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20वीं सदी के ‘तानसेन’ बड़े गुलाम अली खान ने संगीत को दिया नया आयाम

24/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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* डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला 25 अप्रैल 1968 को बड़े गुलाम अली खां का निधन हो गया था लेकिन उनके गाने आज भी लोगों को पसंद आते हैं। उनका परिवार संगीत से गहराई से जुड़ा हुआ था। पिता अली बख्श खां और चाचा काले ख़ां प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे। बचपन से ही उन्हें संगीत की शिक्षा घर पर ही मिलनी शुरू हो गई थी।20वीं सदी के हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में अपने हुनर का जादू चलाने वाले बड़े गुलाम अली खान की आज 55वीं पुण्यतिथि है। बड़े गुलाम अली खान संगीत के हर मायने में उस्ताद थे और उन्होंने शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट शैली में अपना हुनर दिखाया, जिसने उन्हें अमर कर दिया। गुलाम उन चंद शास्त्रीय गायकों मे से एक थे जो राग और श्रोताओं दोनों की नब्ज पकड़ते हुए उनके मिजाज को बखूबी भांप लेते थे। इसी के अनुसार वह अपने राग की अवधि तय किया करते थे। इसी का नतीजा है कि उन्हें 20वीं सदी का ‘तानसेन’ कहा जाता है। याद पिया की आए…आए ना बलम…नैना मोरे तारास गाये…जैसे गीतों को गाकर अमर कर देने वाले उस्ताद बड़े गुलाम अली खां भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में एक ऐसा नाम है जिन्होंने श्रोताओं के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। वे पटियाला घराने के महान प्रतिनिधि थे और अपनी विलक्षण आवाज, अद्भुत तानों तथा भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए जाने जाते थे। 25 अप्रैल 1968 को बड़े गुलाम अली खां का निधन हो गया था लेकिन उनके गाने आज भी लोगों को पसंद आते हैं।बड़े गुलाम अली खां का जन्म 2 अप्रैल 1902 में वर्तमान पाकिस्तान के कसूर (पंजाब) में हुआ था। उनका परिवार संगीत से गहराई से जुड़ा हुआ था। पिता अली बख्श खां और चाचा काले ख़ां प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे। बचपन से ही उन्हें संगीत की शिक्षा घर पर ही मिलनी शुरू हो गई थी, जिससे उनकी नींव अत्यंत मजबूत बनी। उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ां ने अपना जीवन लाहौर, बम्बई, कोलकाता और हैदराबाद में व्यतीत किया। प्रसिद्ध गजल गायक गुलाम अली इनके शिष्य थे। इनका परिवार संगीतज्ञों का परिवार था। बड़े गुलाम अली खां की संगीत की दुनिया का प्रारंभ सारंगी वादक के रूप में हुआ था। बाद में उन्होंने अपने पिता अली बख्श खां, चाचा काले खां और बाबा शिंदे खां से संगीत के गुर सीखे। अली बख्श खां महाराजा कश्मीर के दरबारी गायक थे और वह घराना “कश्मीरी घराना” कहलाता था। जब ये लोग पटियाला जाकर रहने लगे तो यह घराना “पटियाला घराना” के नाम से जाना जाने लगा। अपने सधे हुए कंठ के कारण बड़े गुलाम अली खां ने बहुत प्रसिद्धि पाई। सन् 1919 के लाहौर संगीत सम्मेलन में बड़े गुलाम अली खां ने अपनी कला का पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन किया। इसके कोलकाता और इलाहाबाद के संगीत सम्मेलनों ने उन्हें देशव्यापी ख्याति दिलाई। अपनी बेहद सुरीली और लोचदार आवाज तथा अभिनव शैली के बूते ठुमरी को एकदम नये अंदाज में ढाला, जिसमें लोक संगीत की मिठास और ताजगी दोनों मौजूद थी।अपने खयाल गायन में ध्रुपद, ग्वालियर घराने और जयपुर घराने की शैलियों का खूबसूरत संयोजन करते थे। बड़े गुलाम अली खां के मुंह से एक बार “राधेश्याम बोल” भजन सुनकर महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुए थे। मुगल-ए-आजम (1960) फिल्म में तानसेन पात्र के लिए उन्होंने ही अपनी आवाज दी थी। बड़े गुलाम अली खां ने भारत और विदेशों में कई मंचों पर प्रदर्शन किया। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ आम श्रोताओं में भी उनका विशेष स्थान बन गया।बड़े गुलाम अली खान साहब फिल्मों में गाने के सख्त खिलाफ थे। जब फिल्म निर्देशक के. आसिफ ने उनसे ‘मुगल-ए-आजम’ के लिए गाने का अनुरोध किया, तो उन्होंने मना करने के इरादे से उस समय की सबसे बड़ी रकम 25,000 रुपये प्रति गाना मांगा, जबकि उस दौर में लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसे बड़े गायक 500 रुपये के आसपास लेते थे। उमराव जान के निर्देशक के. आसिफ ने तुरंत यह शर्त मान ली और बड़े गुलाम अली खां को फिल्म के लिए गाना पड़ा। उन्होंने फिल्म में तानसेन के किरदार के लिए ‘प्रेम जोगन बन के’ और ‘शुभ दिन आयो’ गीत गाए।1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद वे कुछ समय के लिए पाकिस्तान चले गए लेकिन बाद में भारत लौट आए और यहीं बस गए। उन्होंने भारत को ही अपनी कर्मभूमि बनाया और जीवन के अंतिम वर्षों तक संगीत सेवा में लगे रहे। असाधारण कला के लिए 1962 में पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। लंबी बीमारी के बाद बड़े गुलाम अली खां का निधन 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद के बशीर बाग पैलेस में हो गया था। अपने बेटे मुनव्वर अली खान के सहयोग से वे अपनी मृत्यु तक सार्वजनिक रूप से गाते और प्रदर्शन करते रहे।संगीत के इस उस्ताद को 1962 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1967 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप से नवाजा गया. वर्ष 1962 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. आज भी उनकी विरासत जिंदा है और इसका श्रेय उनके बेटे मुनव्वर अली की संतानों और संगीतकार अजय चक्रवर्ती को जाता है. खान साहब प्रयोगधर्मी थे और इसी कारण उन्होंने ठुमरी को उसकी जानी-पहचानी शैली से बाहर निकाल एक अलग शैली में ढाला. आज भी उनकी ठुमरी को, ठुमरी फेस्टिवल तथा सबरंग उत्सव के बहाने याद किया जाता है. बड़े गुलाम अली खान यदि आज भी हमारे दिलों में जिंदा हैं, तो अपनी अद्भुत गायन शैली और मखमली आवाज के कारण.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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