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कोरोना के बाद बढ़ी गिलोय में उत्सुकता

02/03/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
देश में आयुर्वेद का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है. आयुर्वेद में गिलोय के कई फायदे बताए गए हैं. जानकारों का कहना है कि गिलोय का सेवन काफी फायदेमंद होता है. गिलोय को लेकर भारत ही नहीं वैश्विक स्तर पर चर्चा हो रही है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध बायोमेडिकल एंड लाइफ साइंस रिसर्च संस्था पबमेड का दावा है कि पिछले एक दशक में गिलोय को लेकर प्रकाशित होने वाले रिसर्च पब्लिकेशन में 376 फीसदी की वृद्धि हुई है. इससे जाहिर होता है कि वैश्विक स्तर पर गिलोय की रोग निवारक क्षमता के प्रति लोगों की रुचि बढ़ी है. डेटा के अनुसार गिलोय को लेकर वर्ष 2014 में 243 अध्ययन प्रकाशित हुआ जो वर्ष 2024 में बढ़कर 913 हो गया. आयुष मंत्रालय द्वारा रिसर्च को बढ़ावा देने को लेकर उठाए गए कदम की जानकारी देते हुए आयुष मंत्रालय के सचिव ने कहा कि मंत्रालय आयुष के क्षेत्र में रिसर्च को प्राथमिकता दे रहा है. मंत्रालय दुनिया की प्रमुख संस्थानों के साथ मिलकर आयुर्वेद और हर्बल प्लांट की गुणकारी क्षमताओं को सामने लाने की दिशा में कदम उठा रहा है. कोरोना काल के बाद से गिलोय को लगभग हर घर में पहचान मिली है। ऐसे में अब गिलोय को नई रिसर्च सामने आई है। दरअसल, बायोमेडिकल और लाइफ साइंसेज रिसर्च के लिए वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त डेटाबेस पबमेड के डेटा से पता चलता है कि पिछले एक दशक में गिलोय ( टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया ) के बारे में शोध प्रकाशनों की संख्या में 376.5% की चौंका देने वाली वृद्धि हुई है, जो पौधे की चिकित्सीय क्षमता में बढ़ती वैश्विक रुचि को उजागर करती है। ‘गुडुची या टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया या अमृता ‘ पर अध्ययनों के लिए डेटाबेस की खोज करने पर, परिणाम 2014 में प्रकाशित 243 अध्ययनों को दर्शाते हैं। इसके विपरीत, 2024 में, संख्या बढ़कर 913 हो गई, यानी 376.5% की वृद्धि। हमारी कोशिश आयुर्वेद को मुख्यधारा के स्वास्थ्य सेवा से जोड़ना है ताकि लोगों को अच्छी और सस्ती स्वास्थ्य सेवा मिल सके. देश में आयुर्वेद का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है. आयुर्वेद में गिलोय के कई फायदे बताए गए हैं. जानकारों का कहना है कि गिलोय का सेवन काफी फायदेमंद होता है. गिलोय को लेकर भारत ही नहीं वैश्विक स्तर पर चर्चा हो रही है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध बायोमेडिकल एंड लाइफ साइंस रिसर्च संस्था पबमेड का दावा है कि पिछले एक दशक में गिलोय को लेकर प्रकाशित होने वाले रिसर्च पब्लिकेशन में 376 फीसदी की वृद्धि हुई है. इससे जाहिर होता है कि वैश्विक स्तर पर गिलोय की रोग निवारक क्षमता के प्रति लोगों की रुचि बढ़ी है. डेटा के अनुसार गिलोय को लेकर वर्ष 2014 में 243 अध्ययन प्रकाशित हुआ जो वर्ष 2024 में बढ़कर 913 हो गया. आयुष मंत्रालय द्वारा रिसर्च को बढ़ावा देने को लेकर उठाए गए कदम की जानकारी देते हुए आयुष मंत्रालय के सचिव ने कहा कि मंत्रालय आयुष के क्षेत्र में रिसर्च को प्राथमिकता दे रहा है. मंत्रालय दुनिया की प्रमुख संस्थानों के साथ मिलकर आयुर्वेद और हर्बल प्लांट की गुणकारी क्षमताओं को सामने लाने की दिशा में कदम उठा रहा है. हमारी कोशिश आयुर्वेद को मुख्यधारा के स्वास्थ्य सेवा से जोड़ना है ताकि लोगों को अच्छी और सस्ती स्वास्थ्य सेवा मिल सके.  बहुत कम औषधियां ऐसी होती हैं जो वात, पित्त और कफ तीनों को नियंत्रित करती हैं, गिलोय उनमें से एक है. गिलोय में बहुत अधिक मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं साथ ही इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी और कैंसर रोधी गुण होते हैं. इन्हीं गुणों की वजह से यह बुखार, पीलिया, गठिया, डायबिटीज, कब्ज़, एसिडिटी, अपच, मूत्र संबंधी रोगों आदि से आराम दिलाती है. गुडुची एक लोकप्रिय जड़ी बूटी है जिसे गिलोय के नाम से जाना जाता है और आयुष प्रणालियों में इसका उपयोग लंबे समय से चिकित्सा में किया जाता रहा है। वैज्ञानिक लंबे समय से गिलोय के औषधीय गुणों से आकर्षित हैं, कोविड-19 महामारी के बाद के वर्षों में अनुसंधान में बड़ी वृद्धि देखी गई क्योंकि विशेषज्ञों ने प्राकृतिक इम्यूनिटी बूस्टर और समग्र स्वास्थ्य सेवा समाधानों की खोज की। उभरते हुए अध्ययन इसके प्रतिरक्षा-संशोधक, एंटीवायरल और एडाप्टोजेनिक गुणों को पुष्ट करते हैं, जिससे यह वैश्विक शोधकर्ताओं और स्वास्थ्य सेवा चिकित्सकों के बीच गहरी रुचि का विषय बन गया है।आयुष में वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए मंत्रालय के प्रयासों पर प्रकाश डालते हुए आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य ने कहा, “गिलोय जैसे औषधीय पौधों सहित आयुष योग, जड़ी-बूटियों आदि का वैज्ञानिक सत्यापन मंत्रालय की सर्वोच्च प्राथमिकता है। हम वैश्विक स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाने के लिए अनुसंधान सहयोग को मजबूत करने, वैज्ञानिक अध्ययनों को वित्तपोषित करने और आयुर्वेद को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं के साथ साक्ष्य-आधारित एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।” गिलोय पर वैज्ञानिक शोध जोर पकड़ रहा है, और इसके औषधीय गुणों को दर्शाने वाले अध्ययनों में लगातार वृद्धि हो रही है। हालिया शोध में इसके जैवसक्रिय यौगिकों और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले तथा सूजन रोधी गुणों सहित इसके चिकित्सीय लाभों पर प्रकाश डाला गया है। आयुर्वेदिक औषधि के रुप में गिलोय का इस्तेमाल सदियों से किया जा रहा है। आयुर्वेद के अनुसार, गिलोय की पत्तियां, जड़ें और तना तीनो ही सेहत के लिए बहुत लाभकारी हैं।लेकिन बीमारियों के इलाज में सबसे ज्यादा इस्तेमाल गिलोय के तने का किया जाता है। इसमें गिलोइन नामक ग्लूकोसाइड, कॉपर, आयरन, फॉस्फोरस, जिंक,कैल्शियम और मैगनीज भी प्रचुर मात्रा में मिलते गिलोय के औषधीय गुणों को प्रमाणित करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययनों के जारी रहने के साथ, विशेषज्ञों का मानना ​​है कि यह आयुर्वेदिक चमत्कार मुख्यधारा का एकीकृत स्वास्थ्य सेवा समाधान बनने की राह पर है। जैसे-जैसे दुनिया प्राकृतिक, पौधों पर आधारित उपचारों की ओर देख रही है, भारत का सदियों पुराना हर्बल ज्ञान हमारे समय की कुछ सबसे गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों के लिए सुरक्षित, अधिक प्रभावी उपचारों की कुंजी हो सकता है।लेखक ने विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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