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चारधाम यात्रा के साथ बढ़ा पर्यावरणीय संकट

08/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा इस वर्ष श्रद्धालुओं की भारी आमद के साथ नए रिकॉर्ड बना रही है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु बाबा केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। आस्था का यह विशाल प्रवाह जहां प्रदेश के पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते कचरे और पर्यावरणीय दबाव ने प्रशासन, पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है।यात्रा सीजन के शुरुआती डेढ़ महीने के भीतर ही चारधाम क्षेत्रों से 288 टन से अधिक ठोस कचरा एकत्र किया जा चुका है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ पर्यावरण संरक्षण की चुनौती भी तेजी से बढ़ रही है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केदारनाथ धाम में अब “कैरी मी बैक” अभियान शुरू किया गया है, जिसके माध्यम से यात्रियों को अपना कचरा स्वयं वापस लेकर आने के लिए जागरूक किया जा रहा है। उत्तराखंड की चारधाम यात्रा हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनती है। इस वर्ष भी यात्रा के शुरुआती महीनों में ही रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालु धामों तक पहुंच चुके हैं। पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार अब तक 29 लाख से अधिक यात्री चारधाम यात्रा कर चुके हैं।बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए लंबी कतारें लग रही हैं, जबकि बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री में भी श्रद्धालुओं का उत्साह लगातार बढ़ता जा रहा है। बेहतर सड़क सुविधाएं, डिजिटल पंजीकरण व्यवस्था, हेलीकॉप्टर सेवाएं और यात्रा प्रबंधन में सुधार के कारण बड़ी संख्या में लोग यात्रा का हिस्सा बन रहे हैं।हालांकि यात्रियों की इस बढ़ती संख्या का सीधा प्रभाव हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता मानवीय दबाव भविष्य में गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकता है। यात्रा मार्गों और धाम क्षेत्रों में सबसे बड़ी चुनौती ठोस कचरे के प्रबंधन की बनकर उभरी है। प्रशासन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार यात्रा के शुरुआती डेढ़ महीने के दौरान 288 टन से अधिक कचरा एकत्र किया गया है।इस कचरे में प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य पदार्थों के पैकेट, पॉलीथिन, डिस्पोजेबल कप-प्लेट, पैकिंग सामग्री और अन्य ठोस अपशिष्ट शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एकत्रित किया गया कचरा है, जबकि कई स्थानों पर अब भी कचरा खुले क्षेत्रों और पहाड़ी ढलानों पर देखा जा सकता है।हिमालयी क्षेत्रों में कचरे का निस्तारण मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक कठिन होता है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के कारण कचरा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन जाता है। पर्यावरणविदों का कहना है कि हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में से एक है। यहां का पारिस्थितिकी तंत्र बेहद नाजुक माना जाता है और किसी भी प्रकार का प्रदूषण लंबे समय तक प्रभाव छोड़ सकता है।प्लास्टिक कचरा न केवल भूमि प्रदूषण बढ़ाता है बल्कि जल स्रोतों और वन्यजीवों के लिए भी खतरा पैदा करता है। कई बार प्लास्टिक सामग्री नदियों और जलधाराओं में पहुंच जाती है, जिससे जल गुणवत्ता प्रभावित होती है।विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में चारधाम क्षेत्र पर्यावरणीय संकट का सामना कर सकते हैं। बढ़ती तीर्थयात्रा के साथ सतत और जिम्मेदार पर्यटन मॉडल अपनाना समय की आवश्यकता बन चुका है। चारधाम यात्रा के दौरान लाखों लोगों के आगमन से प्रशासन पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ता है। सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, यातायात व्यवस्था और आवास सुविधाओं के साथ-साथ कचरा प्रबंधन भी एक बड़ी जिम्मेदारी बन जाता है।राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन ने कचरा संग्रहण के लिए अतिरिक्त संसाधन लगाए हैं। कई स्थानों पर कचरा पृथक्करण केंद्र स्थापित किए गए हैं और सफाई कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ाई गई है।इसके बावजूद श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि के कारण चुनौती बनी हुई है। अधिकारियों का कहना है कि केवल प्रशासनिक प्रयासों से समस्या का समाधान संभव नहीं है, इसके लिए यात्रियों की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है। चारधाम मार्गों से जुड़े गांवों और कस्बों के निवासियों ने भी बढ़ते कचरे को लेकर चिंता जताई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यात्रा सीजन के दौरान कई क्षेत्रों में कचरे के ढेर दिखाई देने लगते हैं, जिससे प्राकृतिक सौंदर्य प्रभावित होता है।कुछ स्थानों पर कचरे से दुर्गंध और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न होने लगती हैं। स्थानीय संगठनों का मानना है कि धार्मिक पर्यटन के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।स्थानीय लोग चाहते हैं कि यात्रियों को यात्रा शुरू करने से पहले पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के बारे में जागरूक किया जाए ताकि वे यात्रा के दौरान स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि चारधाम यात्रा को पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं। इनमें सिंगल यूज प्लास्टिक पर सख्त नियंत्रण, पुनर्चक्रण व्यवस्था को मजबूत करना, जैविक कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण और पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम शामिल हैं।विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि यात्रा पंजीकरण के दौरान श्रद्धालुओं को पर्यावरण संरक्षण संबंधी दिशा-निर्देश दिए जाएं। इसके अलावा यात्रा मार्गों पर पर्याप्त संख्या में कूड़ेदान और अपशिष्ट संग्रह केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए। चारधाम यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं बल्कि हिमालयी संस्कृति और प्रकृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आयोजन भी है। ऐसे में यात्रा की सफलता केवल श्रद्धालुओं की संख्या से नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण के स्तर से भी मापी जानी चाहिए।प्रशासन, स्थानीय समुदाय, स्वयंसेवी संगठन और श्रद्धालु यदि मिलकर जिम्मेदारी निभाएं तो चारधाम यात्रा को स्वच्छ और हरित बनाया जा सकता है। “कैरी मी बैक” जैसे अभियान इसी दिशा में महत्वपूर्ण पहल माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चारधाम यात्रा की लोकप्रियता आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी।हिमालय केवल एक पर्यटन स्थल नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और जीवनदायिनी नदियों का स्रोत भी है। इसलिए इसकी स्वच्छता और सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।चारधाम यात्रा में रिकॉर्ड संख्या में पहुंच रहे श्रद्धालु जहां उत्तराखंड के लिए गौरव का विषय हैं, वहीं बढ़ता कचरा यह याद दिलाता है कि प्रकृति की रक्षा के बिना विकास और पर्यटन दोनों अधूरे हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए तो भविष्य की पीढ़ियां भी हिमालय की इसी पवित्रता और सुंदरता का अनुभव कर सकेंगी। यह भीड़ सीधे वैश्विक और स्थानीय तापमान को बढ़ा रही है जिसका दुष्परिणाम जलवायु परिवर्तन और चरम मौसम के कारण उत्पन्न दैवी आपदाओं के रूप में रूप में सामने नजर आ रहे हैं। चूंकि हिमालय ऐशिया का जलस्तंभ होने के साथ ही मौसम का नियंत्रक भी है और यह ऐशिया के पांच देशों से जुड़ा हुआ है। इसलिये हिमालय की चिन्ता केवल उत्तराखण्ड तक ही सीमित नहीं है। इसलिये हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में यात्री वाहनों की संख्या बढ़ाने के बजाय उस पर सख्त नियमन की आवश्यकता है। वाहनों से उत्सर्जित वायु प्रदूषण गैसों और कणों का मिश्रण होता है। साइंस जनरल के फरवरी अंक में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, गैसों में नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स), कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और ओजोन शामिल हैं। पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) में कार्बनिक और मौलिक कार्बन, सीसा जैसे धातु और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन शामिल होते हैं। डीजर्ल इंधन से चलने वाले वाहन सर्वाधिक ब्लैक कार्बन उत्सर्जित करते हैं। ब्लैक कार्बन एक प्रकार का कण पदार्थ (पीएम) है जो जीवाश्म ईंधन, बायोमास और अन्य कार्बनिक पदार्थों के अधूरे दहन से उत्पन्न होता है। यह सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर और वातावरण को गर्म करता है और जलवायु को भी प्रभावित करता है। साथ ही यह बर्फ की सतह पर जमा होने पर बर्फ के पिघलने की गति भी बढ़ाता है। वाहनों से सबसे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है जो कि जीवाश्म ईंधन के दहन से उत्पन्न एक ग्रीनहाउस गैस है। यह जलवायु परिवर्तन में योगदान देने वाली प्राथमिक गैस है। वाहनों से उत्सर्जित वायु प्रदूषण गैसों और कणों का मिश्रण होता है। साइंस जनरल के फरवरी अंक में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, गैसों में नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स), कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और ओजोन शामिल हैं। पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) में कार्बनिक और मौलिक कार्बन, सीसा जैसे धातु और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन शामिल होते हैं। डीजर्ल इंधन से चलने वाले वाहन सर्वाधिक ब्लैक कार्बन उत्सर्जित करते हैं। ब्लैक कार्बन एक प्रकार का कण पदार्थ (पीएम) है जो जीवाश्म ईंधन, बायोमास और अन्य कार्बनिक पदार्थों के अधूरे दहन से उत्पन्न होता है। यह सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर और वातावरण को गर्म करता है और जलवायु को भी प्रभावित करता है। साथ ही यह बर्फ की सतह पर जमा होने पर बर्फ के पिघलने की गति भी बढ़ाता है। वाहनों से सबसे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है जो कि जीवाश्म ईंधन के दहन से उत्पन्न एक ग्रीनहाउस गैस है। यह जलवायु परिवर्तन में योगदान देने वाली प्राथमिक गैस है। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन ग्रीनहाउस गैसें हैं जो जलवायु परिवर्तन में योगदान करती हैं। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन गैस एरोसोल के निर्माण और व्यवहार को प्रभावित करती है जिसके गर्म और ठंडे दोनों चरम प्रभाव हो सकते हैं। इसी तरह मीथेन वायुमंडल में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से एरोसोल के निर्माण को जन्म देती है। एरोसोल बादल निर्माण और गुणों को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे पृथ्वी का विकिरण संतुलन प्रभावित होता है और चरम मौसम की स्थिति पैदा हो जाती है जिससे दैवी आपदाओं का खतरा बना रहता है। इसलिए एरोसोल सांद्रता में परिवर्तन जलवायु प्रतिक्रिया तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे ग्रीनहाउस गैसों की भूमिका और जटिल हो जाती है। अब कल्पना की जा सकती है कि वाहनों का रेला किस तरह हिमालय को नुकसान पहुंचा रहा है। यद्यपि अब वाहनों के सख्त नियमन से पार्टिकुलेट मैटर और नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आई है, लेकिन वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण सुधार अधूरे साबित हो रहे हैं। दि इसी तरह लगातार प्रदूषण बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में गंगोत्री ग्लेशियर समेत अन्य हिमनद तेजी से पिघल सकते हैं। इससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि भविष्य में जल संकट जैसी बड़ी समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं।पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार मानवीय हस्तक्षेप और बढ़ते प्रदूषण का असर अब मौसम चक्र पर भी साफ दिखाई देने लगा है। हर्षिल, मुखबा और आसपास के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पहले जहां सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी होती थी, वहीं अब बर्फबारी बेहद कम हो गई है। स्थानीय लोग भी मौसम में हो रहे इस बदलाव को महसूस कर रहे हैं।इसके अलावा बढ़ते तापमान और सूखे वातावरण के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं। जंगलों में लग रही आग से वन संपदा, जैव विविधता और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। कई दुर्लभ प्रजातियों के अस्तित्व पर भी इसका असर पड़ रहा है।एक्सपर्ट का कहना है कि चारधाम यात्रा को पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना, सीमित संख्या में वाहनों की अनुमति, बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता अभियान चलाना समय की मांग बन चुकी है।विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते हिमालयी क्षेत्रों के पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी गई तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड को गंभीर प्राकृतिक और पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ सकता है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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