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लकड़ियों में जीवंत आकृति उकेर रहे हैं जसपाल

29/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पहाड़ की शांत वादियों में आज भी कई ऐसे गुमनाम हुनरमंद हैं जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी कला को जीवित रखे हुए हैं। आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों..! बिना पर्याप्त सरकारी सुविधाओं और आधुनिक उपकरणों के ये कलाकार लकड़ी में किसी भी जीवंत आकृति को बनाने का दम रखते हैं।पौड़ी के रहने वाले जसपाल सिंह रमोला अपनी मेहनत और रचनात्मकता के जरिए वेस्ट पड़ी लकड़ियों में नई जान फूंक रहे हैं. कंडोलिया क्षेत्र में दुकान चलाने वाले जसपाल सिंह के लिए ये केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि वो अपना शौक और जुनून भी पूरा करते हैं. दुकान के काम से समय निकालकर, खासकर रविवार या अवकाश के दिनों में, वे बेकार पड़ी लकड़ियों को खूबसूरत और उपयोगी वस्तुओं में बदलने का काम करते हैं.जसपाल सिंह रमोला बताते हैं कि उन्होंने इस कला की शुरुआत साल 1993 में की थी. शुरुआत में उन्होंने वेस्ट लकड़ी से विभिन्न प्रकार की वस्तुएं बनाईं और कुछ समय बाद पौड़ी में एक प्रदर्शनी भी आयोजित की, जिसे लोगों ने काफी सराहा. उनकी पहली रचना मां धारी देवी की एक मूर्ति थी, जिसे उन्होंने श्रद्धा के साथ मंदिर में समर्पित कर दिया. इसके बाद उन्होंने छोटे-छोटे सजावटी और उपयोगी आइटम बनाने शुरू किए. हालांकि रोजगार की तलाश में उन्हें कुछ समय के लिए पौड़ी छोड़कर अन्य स्थानों पर काम करना पड़ा. लेकिन रिवर्स माइग्रेशन के तहत जब वे दोबारा अपने गृह जनपद लौटे, तो उन्होंने फिर से अपने इस शौक को आगे बढ़ाया. आज जसपाल सिंह रमोला वेस्ट पड़ी लकड़ियों से विभिन्न प्रकार के आकर्षक वस्तुएं तैयार कर रहे हैं, जो न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं, बल्कि स्थानीय कला और हुनर को भी नई पहचान दिला रहे हैं. जसपाल सिंह रमोला ने बताया कि उन्होंने इस काम की शुरुआत वर्ष 2020 में कोविड काल के दौरान की थी. उस समय खाली वक्त का सदुपयोग करते हुए उन्होंने जंगलों और आसपास के क्षेत्रों में पड़ी बेकार लकड़ियों को इकट्ठा कर उन्हें नया रूप देना शुरू किया. धीरे-धीरे यह उनका शौक बन गया और अब यह उनके लिए आजीविका का साधन भी बनता जा रहा है. अब तक जसपाल कई तरह की सजावटी और उपयोगी वस्तुएं बना चुके हैं, जिनमें टेबल लैंप, मूर्तियां, गमले और घर की सजावट के विभिन्न आइटम शामिल हैं. खास बात यह है कि ये सभी उत्पाद पूरी तरह हाथ से बनाए जाते हैं, जिससे हर वस्तु अलग और आकर्षक दिखती है. उनके बनाए उत्पादों की स्थानीय स्तर पर बिक्री भी हो रही है. हालांकि, जसपाल का कहना है कि इस काम में काफी समय और मेहनत लगती है, जिसके कारण उत्पादों की लागत बढ़ जाती है. उन्होंने सरकार से मांग की है कि उन्हें एक बेहतर बाजार उपलब्ध कराया जाए, ताकि उनके उत्पादों को व्यापक पहचान मिल सके. साथ ही, यदि उन्हें आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए जाएं, तो वे कम समय में अधिक वस्तुएं तैयार कर सकेंगे, जिससे कीमतों में भी कमी लाई जा सकेगी. कहा कि यदि पहाड़ के युवा इस कला को सीखें, तो वे भी बेकार पड़ी लकड़ियों से उपयोगी वस्तुएं बनाकर स्वरोजगार शुरू कर सकते हैं. इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन पर भी रोक लगाई जा सकती है.उत्तराखंड आने वाली पीढ़ियों के लिए रचनात्मकता बना को प्राथमिकता देनी होगी और लाभ पर संरक्षण की विजय सुनिश्चित करनी होगी। । लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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