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होली  सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत है

23/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
कुमाऊं में होली गीतों के रचनाकारों में पं. लोकरत्न गुमानी का नाम भी आता है। उनकी एक रचना राग श्यामकल्याण में मुरली नागिन सों वंशी, नागिन सों कह विधि फाग रचायो, मोहन मन लीनो. है। आम तौर पर होली गायन काफी राग में होता है, लेकिन कुमाऊं में धमार, पीलू, खमाज, बहार, जंगलाकाफी, देश, बिहाग, भैरवी, परज, बागेश्वरी, सहाना में भी होली गायन की परंपरा है। बैठकी होली का गायन शास्त्रीय होते हुए भी लोक का ढब है जो इसे अलग शैली का रंग देता है।दरअसल, कुमाऊं में होली गायन की परंपरा 165 वर्ष पूर्व अल्मोड़ा से शुरू हुई थी। अल्मोड़ा में पौष मास से फागुन तक तीन माह में पांच अलग-अलग चरणों में बैठकी और खड़ी होली का गायन होता है। पहला चरण आध्यात्मिक होली का है, जो पौष मास के प्रथम रविवार से बसंत पंचमी तक चलने वाली इस होली में निर्वाण पद गाए जाते हैं। दूसरा चरण बसंत पंचमी से महाशिवरात्रि के एक दिन पूर्व तक का है। इसमें प्रकृति आधारित गीत गाए जाते हैं। इसे श्रृंगारिक होली कहते हैं। तीसरा चरण महाशिवरात्रि से होलिका दहन तक चलता है। इसमें रंग भरे राग में हंसी-ठिठोली के गीत गाए जाते हैं। इसके साथ ही खड़ी होली के रंग भी बरसने लगते हैं। आखिरी राग है विदाई राजग, ये राग छलड़ी में होली का समापन पर गाया जाता है। वहीं, यहां तीन विधाओं में होली गायन होती है। जिसमें पहली बैठकी दूसरी खड़ी और तीसरी महिलाओं की होली है। इनमें सभी रागों की होली शामिल होती है। बैठकी होली में शास्त्रीय संगीत पर आधारित रागों का गायन होता है। तीसरी होली महिलाओं पर आधारित है। इस दौरान महिलाएं हंसी-मजाक के रंगों के साथ नृत्य में सराबोर रहती हैं।वरिष्ठ रंगकर्मी बताते हैं कि अल्मोड़ा में वर्ष 1860 में बैठकी होली की शुरुआत उस्ताद अमानत हुसैन नामक एक कलाकार ने की थी। सभी समुदाय के लोग बढ़ चढ़कर होली गायन में भागीदारी करते थे। अल्मोड़ा में श्री भंडार हुक्का क्लब, त्रिपुरा सुंदरी और रानीधारा में होली गायन की शुरुआत हुई थी।तीन महीने चलने वाले होलियों के रंग के अलावा और भी कई राग कुमाउनी होली में हैं। पीलू, भैरवी, श्याम कल्याण, काफी, परज, जंगला काफी, खमाज, जोगिया, देश विहाग व जै-जैवंती आदि शास्त्रीय रागों पर विविध वाद्य यंत्रों के साथ यहां होली गायी जाती है।वरिष्ठ रंगकर्मी ने बताया कि अल्मोड़ा की होली पूरे कुमाऊं में अलग स्थान रखती है। हालांकि इस तरह की होली अन्य अंचलों में भी होती है, लेकिन यहां अलग-अलग मास और रागों पर गाई जाने वाली होली का विशेष महत्व है। कहना है कि अल्मोड़ा की होली में बनारस और मथुरा की होली के राग रंग झलकते हैं।उत्तराखण्ड में कुमाऊँनी होली प्रसिद्ध है। इसकी शुरुआत बसंत पंचमी से होती है, लेकिन असली होली उस दिन से होती है जब सबसे पहले भगवान को रंग लगाया जाता है। मंदिर से शुरू होकर होली घर-घर पहुंचती है। बैठ और खड़ी होली इसके मुख्य रूप हैं। कुमाऊँ क्षेत्र में मनाई जाने वाली कुमाऊँनी होली खास और अनोखी होती है। जहां शहरों में होली अक्सर एक या दो दिन का त्योहार होती है, वहीं पहाड़ों में यह कई दिनों तक चलने वाला सांस्कृतिक उत्सव बन जाती है। यहां होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी मेल-मिलाप, संगीत और परंपराओं का संगम है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कुमाऊँनी होली की शुरुआत बसंत पंचमी से हो जाती है। होली के गीत गाने शुरू हो जाते हैं। सबसे पहले भगवान की होली गाई जाती है, फिर धीरे-धीरे यह होली एक-एक करके लोगों के घरों तक पहुंचती है। कुमाऊँ में होली मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है बैठ होली और खड़ी होली। बैठ होली में लोग बैठकर शास्त्रीय संगीत की धुनों पर होली गाते हैं। इसमें हारमोनियम और तबले का इस्तेमाल होता है। वहीं खड़ी होली में लोग खड़े होकर, ढोलक और मंजीरे के साथ नाचते-गाते हुए घर-घर जाते है, जो लोग होली गाते हैं, उन्हें होल्यार कहा जाता है। वे हर शाम अलग-अलग घरों में जाकर होली गाते हैं। घरों में उनका स्वागत गुड़ और सौंफ से किया जाता है, जो मिठास और प्रेम का प्रतीक है। पहाड़ों का माहौल इस दौरान बहुत शांत, सौम्य और प्रेम से भरा रहता है। रिपोर्ट के मुताबिक एक पहाड़ी महिला बताया कि उन्हें होली का बहुत इंतजार रहता है। उनके हम लोग इधर-उधर जाकर होलियां गाते हैं। केवल होली ही नहीं, बल्कि झोड़े भी गाते हैं। झोड़ा भी कुमाऊँ का प्रसिद्ध लोकगीत और नृत्य है, जो होली के समय खास उत्साह के साथ गाया जाता है। महिलाएं रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर पूरे उत्साह से इस पर्व में भाग लेती हैं। कुमाऊँनी होली केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह पहाड़ी सर्दियों के अंत और नई फसल के मौसम की शुरुआत का भी संकेत देती है। लंबे ठंड के बाद जब बसंत आता है, तो होली के गीतों के साथ प्रकृति भी मुस्कुराने लगती है। इस तरह कुमाऊँनी होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि पहाड़ों की संस्कृति, संगीत और आपसी प्रेम का जीवंत उत्सव है।वक्त बदला और सामाजिक स्थितियां भी बदलीं, लेकिन नैनीताल में होली का उल्लास आज भी धर्म और मजहब की दीवारों को तोड़कर सबको एक सूत्र में पिरोता है। आजादी की लड़ाई से लेकर आज के दौर तक, यहां की रामलीला और रंगों का पर्व होली आपसी भाईचारे का जीवंत प्रतीक बना हुआ है कुमाऊंनी होली की समृद्ध और शालीन परंपरा को सहेजने का काम कर रही है।उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि संगीत, भक्ति और सामूहिक उल्लास का जीवंत पर्व है. पहाड़ की महिला बैठकी होली अपनी विशिष्ट परंपरा और सांस्कृतिक गरिमा के कारण विशेष पहचान रखती है. फाल्गुन मास लगते ही पहाड़ के गांवों और शहरों में होली की मधुर आहट सुनाई देने लगती है. ढोलक और मंजीरे की संगत में जब राधा-कृष्ण के प्रेम और भक्ति से सराबोर होलियां गूंजती हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय और आनंदमय हो उठता है.कुमाऊं की होली की शुरुआत “रंग पड़नी एकादशी” से मानी जाती है. इसी दिन से विधिवत होली के रंग चढ़ने लगते हैं, लेकिन महिला बैठकी होली का क्रम लगभग पंद्रह दिन पहले ही आरंभ हो जाता है. महिलाएं पारंपरिक कुमाऊंनी वेशभूषा, खासकर एक जैसी होली की साड़ियां पहनकर एक स्थान पर एकत्र होती हैं. गोल घेरा बनाकर बैठने की यह परंपरा बैठकी होली को उसका नाम देती है. जिसके बाद शुरू होता है होली गायन, महिलाएं अपनी मधुर आवाज से कुमाऊंनी होलियों में श्रृंगार और भक्ति रस को भर देती हैं. और होली के नए-पुराने पारंपरिक गीतों पर नृत्य करती हैं. ठकी होली केवल सुरों का उत्सव नहीं, बल्कि स्वाद का भी पर्व है. होली गायन के दौरान पारंपरिक व्यंजनों की सुगंध माहौल को और खास बना देती है. गुजिया, कचौड़ी, आलू के गुटके और भांग की चटनी प्रमुख रूप से परोसे जाते हैं. स्थानीय निवासी बिन्नी जोशी बताती हैं कि पुराने समय में होली आयोजनों के दौरान गुड़ तोड़कर बांटा जाता था और महिलाओं को गुड़ व चाय परोसी जाती थी. लेकिन अब समय के साथ पकवानों में विविधता आई है, लेकिन होली गायन की परम्परा आज भी वही है. महिला बैठकी होली की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें शास्त्रीय संगीत की झलक मिलती है. कुमाऊंनी होलियां राग आधारित होती हैं, जिन्हें विशेष लय और ताल में गाया जाता है.होली के गीतों में राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंगों के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों का भी समावेश होता है. महिलाएं गीतों के बीच-बीच में नृत्य भी करती हैं, जिससे उत्सव का रंग और गहरा हो जाता है. वहीं रात के समय पुरुषों की होली गायन की परंपरा भी निभाई जाती है, लेकिन दिन के समय महिला बैठकी होली का अलग ही आकर्षण रहता है. यह आयोजन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कृति को सहेजने का माध्यम है. युवा भी इस होली में बढ़ चढ़कर भाग लेती हैं. होली के गीतों का सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव: होली के गीतों में अक्सर सशक्त सामाजिक-राजनीतिक संदेश समाहित होते हैं। यह देश के इस हिस्से में होली का एक प्रमुख पहलू है। गौरी दत्त पांडे (गौड़दा), गिरीश तिवारी (गिरदा) और चारू चंद्र पांडे जैसे कवियों ने होली के प्रसिद्ध गीत रचे हैं जिनका इस क्षेत्र पर गहरा सामाजिक प्रभाव पड़ा है। इन गीतों ने स्वतंत्रता आंदोलन, वन सत्याग्रह और शराबखोरी के खिलाफ आंदोलन जैसे अन्य सामाजिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।• परंपरागत रूप से, होली का उत्सव विभिन्न समुदायों के मिलन, एकता और भाईचारे का प्रतीक रहा है। आज भी, कुमाऊं के पहाड़ी क्षेत्रों के गांवों में सामूहिक रूप से होली मनाई जाती है और होली मनाने वाले न केवल अपने गांवों में बल्कि पड़ोसी गांवों में भी घरों में जाते हैं। आशीर्वाद देने की अनूठी परंपरा: जब होली के गीत गाने के लिए होलीआर इस क्षेत्र के घरों में जाते हैं, तो मुख्य होलीआर परिवार के प्रत्येक सदस्य को आशीर्वाद देते हैं। ये आशीर्वाद “जीवेत शरदः शतम्” के सिद्धांत का प्रतीक हैं, जो प्रकृति के साथ एकात्मता और सभी के कल्याण को बढ़ावा देने की भारतीय भावना को दर्शाते हैं। परिवार के मुखियाओं और अन्य सदस्यों, चाहे वे युवा हों या वृद्ध, को सुख, अच्छे स्वास्थ्य, ईश्वर की कृपा और खुशहाली का आशीर्वाद दिया जाता है। होलीआर यह भी कामना करते हैं कि वसंत ऋतु की उमंग और उत्साह इन घरों में पूरे वर्ष बना रहे।होली केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह पहाड़ी सर्दियों के अंत और नई फसल के मौसम की शुरुआत का भी संकेत देती है. लंबे ठंड के बाद जब बसंत आता है, तो होली के गीतों के साथ प्रकृति भी मुस्कुराने लगती है. इस तरह कुमाऊँनी होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि पहाड़ों की संस्कृति, संगीत और आपसी प्रेम का जीवंत उत्सव है, जो हर साल लोगों के दिलों को जोड़ने का काम करता है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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