है, जबकि 30 फीट की फायर लाइन 1333.43 किलोमीटर पर फैली हुई है. क्षेत्र के लिहाज से देखें तो कुमाऊं जोन में करीब 3000 किलोमीटर क्षेत्र में फायर लाइन है. गढ़वाल जोन में करीब 2500 किलोमीटर फायर लाइन है. वन्यजीव क्षेत्र में 1100 किलोमीटर फायर लाइन है.  राज्य में फायर लाइन बनाने को लेकर कुछ तकनीकी समस्याएं भी हैं. 1000 मीटर से ऊपर स्थानों पर पेड़ों के काटने को लेकर रोक है. लिहाजा यहां नई फायर लाइन नहीं बनाई जा सकती. उधर, वन विभाग जंगलों में आग की घटनाओं को रोकने के लिए 12 महीने काम नहीं करता. इस कारण प्रदेश में करीब 12 हजार से ज्यादा किलोमीटर की फायर लाइन को साफ नहीं किया जाता. जबकि राज्य में चीड़ के जंगल बहुतायत में हैं. इनकी पत्तियां फायर लाइन पर इकट्ठा हो जाती हैं, जिससे फायर लाइन का महत्व ही खत्म हो जाता है.यही नहीं फायर लाइन पर कई जगह पेड़ भी उग गए हैं और इनको न काट पाने की पाबंदी के चलते यह पारंपरिक तरीका फेल होता जा रहा है. पूर्व दर्जा राज्य मंत्री ने बताया कि गंगोलीहाट विधानसभा क्षेत्र के सैकड़ों हेक्टेयर जंगल जलकर खाक हो गये हैं. कई स्थानों पर उन्होंने खुद कार्यकर्ताओं के साथ आग बुझाने का कार्य भी किया. सरकार के द्वारा सिर्फ आग बुझाने खोखले दावे किये जा रहे हैं. धरातल पर कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है. पिथौरागढ़ के विधायक ने भी प्रदेश को जंगल की आग बुझाने में पूरी तरह फेल होने का आरोप लगाते हुए वन सम्पदा नष्ट होने के लिए प्रदेश सरकार को जिम्मेदार ठहराया है. वन क्षेत्र के तहत आने वाला अस्कोट कस्तूरी मृग अभयारण्य पिछले 10 दिनों से धधक रहा है. अभयारण्य में भीषण आग लगने से क्षेत्र में पाए जाने वाले दुर्लभ कस्तूरा मृग के जीवन पर खतरा मंडरा गया है. अभयारण्य से पिछले 10 दिनों से लगातार धुआं उठ रहा है. वनाग्नि ने अभयारण्य के बड़े दायरे को अपनी चपेट में लिया है. हजारों हेक्टेयर में फैले इस जंगल में कस्तूरी मृग के अलावा भालू, तेंदुआ, हिरन आदि दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी है. वनाग्नि से इन वन्यजीवों के जीवन पर भी संकट आ गया है. वहीं बहुमूल्य वन संपदा को भी आग से खासा नुकसान पहुंच रहा है. यदि क्षेत्र के जंगलों में लगी आग से वन्यजीव आबादी इलाके में पहुंचे तो इससे मानव जीवन को भी खतरा हो सकता है. दुर्लभ वन्य जीवों के शिकार के लिए लगाई जाती है आग अभयारण्य क्षेत्र में वनाग्नि की घटनाएं पूर्व में भी सामने आ चुकी हैं. कस्तूरी मृग सहित अन्य दुर्लभ वन्यजीवों के शिकार के लिए शिकारी यहां के जंगलों में आग लगाते हैं. वन विभाग हर बार शिकारियों को पकड़कर उनके खिलाफ कार्रवाई की बात करता है. हैरानी है कि अब तक न तो कोई शिकारी और ना ही आग लगाने वाला वन विभाग की पकड़ में आ सका है. ऐसे में वन विभाग के जंगलों को आग से बचाने और वन्यजीवों की सुरक्षा के दावों पर सवाल उठ रहे हैं. . लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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