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अदरक की पहाड़ी मंडी आगराखाल क्षरण की ओर

14/02/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
अदरक वानस्पतिक नाम जिंजिबर ऑफ़िसिनेल एक भूमिगत रूपान्तरित तना है। यह मिट्टी के अन्दर क्षैतिज बढ़ता है। इसमें काफी मात्रा में भोज्य पदार्थ संचित रहता है, जिसके कारण यह फूलकर मोटा हो जाता है। अदरक जिंजीबरेसी कुल का पौधा है। अधिकतर उष्णकटिबंधीय ट्रापिकल्स और शीतोष्ण कटिबंध सबट्रापिकल भागों में पाया जाता है। अदरक दक्षिण एशिया का देशज है, किन्तु अब यह पूर्वी अफ्रीका और कैरेबियन में भी पैदा होता है। अदरक का पौधा चीन, जापान, मसकराइन और प्रशांत महासागर के द्वीपों में भी मिलता है। इसके पौधे में सिमपोडियल राइजोम पाया जाता है।
सूखे हुए अदरक को सौंठ शुष्ठी कहते हैं। भारत में यह बंगाल, बिहार, चेन्नई, मध्य प्रदेश कोचीन, पंजाब और उत्तर प्रदेश में अधिक उत्पन्न होती है। अदरक का कोई बीज नहीं होता, इसके कंद के ही छोटे.छोटे टुकड़े जमीन में गाड़ दिए जाते हैं। यह एक पौधे की जड़ है। यह भारत में एक मसाले के रूप में प्रमुख है। अदरक यह महत्वपूर्ण मसाले की फसल है। फसल अनुसार उसकी बुवाई मई महीने के पहले पन्धरा दिनों में करते हैं। फसल के लिए गरम वातावरण अच्छा होता है। अदरक का इस्तेमाल अधिकतर भोजन बनाने के दौरान किया जाता है। अक्सर सर्दियों में लोगों को खांसी.जुकाम की परेशानी हो जाती है, जिसमें अदरक प्रयोग बेहद ही कारगर माना जाता है। यह अरूची और हृदय रोगों में भी फायदेमंद है। इसके अलावा भी अदरक कई और बीमारियों के लिए भी फ़ायदेमंद मानी गई है।
अदरक एक भारतीय मसाला है जो हर घर में रोजाना इस्तेमाल होता है। इसकी तासीर गर्म होने के कारण इसका अधिकतर सेवन सर्दियों में किया जाता है। इस मौसम में अदरक खाने से खांसी. जुकाम, बलगम जैसी परेशानियों से बचा जा सकता है। अदरक में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेटस, आयरन, कैल्शियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो हमारे शरीर को स्वस्थ रखने का काम करते हैं। अदरक खाने से कई फायदे होते हैं।
देश भर में उत्तराखंड का आगराखाल इलाका अदरक की खेती के लिए मशहूर है। इस बार अदरक की खेती करने वाले इस इलाके के किसान चांदी काट रहे हैं। किसानों को इस बार भारी मुनाफा हुआ है। अदरक की बिक्री से इस इलाके में नया रिकॉर्ड बना है। सिर्फ 2 से 20 अगस्त के बीच 1 करोड़ रुपये का अदरक बिक है। अदरक के दाम में उछाल भी देखने को मिला है। जहां पिछले साल इस महीने में 100 रुपये किलो अदरक बिका था, इस बार ये 120 रुपये किलो बिक रहा है। अगस्त के महीने में हर साल आगराखाल से हर दिन करीब तीन ट्रक अदरक की सप्लाई की जाती है। इस बार अदरक की बंपर बिक्री से किसानों के चेहरे खिल उठे हैं। इस इलाके के करीब 50 गांव अदरक की खेती करते हैं। यहां के किसान अदरक की खेती से अच्छी कमाई करते हैं, जो दूसरे राज्यों के किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं। यहां से सबसे ज्यादा अदरक इलाहबाद, जौनपुर, दिल्ली और देहरादून की मंडियों में जाता है। आगराखाल के अदरक की खासियत ये है कि वह रेसेदार होता है, जो दूसरे जगहों के अदरक से अलग होता है। रेसेदार होने की वजह से इसमें औषधीय गुण भी ज्यादा होता है। साथ ही मसाले के लिए भी ये सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसकी खुशबू और मसाला काफी स्वादिष्ट होता है। यही वजह है कि यहां के अदरक की मांग सबसे ज्यादा होती है। वहीं राज्य सरकार किसानों को सब्सिडी पर बीज उपलब्ध करवाती है, ताकि किसानों को खेती में प्रोत्साहन मिले।
उत्तराखंड में किसानों को अदरक का शोधित बीज मुहैया कराने के मामले में तस्वीर कुछ ऐसी ही है। 2010 से शुरू की गई इस पहल के दरम्यान अब तक केवल दो बार ही राज्य में अदरक बीज की पूरी आपूर्ति हो पाई। उस पर हैरानी की बात ये कि इस बेपरवाही के लिए किसी को जिम्मेदार भी नहीं ठहराया गया। ऐसे में अदरक को आर्थिकी से कैसे जोड़ा जाएगा, स्वतः ही अंदाज लगाया जा सकता है। राज्य में 4822 हेक्टेयर क्षेत्र में अदरक की खेती होती है, जिसमें पर्वतीय जिले मुख्य हैं। उत्तराखंड बनने के बाद प्रदेश में उद्यान विभाग की ओर से अदरक का बीज पूर्वाेत्तर समेत अन्य राज्यों से मंगाकर किसानों को दिया जाता था। उत्पादन बढ़ाने के मद्देनजर 2010 में किसानों को अदरक का शोधित बीज मुहैया कराने की पहल की गई। तब उत्तर प्रदेश फल एवं भेषज सहकारी संघ के माध्यम से अदरक बीज की पांच हजार कुंतल और हल्दी के 2700 कुंतल बीज की आपूर्ति की गई।
राज्य के पर्वतीय जिलों में ही मुख्य रूप से अदरक और हल्दी की खेती होती है। इसकी बुआई का समय फरवरी मध्य से अपै्रल तक होता है। अदरक की री.डिजिनेरियो प्रजाति को राज्य के लिए बेहतर मानते हुए विभाग इसे प्रोत्साहित कर रहा है। इस पर तुर्रा ये कि पर्याप्त आपूर्ति के लिए इसका बीज ही नहीं मिल पा रहा। जिन सपनों को लेकर पहाड़ी राज्य की स्थापना की गई थी, वे सपने आज भी सपने बन कर रह गये है। उद्यान विभाग विगत 20.30 वर्षो से 10 से 15 करोड़ रुपए का अदरक बीज उत्तर पूर्वी राज्यों से दलालों के माध्यम से मंगाता आ रहा है, यह बीज कृषकों को न तो समय पर मिलता है और न ही इस बीज से अच्छी उपज प्राप्त होती है, हिमांचल प्रदेश की तरह राज्य में कभी भी अदरक बीज उत्पादन के प्रयास नहीं किए गए।
राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में नगदी फसल के रूप में अदरक का उत्पादन कई दशकों से किया जा रहा है। विभागीय आकडों के अनुसार 4876 हैक्टियर में अदरक की कास्त की जाती है जिससे 47120 मैट्रिक टन का उत्पादन होता है। चंपावत। जिले में पलायन के कारण खाली हो रहे गांवों से पलायन रोकने के लिए सहकारिता विभाग की ओर से नई पहल शुरू की गई है। विभाग की ओर से अदरक की खेती के माध्यम से गांवों से पलायन रोकने की कार्ययोजना तैयार की गई है। इसके तहत सहकारिता विभाग की विभिन्न साधन सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों को अदरक का बीज उपलब्ध कराने के साथ ही किसानों की उत्पादित अदरक की खरीद की जा रही है। विभाग की कार्ययोजना के सार्थक परिणाम भी नजर आने लगे हैं। नेपाल सीमा से लगे खर्राटाक गांव में 60 किसानों ने वापस आकर अदरक की खेती करने में सफलता हासिल की है। वर्षों पूर्व पलायन के चलते यह गांव खाली हो चुका था आगराखाल की यह परम्परागत मंडी पहली नजर में खुश कर देती है किन्तु अगले ही पल निराश भी। निराशा का कारण यह है की 90.80 के दशक में मंडिया अदरक से भरी रहती थी किन्तु अब पहले की मुताबिक 50 प्रतिशत भी नहीं रह गया। यह कमी इस सीजन में साफ़ देखने को मिलती है। उत्तराखंड का यह आगराबाजार एक नमूना भर है उत्तराखंड की कई मंडिया है जो खाली पड़ गयी है, क्योकि उत्तराखंड के किसान अब अपना रुझान कृषि से हटा चुके है जिसके कारण सब खेत खलियान सुने पड़े है और अगर इसी प्रकार सब खेती को नकारते रहेंगे तो उत्तराखंड में कृषि का प्रतिशत 0 हो जायेगा। मौजूदा समय में कृषि और इन मंडियों के सरक्षण की विशेष आवश्कता है। बाहर का खाना और फास्टफूड आजकल की जीवनशैली में शामिल हो चुके हैं, जो हमारे शरीर की पाचन क्रिया पर बुरा प्रभाव डालते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कम मात्रा में ही सौंफ, अदरक, दही और पपीता आदि खाने से पाचन तंत्र को स्वस्थ रखा जा सकता है।
आगराखाल सिकुड़ते हुए पर्वतीय मंडी और बाजार का एक नमूना भर हैण् उत्तराखंड के सभी पर्वतीय जिलों में इस प्रकार के छोटे छोटे कस्बे स्थानीय फल और सब्जी के उत्पाद को सहारा देने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं जहां से अतीत में बहुत बड़ी मात्रा में स्थानीय फल और सब्जी का उत्पाद बाजार में आता थाण् इस प्रकार यह छोटी पर्वतीय मंडियां 20 किलोमीटर के दायरे में स्वरोजगार और अर्थव्यवस्था का आधार बनती थीं जिस कारण पूरे इलाके में आर्थिक गतिविधियां बनी रहती थी। पर्वतीय समाज और संस्कृति को जिंदा रखने में इन मंडियों का बहुत बड़ा योगदान थाण् कमोबेश यह परंपरागत मंडियां हर पर्वतीय जनपद में मौजूद हैं जो अब सिकुड़ रही हैंए इसी कारण मौजूदा समय में इन मंडियों को सरकार के संरक्षण की आवश्यकता हैण्अतीत में इन मंडियों ने पूरे क्षेत्र की खुशहाली की कहानी लिखी है लेकिन आज पलायन के संकट ने और नई पीढ़ी की अरूचि तथा सब्जी और बागवानी में अधिक मेहनत और कम मुनाफा होने के कारण इन मंडियों का अस्तित्व संकट में हैण्यह पर्वतीय मंडियां बहुत थोड़े सरकारी संरक्षण से पुनर्जीवित हो सकती हैंण् उत्तराखंड के 95 ब्लॉक से लगभग 76 ब्लॉक पर्वतीय क्षेत्र में पड़ते हैं प्रत्येक ब्लॉक में सहायक कृषि रक्षा अधिकारी की तैनाती है और उनके साथ 2 सहायक भी हैं वर्तमान में जिनका उपयोग परंपरागत कृषि के संरक्षण में नहीं के बराबर हैण् अगर प्रत्येक ब्लॉक में फल एवं सब्जी अनुसंधान परिषद की स्थापना हो और सहायक कृषि अधिकारी को सब्जी और फल पट्टियों से खुद को जोड़ कर एक निश्चित खसरे में किसानो की मदद से सब्जी उत्पादन का दायित्व दिया जाए, जहां वह आधुनिक बीज, खाद और परामर्श उपलब्ध कराएं तो पर्वतीय मंडियों की तस्वीर आज भीआसानी से बदल सकती है जो काफी हद तक रोजगार एवं पलायन की समस्या का भी समाधान प्रस्तुत करती हैं। उत्तराखंड की प्रमुख पर्वतीय मंडियां जो फल और सब्जी पट्टी के रुप में प्रसिद्ध हैं कमोबेश हर पर्वतीय जनपद में हैं। जैसे हेलंग से तपोवन तक का जोशीमठ का क्षेत्र, खेती दीवाली खाल चमोली, दुदौली, दूनागिरी, द्वाराहाट भिक्यासैण, भतरोजखान, जेनौली, पिल्खोली, जनपद अल्मोड़ा कोटाबाग, रामगढ़, नथुआ खान, मुक्तेश्वरक्षेत्र नैनीताल जनपद, नौगांव, पुरोला, बड़कोट, पूरी यमुना घाटी, जनपद उत्तरकाशी, नैनबाग, पंतवाड़ी, जौनपुर क्षेत्र, टिहरी, खेती खान, सूखीढांग, जनपद चंपावत चांडाक, बेरीनाग, पिथौरागढ़, कांडा, नाकुरी, बागेश्वर आदि आदि वह परम्परागत पर्वतीय मंडियां हैं, जो बहुत थोड़ी योजनाबद्ध मेहनत से फिर खुशहाल हो सकती हैं और दरकते पर्वतीय समाज को आधार भी दे सकती हैंण् पर्वतीय फल एवं सब्जी के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए हार्क के डॉक्टर महेंद्र कुंवरए पुरोला के युद्धवीर सिंह और नैनीताल.धानाचूली.मुक्तेश्वर क्षेत्र के किसान जो कि पोली हाउस फार्मिंग से सफलता का नया इतिहास लिख रहे हैं, के अनुभव का लाभ उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की फल एवं सब्जी पट्टियों के विकास एंव विस्तार के लिए लिया जा सकता है।

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