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देहरादून की हरियाली सिमटी

25/08/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 71.05 फीसद वन भूभाग और इसमें 45.44 फीसद वनावरण। प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र भी 0.375 हेक्टेयर। जैव विविधता के लिए मशहूर उत्तराखंड में हरियाली के लिहाज से यह तस्वीर कुछ सुकून देने वाली है। बावजूद इसके तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। राज्य गठन के बाद से अब तक की अवधि को देखें तो प्रतिवर्ष जिस हिसाब से जंगलों में पौधरोपण हो रहा, उसके अनुरूप वनावरण नहीं बढ़ पाया है। यह चिंता हर किसी को साल रही है।  देहरादून, जो कभी अपनी हरियाली और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जानी जाती थी, आज कंक्रीट के जंगल में तब्दील होती जा रही है। बेतरतीब शहरीकरण और अनियोजित निर्माण ने शहर का संतुलन बिगाड़ दिया है। मानक के अनुसार, यहां कुल विकसित क्षेत्र में 18% हरित क्षेत्र होना चाहिए, लेकिन मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण की मास्टर प्लान रिपोर्ट में सिर्फ 5.98% हरित क्षेत्र ही दर्ज है। यही नहीं, पार्क, खुले मैदान और बाग-बगीचे अब एक से दो प्रतिशत तक सीमित रह गए हैं। देहरादून शहर, जो कभी गन्ने और धान की खेती और आम, लीची के बागानों से महकता था. आज अनियोजित विकास और बेतरतीब निर्माण की मार झेल रहा है। यहां लगातार बढ़ती इमारतों और कंक्रीट के जंगल ने शहर की हरियाली को निगल लिया है।शहरी नियोजन के मानकों के मुताबिक, किसी भी शहर के कुल विकसित क्षेत्र का कम से कम 18 प्रतिशत हिस्सा हरित क्षेत्र होना चाहिए। लेकिन मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण के मास्टर प्लान में यह आंकड़ा केवल 5.98 प्रतिशत तक सीमित रह गया है। वहीं, पार्क, बाग-बगीचे और खुले मैदान महज़ 1 से 2 प्रतिशत तक सिमट गए हैं। बदलते समय में दून घाटी में गन्ना और धान की खेती और आम-लीची के बाग-बगीचों की जगह आवासीय और वाणिज्यिक इमारतों ने ले ली है। पुराने मास्टर प्लान में 40 प्रतिशत भूमि कृषि के लिए सुरक्षित थी, जो अब घटकर केवल 10 प्रतिशत रह गई है।एमडीडीए की प्रस्तावित महायोजना-2041 के अनुसार, 16,774.75 हेक्टेयर विकसित इलाके में से केवल 1,071.25 हेक्टेयर भूमि को हरित क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है। इसमें भी अधिकांश हिस्सा केंद्रीय संस्थानों की परिसंपत्तियों में शामिल है। इस कारण आम लोगों के लिए उपलब्ध हरित क्षेत्र बेहद सीमित रह जाता है। इसके साथ ही नर्सरी, पार्क और बाग-बगीचों का दायरा भी लगातार सिकुड़ रहा है।नए मास्टर प्लान के अनुसार वर्तमान में देहरादून में आवासीय क्षेत्र के लिए 58.43%, मिश्रित उपयोग (आवासीय + वाणिज्यिक) के लिए 9.33%, वाणिज्यिक के लिए 4.28%, औद्योगिक के लिए 1.07%, सार्वजनिक/सेमी-पब्लिक के लिए 9.42%, परिवहन के लिए 11.15%, पर्यटन के लिए 0.34% और ग्रीन एरिया के लिए मात्र 5.98% भूमी का उपयोग किया जा रहा है।देहरादून नगर निगम शहर की इस गंभीर स्थिति को देखते हुए अब हरियाली बढ़ाने पर विशेष ध्यान देने जा रहा है। नगर आयुक्त का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में नगर निगम ने 20 हेक्टेयर से अधिक सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया है। अब इन जमीनों को पार्क और ग्रीन एरिया में बदलने की योजना बनाई गई है। उनका मानना है कि यह कदम शहर की घटती हरियाली को बचाने और पर्यावरण को संतुलित करने में मदद करेगा। देहरादून जिस तेज़ी से अपनी हरियाली खो रहा है, वह अभूतपूर्व है। शहर के फेफड़े कहे जाने वाले पेड़ों को अंधाधुंध काटा जा रहा है, जिससे उन बुनियादी ढाँचे वाली परियोजनाओं के लिए रास्ता बन रहा है जो ज़रूरी नहीं कि उनकी ज़रूरतों के अनुरूप हों। जंगलों की जगह चौड़ी होती सड़कें, ऊँची इमारतें और व्यावसायिक परिसर उभर रहे हैं, और पर्यावरणीय परिणामों की ज़रा भी परवाह नहीं की जा रही। हर कुल्हाड़ी जो चलती है, हर पेड़ जो गिरता है, वह अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षरण की ओर एक और कदम बढ़ाता है। इसके परिणाम विनाशकारी हैं: बढ़ता तापमान, बिगड़ता वायु प्रदूषण, लुप्त होती जैव विविधता, और उन निवासियों में बढ़ती लाचारी की भावना, जिन्हें कभी अपने शहर की प्राकृतिक विरासत पर गर्व था।इस बदलाव का सबसे दुखद पहलू शहरी नियोजन में जनता के परामर्श की घोर उपेक्षा है। देहरादून के हृदय और आत्मा, निवासी, उन संवादों से वंचित हैं जो उनके अपने शहर को आकार देते हैं। निर्णय बंद दरवाजों के पीछे, नौकरशाही की उदासीनता, राजनीतिक गठजोड़ और शक्तिशाली भू-माफिया द्वारा निर्देशित होते हैं, जिनके निहित स्वार्थ पर्यावरणीय चिंताओं पर भारी पड़ते हैं। बार-बार, चिंतित नागरिक अपने शहर के हरित क्षेत्र के विनाश के विरोध में सड़कों पर उतरे हैं। उन्होंने याचिकाएँ लिखी हैं, अपनी आवाज़ उठाई है, जवाबदेही की अपील की है—लेकिन सत्ता में बैठे लोगों द्वारा उन्हें नज़रअंदाज़, खारिज और दरकिनार कर दिया गया है।हालाँकि, नुकसान की भरपाई असंभव नहीं है। आगे बढ़ने के लिए शासन में एक बुनियादी बदलाव की आवश्यकता है—ऐसा बदलाव जो स्थिरता, पारदर्शिता और नागरिक भागीदारी को बेतहाशा विस्तार से ज़्यादा महत्व दे। देहरादून के निवासियों को एक ऐसी योजना व्यवस्था की माँग करनी चाहिए जहाँ पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन कठोर हो, निर्णय लेने की प्रक्रियाएँ जनता की जाँच के लिए खुली हों, और शहर के भविष्य को आकार देने में सामुदायिक आवाज़ें एक अभिन्न भूमिका निभाएँ। नागरिक समाज समूहों और पर्यावरण समर्थकों को शेष हरित क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए अपना निरंतर दबाव बनाए रखना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि देहरादून अनियंत्रित शहरी फैलाव का एक और शिकार न बने।देहरादून अब एक दोराहे पर खड़ा है। एक रास्ता अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक विनाश की ओर ले जाता है, जहाँ अनियंत्रित शहरीकरण शहर की पहचान को ही मिटा देता है। दूसरा रास्ता, हालाँकि कठिन है, आशा की किरण दिखाता है—एक ऐसा भविष्य जहाँ विकास और स्थिरता का संतुलन हो, जहाँ नागरिकों को अपने पर्यावरण की रक्षा करने का अधिकार हो, और जहाँ शासन शोषण के बजाय संरक्षण को प्राथमिकता दे। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है: क्या सत्ता में बैठे लोग सुनेंगे? क्या वे सहभागी शासन की उचित माँग को स्वीकार करेंगे?समय निकलता जा रहा है। अगर नागरिक आज देहरादून के भविष्य को आकार देने में अपनी भूमिका नहीं निभाते, तो कल को आकार देने के लिए शायद कोई भविष्य ही नहीं बचेगा। कार्रवाई की पुकार और भी ज़ोरदार और मज़बूत होनी चाहिएआखिरी पेड़ गिरने से पहले, ताज़ी हवा की आखिरी साँस छिन जाने से पहले, और देहरादून बेतहाशा शहरीकरण की एक और चेतावनी भरी कहानी बनकर रह जाने से पहले। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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