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राम तेरी गंगा हो गयी बहुत ही मैली

29/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
राम तेरी गंगा मैली हो गईदशकों पुराना यह फिल्मी गीत आज सिर्फ एक सिनेमाई पंक्ति नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक लापरवाही, प्रशासनिक नाकामी और पर्यावरण के प्रति संवेदनहीनता का सबसे कड़वा सच बन चुका है। वैज्ञानिक आंकड़े और मीडिया रिपोर्ट्स यह साफ इशारा कर रहे हैं कि गंगा के मैदानों से लेकर हिमालय की ऊंची चोटियों तक संकट के काले बादल मंडरा रहे हैं। ये ताजा आंकड़े पर्यावरणविदों के साथ-साथ आम जनता की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी हैं।गंगा सिर्फ एक पवित्र नदी नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा, संस्कृति, इतिहास और लगभग ५० करोड़ से अधिक आबादी की आजीविका का मुख्य आधार है। लेकिन आज इस जीवनदायिनी का अस्तित्व ही खतरे में है। संकट का दायरा अब केवल शहरों के घाटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह समस्या इसके उद्गम स्थल तक पहुंच चुकी है।उत्तराखंड की शांत और पवित्र पहाड़ियों से उतरकर गंगा जब उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के घने मैदानी इलाकों से गुजरती है तो इसका स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। इन मैदानी क्षेत्रों में रोजाना करोड़ों लीटर बिना साफ किया हुआ सीवेज, प्लास्टिक कचरा और उद्योगों से निकलने वाला जहरीला केमिकल सीधे नदी में बहा दिया जाता है। जिस जल को लोग मोक्षदायिनी मानकर आचमन करते थे, वह आज छूने लायक भी नहीं बचा है।शोध बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग और इंसानी दखल के कारण हिमालय के ग्लेशियर रिकॉर्ड रफ्तार से पिघल रहे हैं। ब्लैक कार्बन और प्लास्टिक के बारीक कण, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है, अब पहाड़ों की बर्फीली चोटियों और गंगोत्री जैसे पवित्र उद्गम स्थलों पर पाए जा रहे हैं। यदि ग्लेशियर इसी गति से पिघलते रहे, तो आने वाले समय में गंगा में पानी का संकट खड़ा हो जाएगा, जो पूरे उत्तर भारत में सूखे और अकाल का कारण बन सकता है। इस प्रदूषण का सीधा असर नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ रहा है। पानी में ऑक्सीजन का स्तर लगातार गिर रहा है, जिससे गंगा की पहचान मानी जाने वाली `गंगा डॉल्फिन’ और अन्य दुर्लभ जलीय जीव तेजी से विलुप्त हो रहे हैं।समय तेजी से हाथ से निकल रहा है। यदि हमने अब भी अपनी इस जीवनदायिनी नदी को बचाने के लिए ठोस और कड़े कदम नहीं उठाए, तो वह दिन दूर नहीं जब गंगा सिर्फ इतिहास के पन्नों, धार्मिक ग्रंथों और पुरानी तस्वीरों में सिमट कर रह जाएगी। गंगा का सूखना या प्रदूषित होना सिर्फ एक नदी का अंत नहीं होगा, बल्कि यह भारत की एक समृद्ध सभ्यता और संस्कृति का अंत होगा।
सुनो तो गंगा ये क्या सुनाए
के मेरे तट पर जो लोग आए
जिन्होंने ऐसे नियम बनाए
के प्राण जाए पर वचन न जाए
गंगा हमारी कहे बात ये रोते रोते

राम तेरी गंगा मैली हो गई
पापियोंके पाप धोते धोते

हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती
ऋषियों के संग रहने वाली पतितों के संग रहती
ना तो होठों पे सच्चाई नही दिल में सफ़ाई
करके गंगा को खराब देते गंगा की दुहाई
करे क्या बिचारी इसे अपने ही लोग डुबोते …

राम तेरी गंगा मैली हो गई
पापियों के पाप धोते धोते

वही है धरती वही है गंगा बदले है गंगावासी
सबके हाथ लहू से रंगे हैं मुख उजले मन काले
दिये वचन भुला के झूठी सौगंध खा के
अपनी आत्मा गिरा के चलें सरको उठा के
अब तो ये पापी गंगा जल से भी शुद्ध न होते …

राम तेरी गंगा मैली हो गई
पापियों के पाप धोते धोते
आस्था के दूसरे संगम स्थल इलाहाबाद में भी गंगा की स्थिति कोई बेहतर नहीं। यहां भी गंगाजल भी ई-कोलाई के अलावा मल से पैदा होने वाले बैक्टीरिया फीकल रोलीफार्म तथा अन्य बैक्टीरिया मिले। यानी यहां भी गंगा का पानी नहाने और पीने योग्य नहीं।उधर, दूसरी पावन नदी यमुना भी आज बेहाल है। एक अध्ययन के अनुसार प्रसिद्ध धार्मिक नगरी मथुरा में यमुना के पानी में बैक्टीरिया काफी खतरनाक स्तर तक पाये गये। यहां यमुना के प्रदूषण का हाल यह है कि पीने की बात छोडिय़े, यहां यमुना का पानी खेती के लायक भी नहीं। यहां भी पानी में ई-कोलाई के अलावा मल से पैदा होने वाला बैक्टीरिया मिला। अगर जल्द ठोस योजना नहीं बनीं तो गंगा की शुद्धता की स्थिति और गंभीर होगी। बॉ लीवुड के सबसे महान अभिनेता राज कपूर की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में पुनः रिलीज हुई उनकी ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ (1985) को मैंने एक सुस्त रविवार दोपहर को पीवीआर पैलेडियम फीनिक्स मॉल में देखा। शो खचाखच भरा हुआ था और दर्शक मंदाकिनी के प्रवेश और ‘सुन सैबा सुन’ गाने पर तालियां बजा रहे थे।फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960) के निर्माण के दौरान कल्पना की गई, महान अभिनेता राज कपूर ने ‘राम तेरी गंगा मैली’ के अपने सपने को साकार करने के लिए दो दशक तक इंतजार किया। स्वच्छ गंगा की अवधारणा को खूबसूरती से एक ऐसी महिला गंगा की कहानी में पिरोया गया है, जो अपने प्रेमी से मिलने के लिए गंगोत्री से कलकत्ता तक पवित्र नदी गंगा का सफर तय करती है। जिस तरह लोग गंगा नदी को गंदा और प्रदूषित करते हैं, ठीक वैसा ही मानवीय गंगा के साथ भी रास्ते में व्यवहार किया जाता है। राज साहब की दूरदृष्टि और निर्देशन दोनों ही बेमिसाल थे। ‘राम तेरी गंगा मैली’ उनकी आखिरी निर्देशित फिल्म रही, लेकिन यह उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म भी हैफिल्म रिलीज होते ही विवादों में घिर गई, खासकर मुख्य अभिनेत्री मंदाकिनी के अर्धनग्न दृश्यों के कारण। एक दृश्य में वह पारदर्शी सफेद साड़ी पहनकर झरने के नीचे नहा रही थीं और उनके स्तन साफ ​​दिखाई दे रहे थे, जबकि अन्य दो दृश्यों में वह अपने बच्चे को स्तनपान करा रही थीं। फिल्म को ‘यू’ सर्टिफिकेट मिला था, इसलिए दर्शक इन अप्रत्याशित और बोल्ड दृश्यों को देखकर दंग रह गए और देखते ही देखते यह खबर फैल गई। कुछ आलोचकों ने फिल्म को शोषणकारी बताया, जबकि कुछ सिनेमाघरों ने बच्चों को सिनेमाघरों में प्रवेश देने से इनकार कर दिया, हालांकि यह सार्वभौमिक दर्शकों के लिए बनी थी। राज कपूर ने अपना बचाव करते हुए कहा कि फिल्म का उद्देश्य उस लड़की की पवित्रता और गरिमा को उजागर करना था जो ‘पापी’ दुनिया द्वारा शोषण किए जाने के बावजूद अपनी मासूमियत और अच्छाई नहीं खोती।मुख्य कलाकारों में, राजीव कपूर ने अपनी औसत दर्जे की फिल्म ‘एक जान हैं हम’ (1983) के बाद दिव्या राणा के साथ फिर से काम किया। मंदाकिनी, ज़ाहिर तौर पर गंगा की भूमिका में थीं और डिंपल कपाड़िया और पद्मिनी कोल्हापुरे के साथ बात न बनने के बाद उन्हें यह बहुचर्चित भूमिका मिली। ‘राम तेरी गंगा मैली’ मंदाकिनी के करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म थी, जिसमें वह पहले से कहीं अधिक सुंदर और निर्मल दिखीं… ज़्यादातर दृश्यों में वह मोहक रूप से पवित्र नज़र आती हैं।रवींद्र जैन का संगीत फिल्म के मिजाज के अनुरूप था और टाइटल ट्रैक के साथ-साथ ‘सुन साहिबा सुन’ भी तुरंत चार्टबस्टर बन गया।राम तेरी गंगा मैली ने 80 के दशक के एक्शन फिल्मों के चलन को चुनौती दी और उस दौर की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म बनकर उभरी। यह फिल्म मुंबई के मिनर्वा और प्लाजा सिनेमा में एक साल से भी ज़्यादा चली। बचपन में, ज़ाहिर सी बात है, फिल्म मेरे लिए उपलब्ध नहीं थी और मैंने इसे बहुत बाद में वीएचएस पर देखा। फिल्म में कुछ अश्लील दृश्य होने के बावजूद, मुझे यह फिल्म बेहद मनोरंजक तरीके से “स्वच्छ गंगा, स्वच्छ मन” का आज भी प्रासंगिक संदेश देने में कारगर लगी। यही तो राज कपूर साहब की महानता थी! लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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