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स्वतंत्रता की लड़ाई को कभी दी थी ताकत

15/08/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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*स्वतंत्रता की लड़ाई कभी की लड़ाई को दी थी ताकत* 
डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आजादी के बाद पिछले 78 सालों में बहुत कुछ बदला है. यहां तक कि स्वतंत्रता की लड़ाई को ताकत देने वाला गांधी जी का चरखा भी अब बिसरे दिनों की बात हो गया है. कभी घर-घर में जिस चरखे की घरघराहट सुनाई देती थी, उसका प्रचलन मौजूदा समय में करीब-करीब खत्म सा हो गया है. दुनिया भर के देशों में अर्थव्यवस्था की लड़ाई इन दिनों अपने चरम पर है. शायद यही कारण है कि भारत भी मेक इन इंडिया को प्रमोट कर अर्थव्यवस्था को ताकत देने की कोशिश कर रहा है. हालांकि, समय-समय पर स्वदेशी उत्पाद अपनाकर देश को मजबूत करने की बात कही जाती रही है, लेकिन स्वदेशी उत्पाद से जुड़ने की ये सोच आजादी से पहले की है. जिसका प्रतीक गांधी जी का वो चरखा रहा है मौजूदा दौर में अब आजादी का यह प्रतीक उपयोग से बाहर होता जा रहा है. कपड़ा कातने का साधन यह चरखा खादी वस्त्रों के लिए उपयोग में लाया जाता था, लेकिन समय के साथ कपड़ों के लिए धागे बनाने का काम बड़ी-बड़ी मशीनों से होने लगा और इसके साथ ही चरखा उपयोग से बाहर होता चला गया. हालांकि, अब भी खादी उत्पाद के लिए कुछ जगह पर चरखों का उपयोग हो रहा है. तमाम महिला समूह चरखा चलाकर संस्थाओं में इस चरखे की जीवित रखे हुए हैं. खास बात ये है कि यही चरखा चलाकर महिलाएं अपनी रोजी-रोटी भी कमा रही हैं. स्वतंत्रता संग्राम के दौर में महात्मा गांधी का चरखा आत्मनिर्भरता और स्वदेशी आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीक बना था. गांधी जी ने चरखे को केवल कपड़ा कातने का साधन नहीं, बल्कि अंग्रेजी वस्त्रों के बहिष्कार और आर्थिक स्वतंत्रता का हथियार बनाया. गांव-गांव में चरखे की घरघराहट स्वदेशी भावना की धड़कन थी, जिसने आजादी की लड़ाई को नई ताकत दी. मौजूदा समय में चरखे का उपयोग लगातार घटता जा रहा है. खादी उत्पादन में बड़ी-बड़ी मशीनों ने चरखे की जगह ले ली है. एक समय जहां घर-घर में खादी बुनने की परंपरा थी. वहीं अब यह केवल कुछ सीमित इकाइयों और हथकरघा केंद्रों तक सिमट गई है. मौजूदा समय में चरखे का उपयोग लगातार घटता जा रहा है. खादी उत्पादन में बड़ी-बड़ी मशीनों ने चरखे की जगह ले ली है. एक समय जहां घर-घर में खादी बुनने की परंपरा थी. वहीं अब यह केवल कुछ सीमित इकाइयों और हथकरघा केंद्रों तक सिमट गई है. खादी के कपड़ों की मांग में भी कमी आई है, जिसका असर पारंपरिक बुनकरों की रोजी-रोटी पर भी पड़ा है. इसके बावजूद खादी में वक्त के साथ नए डिजाइन और एक्सपेरिमेंट भी हो रहे हैं. ताकि, हथकरघा बुनकरों को बाजार उपलब्ध हो सके. खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की ओर से प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है. भारत में लंबे समय तक वस्त्र उद्योग हथकरघा और चरखे पर आधारित रहा है. महात्मा गांधी ने साल 1918 के आस पास चरखे को स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बनाया. इतना ही नहीं 1920 के दशक में चरखा कांग्रेस पार्टी के ध्वज में भी शामिल किया गया. हाल ही में प्रधानमंत्री की भी चरखे से सूत कातते तस्वीर सामने आई थी. भारत के लिए चरखा स्वतंत्रता से जुड़ा होने के कारण बेहद अहम है और आजादी के 78 साल में स्वतंत्रता के इस प्रतीक का अस्तित्व खतरे में दिखा है. वहीं, स्वतंत्रता सेनानी ने देश के लिए चरखे का महत्व बताया. उस समय चरखा आत्मनिर्भरता, साधना और सत्याग्रह का प्रतीक भी माना जाता था. उत्तराखंड खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की स्थापना 17 अगस्त 2002 को हुई थी. इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में खादी और ग्रामोद्योग को बढ़ावा देना, कम पूंजी निवेश के साथ छोटे उद्योगों की स्थापना करना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करना और रोजगार के अवसर सृजित करना है. यह खासकर महिलाओं और कमजोर वर्गों के लिए रोजगार के अवसर सृजित करने में भूमिका निभा रहा है. आजादी के दौरान चरखा केवल सूत कातने का साधन नहीं था, बल्कि एक अलख थी जो ब्रिटिश हुकूमत की आर्थिक रूप से कमर तोड़ने का प्रतीक था. उस दौरान गांधी जी के आवाहन पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई थी. कोशिश यही थी कि स्वदेशी अपनाकर न केवल देशवासियों को आत्मनिर्भर बनाया जाए. बल्कि, विदेशी वस्त्रों के व्यवसाय को भी चोट पहुंचाई जाए.” *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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