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महान कवि सुमित्रानंदन पंत

20/05/25
in उत्तराखंड, देहरादून, साहित्य
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*महान कवि सुमित्रानंदन पंत*
डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भारतीय इतिहास में हिंदी साहित्य का अमूल्य योगदान रहा हैं। आज ही के दिन यानी की 20 मई को हिंदी भाषा के कवि सुमित्रानंदन पन्त का जन्म हुआ था। पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है।भारतीय इतिहास में हिंदी साहित्य का अमूल्य योगदान रहा हैं। भारत भूमि पर ऐसे कई क्रांतिकारी लेखक और कवि हुए हैं। जिन्होंने कलम की ताकत से समाज के तमाम मुद्दों को उठाने और उनमें सुधार करने का कार्य किया। ऐसे की हिंदी भाषा के कवि सुमित्रानंदन पन्त हैं। जिनके बिना हिंदी साहित्य की कल्पना ही बेगानी लगेगी।सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई, 1900 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के कौसानी गांव में हुआ था. इनके जन्म के छह घंटे बाद ही इनकी माता का निधन हो गया. बचपन में उन्हें सब ‘गुसाईं दत्त’ के नाम से जानते थे. माता के निधन के बाद वह अपनी दादी के पास रहते थे. सात साल की उम्र में जब वह चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, तभी उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया था. सन् 1917 में पंत अपने मंझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे. यहां से उन्होंने माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की. उन्हें अपना नाम गुसाईं दत्त पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया. काशी के क्वींस कॉलेज में कुछ दिन शिक्षा लेकर वह इलाहाबाद चले गए और वहां के म्योर कॉलेज में पढ़ने लगे. वह इलाहाबाद में कचहरी के पास एक सरकारी बंगले में रहते थे. सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था।उस समय अल्मोड़ा में कई साहित्यिक व सांस्कृतिक से जुड़े कार्यक्रम होते रहते थे जिसमें पंत अक्सर भाग लेते रहते। स्वामी सत्यदेव जी के प्रयासों से नगर में ‘शुद्ध साहित्य समिति‘ नाम से एक पुस्तकालय चलता था। इस पुस्तकालय से पंत जी को उच्च कोटि के विद्वानों का साहित्य पढ़ने को मिलता था। कौसानी में साहित्य के प्रति पंत जी में जो अनुराग पैदा हुआ वह यहां के साहित्यिक वातावरण में अब अंकुरित होने लगा। कविता का प्रयोग वे सगे सम्बन्धियों को पत्र लिखने में करने लगे। शुरुआती दौर में उन्होंने ‘बागेश्वर के मेले’, ‘वकीलों के धनलोलुप स्वभाव’ व ‘तम्बाकू का धुंआ’ जैसी कुछ छुटपुट कविताएं लिखी। आठवीं कक्षा के दौरान ही उनका परिचय प्रख्यात नाटककार गोविन्द बल्लभ पंत, श्यामाचरण दत्त पंत, इलाचन्द्र जोशी व हेमचन्द्र जोशी से हो गया था। अल्मोड़ा से तब हस्तलिखित पत्रिका ‘सुधाकर‘ व ‘अल्मोड़ा अखबार‘ नामक पत्र निकलता था जिसमें वे कविताएं लिखते रहते। अल्मोड़ा में पंत जी के घर के ठीक उपर स्थित गिरजाघर की घण्टियों की आवाज़ उन्हें अत्यधिक सम्मोहित करती थीं। अक़्सर प्रत्येक रविवार को वे इस पर एक कविता लिखते। ‘गिरजे का घण्टा‘ शीर्षक से उनकी यह कविता सम्भवतः पहली रचना है-
“नभ की उस नीली चुप्पी पर घण्टा है एक टंगा सुन्दर  जो घड़ी घड़ी मन के भीतर कुछ कहता रहता बज बज कर”
दुबले पतले व सुन्दर काया के कारण पंत जी को स्कूल के नाटकों में अधिकतर स्त्री पात्रों का अभिनय करने को मिलता। 1916 में जब वे जाड़ों की छुट्टियों में कौसानी गये तो उन्होंने ‘हार‘ शीर्षक से 200 पृष्ठों का ‘एक खिलौना’ उपन्यास लिख डाला। जिसमें उनके किशोर मन की कल्पना के नायक नायिकाओं व अन्य पात्रों की मौजूदगी थी। कवि पंत का किशोर कवि जीवन कौसानी व अल्मोड़ा में ही बीता था। इन दोनों जगहों का वर्णन भी उनकी कविताओं में मिलता है।वर्ष 1930 में पंत महात्मा गाँधी के साथ ‘नमक आंदोलन’ में शामिल हुए और देश सेवा के प्रति गंभीर हुए. इसी दौरान वह कालाकांकर में कुछ समय के लिए रहे. यहाँ उन्हें ग्राम्य जीवन की संवेदना से रूबरू होने का मौका मिला. किसानों की दशा के प्रति उनकी संवेदना उनकी कविता ‘वे आँखें’ से स्पष्ट झलकती है | “अंधकार की गुहा सरीखी, उन आँखों से डरता है मन, भरा दूर तक उनमें दारुण, दैन्य दुःख का नीरव रोदन”सुमित्रा नंदन पंत ने अपनी रचना के माध्यम से केवल प्रकृति के सौंदर्य का ही गुणगान नहीं किया, वरन् उन्होंने प्रकृति के माध्यम से मानव जीवन के उन्नत भविष्य की भी कामना की है. उनकी कविता की इन पंक्तियों से उनके उसी सौन्दर्यबोध का उद्घाटन होता है | 1918 के आसपास तक वे हिंदी के नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इस दौर की उनकी कविताएं वीणा में संकलित हैं। 1926-27 में उनका प्रसिद्ध काव्य संकलन ‘पल्लव’ प्रकाशित हुआ। कुछ समय पश्चात वे अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गये। इसी दौरान वे मार्क्स व फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आये। 1938 में उन्होंने “रूपाभ” नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे। वे 1955 से 1962 तक आकाशवाणी से जुडे रहे और मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया। उनकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की उनकी रचनाओं में देखी जा सकती है।”वीणा” तथा “पल्लव” में संकलित उनके छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य तथा पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं। “युगांत” की रचनाओं के लेखन तक वे प्रगतिशील विचारधारा से जुडे प्रतीत होते हैं। “युगांत” से “ग्राम्या” तक उनकी काव्ययात्रा प्रगतिवाद के निश्चित व प्रखरस्वरोंकी उदघोषणा करती है। उनकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुख पडाव हैं – प्रथम में वे छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से प्रेरित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी। 1907 से 1918 के काल को स्वयं उन्होंने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् 1922 में उच्छवास और 1928 में पल्लव का प्रकाशन हुआ।सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं – ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि। उनके जीवनकाल में उनकी 28 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। पंत अपने विस्तृत वाङमय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं “पल्लव” में संकलित हैं, जो 1918 से 1924 तक लिखी गई 32 कविताओं का संग्रह है।हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण (1961), ज्ञानपीठ(1968), साहित्य अकादमी, तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत के नाम पर कौशानी में उनके पुराने घर को जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है। इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है।उत्तराखंड में कुमायुं की पहाड़ियों पर बसे कउसानी गांव में, जहाँ उनका बचपन बीता था, वहां का उनका घर आज ‘सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका’ नामक संग्रहालय बन चुका है। इस में उनके कपड़े, चश्मा, कलम आदि व्यक्तिगत वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं। संग्रहालय में उनको मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रशस्तिपत्र, हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा मिला साहित्य वाचस्पति का प्रशस्तिपत्र भी मौजूद है। साथ ही उनकी रचनाएं लोकायतन, आस्था, रूपम आदि कविता संग्रह की पांडुलिपियां भी सुरक्षित रखी हैं। कालाकांकर के कुंवर सुरेश सिंह और हरिवंश राय बच्चन से किये गये उनके पत्र व्यवहार की प्रतिलिपियां भी यहां मौजूद हैं। संग्रहालय में उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष पंत व्याख्यान माला का आयोजन होता है। यहाँ से ‘सुमित्रानंदन पंत व्यक्तित्व और कृतित्व’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है। उनके नाम पर इलाहाबाद शहर में स्थित हाथी पार्क का नाम सुमित्रा नंदन पंत उद्यान कर दिया गया है।उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में सलाहकार के रूप में भी काम किया. पंत की रचनाशीलता गति पकड़ती चली गई. सन् 1918 के आसपास वह हिंदी की नवीन धारा के प्रवर्तक के रूप में पहचाने जाने लगे. 1926-27 में उनका पहला काव्य संकलन ‘पल्लव’ प्रकाशित हुआ. कुछ समय बाद वह अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोड़ा आ गए. इसी दौरान वह कार्ल मार्क्‍स और फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आए. सन् 1938 में उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक मासिक पत्र निकाली. ‘वीणा’ और ‘पल्लव’ में संकलित उनके छोटे गीत उनके अनूठे सौंदर्यबोध की मिसाल हैं. उनके जीवनकाल में उनकी 28 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, नाटक और निबंध शामिल हैं. उनकी सबसे कलात्मक कविताएं ‘पल्लव’ में ही संकलित है, जो 1918 से 1925 तक लिखी गई 32 कविताओं का संग्रह है. हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें वर्ष 1961 में पद्मभूषण, 1968 में ज्ञानपीठ व साहित्य अकादेमी तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे सम्मानों से अलंकृत किया गया. छायावादी कवि श्री सुमित्रानंदन पंत ने अपनी दूधबोली कुमांउनी में केवल एक कविता लिखी ‘बुरूंश’। इस कविता में उन्होंने बुरांश फूल के गुणों का बखान किया है। वह कहते हैं ”अरे बुरांश सारे जंगल में तेरा जैसा कोई नहीं है सुमित्रानंदन पंत सच्चे साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी कवि थे, उनकी यह अलौकिकता है कि वे स्वयं को विस्मृत कर मस्तिष्क में बुने गये ताने.बाने को कागज पर अंकित कर देते थे। युगीन चेतना की जितनी गहरी एवं व्यापक अनुभूति उनमें थीए उतनी अन्यत्र कहीं भी दिखाई नहीं देती। उनका मानना है कि अनुभूति एवं संवेदना साहित्यकार की तीसरी आंख होती है। इसके अभाव में कोई भी व्यक्ति साहित्य.सृजन में प्रवृत्त नहीं हो सकता क्योंकि केवल कल्पना के बल पर की गयी रचना सत्य से दूर होने के कारण पाठक पर उतना प्रभाव नहीं डाल सकती।सुमित्रानंदन पंत भारत की एक अमूल्य थाती है, जब तक सूर्य का प्रकाश और मानव का अस्तित्व रहेगाए उनकी उपस्थिति का अहसास होता रहेगा।पन्त जी की ‘ग्रंथि’ विप्रलंभ शृंगार का एक गीति काव्य है। मनोरम कल्पना, अलंकृत भाषा और अनुभूति की सघनता ने इसमें कवित्व की मोहिनी भर दी है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
“इन्दु पर उस इन्दु मुख पर साथ ही
थे पड़े मेरे नयन जो उदय से
रक्तिम  हुए  थे  पूर्व  को
पूर्व था पर वह द्वितीय अपूर्व था।।”
उनकी एक प्रसिद्ध कविता ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ की छटा दर्शनीय है-
“पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,
पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।
मेखलाकार पर्वत अपार
अपने सहस्त्र दृग-सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार-बार
नीचे जल में निज महाकार,
-जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण सा फैला है विशाल!”
पन्त जी के ‘लोकायतन’ को महाकाव्य की संज्ञा मिली है। 680 पृष्ठों का यह विशालकाय ग्रंथ दो खण्डों में विभक्त है। इसके प्रथम भाग का नाम- बाह्य परिवेश’ और द्वितीय का ‘अन्तश्चैतन्य’ है। यह पन्त जी की काव्य साधना का प्रतिनिधि ग्रंथ है। इसमें पल्लव के सौन्दर्य चित्र, युगवाणी का बौद्धिक विलास और परवर्ती अध्यात्म चेतना एक साथ विकसित हुई है। साहित्यकार किसी भी देश या समाज का निर्माता होता है। वह समाज और देश को वैचारिक पृष्ठभूमि देता है, जिसके आधार पर नया दर्शन विकसित होता है। वह शब्द शिल्पी ही साहित्यकार कहलाने का गौरव प्राप्त करता है, जिसके शब्द मानवजाति के हृदय को स्पंदित करते रहते हैं। यह बात पंत के व्यक्तित्व एवं कृृतित्व पर अक्षरतः सत्य साबित होती है। दो और दो चार होते हैं, यह चिर सत्य है पर साहित्य नहीं है क्योंकि जो मनोवेग तरंगित नहीं करता, परिवर्तन एवं कुछ कर गुजरने की शक्ति नहीं देता, वह साहित्य नहीं हो सकता अतः अभिव्यक्ति जहां आनंद का स्रोत बन जाए, वहीं वह साहित्य बनता है। इस दृष्टि से पंत का सृजन आनन्द के साथ जीवन को एक नयी दिशा देता है।
सुमित्रानंदन पंत की सृजन एवं साहित्य की यात्रा का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं रहा। वे देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं है, बल्कि उनसे भी आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है। उनकी कविताएं मानव-मन, आत्मा की आंतरिक आवाज, जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष, आध्यात्मिक पहलुओं की व्याख्या, नश्वर संसार में मानवता का बोलबाला जैसे अनादि सार्वभौम प्रश्नों से जुड़ी है।
सुमित्रानंदन पंत सच्चे साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी कवि थे, उनकी यह अलौकिकता है कि वे स्वयं को विस्मृत कर मस्तिष्क में बुने गये ताने-बाने को कागज पर अंकित कर देते थे। युगीन चेतना की जितनी गहरी एवं व्यापक अनुभूति उनमें थी, उतनी अन्यत्र कहीं भी दिखाई नहीं देती। उनका मानना है कि अनुभूति एवं संवेदना साहित्यकार की तीसरी आंख होती है। इसके अभाव में कोई भी व्यक्ति साहित्य-सृजन में प्रवृत्त नहीं हो सकता क्योंकि केवल कल्पना के बल पर की गयी रचना सत्य से दूर होने के कारण पाठक पर उतना प्रभाव नहीं डाल सकती।
सुमित्रानंदन पंत भारत की एक अमूल्य थाती है, जब तक सूर्य का प्रकाश और मानव का अस्तित्व रहेगा, उनकी उपस्थिति का अहसास होता रहेगा।.. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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