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सरयू में बहा दिए थे कुली रजिस्टर

10/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
सूर्य के उत्तरायण का यह पर्व केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि जहां-जहां भारतीय जीवन दृष्टि मिलती है, उन सब देशों में है। बांग्लादेश में पौष संक्रांति है तो नेपाल में माघी संक्रांति या सूर्योत्तरायण। नेपाल की थारू जाति के लिए यह माघी है। थाईलैंड में सोंगकरन है तो लाओस में पी मा लाउ। म्यांमार में इसे थिरआन के नाम से मनाते हैं तो कंबोडिया में मोहा संगक्रांत। श्रीलंका में भी यह पोंगल और उझवल तिरुनल के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व देवताओं का नवविहान है तो वैदिक भारत का नववर्ष भी।उत्तरायणी सांस्कृतिक उत्सव ही नहीं, लोक चेतना और संकल्पों को मजबूत करने वाला त्योहार है। उत्तरायणी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय जन चेतना की अलख जगाई थी। संस्कृति कर्मी व लेखक चारु तिवारी के मुताबिक 1916 में जब कुमाऊं परिषद बनी तो आजादी के आंदोलन में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। बड़ी संख्या में लोग कुमाऊं परिषद से जुडऩे लगे। अंग्रेजी शासन में कुली बेगार की प्रथा बहुत कष्टकारी थी। अंग्रेज जहां से गुजरते किसी भी पहाड़ी को अपना कुली बना लेते। उसके एवज में उसे पगार भी नहीं दी जाती। अंग्रेजों ने इसेे स्थानीय जनता के मानसिक और शारीरिक शोषण का हथियार बना लिया था। प्रतिकार की आवाजें उठने लगी थी।कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 14 जनवरी, 1921 को उत्तरायणी मेले में एकत्र जनमानस ने सरयू-गोमती का जल अंजली में लेकर कुली बेगार नहीं देने का संकल्प ले लिया था। कमिश्नर डायबिल बड़ी फौज के साथ वहां पहुंचा था। वह आंदोलनकारियों पर गोली चलाना चाहता था, लेकिन जब उसे अंदाजा हुआ कि अधिकतर थोकदार और मालगुजार आंदोलनकारियों के प्रभाव में हैं तो वह चेतावनी तक नहीं दे पाया। इस प्रकार एक बड़ा आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा हो गया। हजारों लोगों ने कुली रजिस्टर सरयू में बहा दिए। इस आंदोलन के सूत्रधारों में बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत, मोहन मेहता, चिरंजीलाल, विक्टर मोहन जोशी आदि प्रमुख थे। प्राचीन काल से ही बागेश्वर का उत्तरायणी मेला व्यापारिक मंडी के रूप में जाना जाता था. दारमा, व्यास, मुनस्यारी के भोटान्तिक व्यापारियों के साथ ही मैदानी क्षेत्रों के बड़े-बड़े व्यवसायी भी इसी मेले के माध्यम से अपने उत्पादों का क्रय- विक्रय किया करते थे. भोटिया व्यापारी ऊन और ऊन से बने वस्त्रों के अलावा हिमालयी जड़ी बूटियां व औषधियां यहां बेचने के लिये लाते थे और बदले में मैदानी क्षेत्रों से आये नमक,अनाज आदि उत्पाद अपने घरों को ले जाते थे. कुमाउं के लोकगीतों में आज भी इसकी स्मृतियां ताजी हैं. लोकगाथा ‘राजुला मालूशाही’ के अनुसार ‘राजुला’ जब अपने माल देश से बैराठ को रवाना हुई तो बागेश्वर पहुँचते समय वहाँ ‘उत्तरायणी’ का मेला लगा हुआ था.उत्तराखण्ड के प्राचीन सूर्यवंशी ‘कत्यूरी राजाओं’ के समय में भी यह मार्ग तीर्थाटन का विशेष आवागमन का मार्ग बना हुआ था.दुर्भाग्य से कैलास मानसरोवर आज चीन के कब्जे में है. पर हमारे मान्धाता आदि भारत वंशी पूर्वज आर्य राजाओं को ही श्रेय जाता है कि उन्होंने गंगा, यमुना, सिन्धु, सरयू, सरस्वती की खोज करते हुए अपना विशाल साम्राज्य वैदिक काल में कैलास मानसरोवर तक फैलाया था. स्कन्दपुराण के अनुसार कुमाऊं को ‘मानसखण्ड’ इसी लिए कहा जाता है क्योंकि यह क्षेत्र कैलास मानसरोवर की परिक्रमा के अन्तर्गत आता है जिसकी सीमा कुमाऊं स्थित कूर्माचल पर्वत से शुरु होती है. ‘मानसखण्ड’ में ही कैलाश मानसरोवर को जाने और वापस आने वाले मार्ग का भौगोलिक मानचित्र भी दिया गया है.बागेश्वर का उत्तरायणी मेला प्राचीन काल से ही कुमाऊं के गौरवपूर्ण इतिहास का साक्षी भी रहा है.आजादी के आंदोलन में कुली बेगार प्रथा को समाप्त करने के लिए वर्ष 1921 में हुए आंदोलन के साथ इस मेले का राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की दृष्टि से भी विशेष महत्त्व है.आज से104 साल पहले 14 जनवरी, सन् 1921 में ‘उत्तरायणी’ के दिन ही बागेश्वर में महत्वपूर्ण राजनैतिक घटना हुई थी जब कुमाऊं केसरी बद्रीदत पाण्डे के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पोषित कुली बेगार कुप्रथा को समाप्त करने के संकल्प द्वारा प्रतीक स्वरूप एक पोटली व रजिस्टर को सरयू और गोमती के संगम में बहाकर विदेशी शासकों के प्रति संघर्ष का बिगुल बजाया था तथा इसी ऐतिहासिक घटना के साथ उत्तराखण्ड में स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत भी हो गई थी. उत्तरायणी’ न केवल हमारी सांस्कृतिक थाती है, बल्कि हमारे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और समसामयिक सवालों को समझने और उनसे लड़ने की प्रेरणा भी है। जब हम ‘उत्तरायणी’ को मनाते हैं तो हमारे सामने संकल्पों की एक लंबी यात्रा के साथ चलने की प्रेरणा भी होती है। उत्तराखंड के बहुत सारे सवाल राज्य बनने के इन उन्नीस वर्षो बाद भी हमें बेचैन कर रहे हैं। यह बेचैनी अगर इस बार की ‘उत्तरायणी’ तोड़ती है तो हम समझेंगे कि हमारी चेतना यात्रा सही दिशा में जा रही है। आप सब लोगों को ‘उत्तरायणी’ की बहुत सारी शुभकामनायें। इस आशा के साथ कि ‘उत्तरायणी’ का यह पर्व आप सबके लिये नये संकल्पों का हो। ऐसे संकल्प जो मानवता के काम आये। कुल मिलाकर, वर्ष 2026 की मकर संक्रांति धार्मिक, ज्योतिषीय और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होने जा रही है। षटतिला एकादशी, सर्वार्थ सिद्धि योग और सूर्य के उत्तरायण का यह त्रिवेणी संयोग श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक उन्नति और सकारात्मक बदलाव का द्वार खोलने वाला माना जा रहा है। शास्त्रों में कहा गया है कि ‘माघे मासि दिने पुण्ये, मकरस्थे दिवाकरे’ अर्थात मकर संक्रांति के दिन किया गया दान अक्षय फल देता है. मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से तिल, गुड़, खिचड़ी, वस्त्र, अन्न का दान श्रेष्ठ माना गया है. तिल का संबंध शनि से है, अतः यह शनि दोष शांति में सहायक होता है. मकर संक्रांति का पर्व कृषि और ऋतु परिवर्तन से भी जुड़ा हुआ है. देशभर में इस दिन को विभिन्न नामों से मनाया जाता है, उत्तर भारत में मकर संक्रांति, तमिलनाडु में पोंगल, असम में भोगाली बिहू और पंजाब में लोहड़ी (पूर्व संध्या). मकर संक्रांति हमें यह संदेश देती है कि जैसे सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ता है, वैसे ही मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ना चाहिए. यह दिन नव आरंभ, सकारात्मक संकल्प और साधना के लिए श्रेष्ठ है. भारतीय संस्कृति में एक वर्ष को दो भागों में विभक्त किया गया है, जिन्हें हम दक्षिणायन एवं उत्तरायण के रूप में जानते हैं। इन्हें याम्यायन एवं सौम्यायन के नाम से भी जाना जाता है। अर्थात दक्षिणायन को याम्यायन एवं उत्तरायण को सौम्यायन कहते हैं। दक्षिणायन काल के व्यतीत हो जाने के उपरांत उत्तरायण का समय प्रारंभ होता है। उत्तरायण का प्रारंभ मकर संक्रांति से होता है। अर्थात सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है, तभी से उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। संक्रांति शब्द का अर्थ होता है, सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना। बागेश्वर में चल रहे उत्तरायणी मेले में दारामा, जोहार, व्यास, चौंदास, दानपुर से आए जड़ी बूटी के व्यापारियों के सामानों की भोटिया बाजार में जबरदस्त मांग हो रही है। पेट, सिर, घुटने आदि दर्द के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली गंदरेणी, जम्बू, कुटकी, डोला, गोकुलमासी, ख्यकजड़ी आदि जड़ी बूटी को अचूक इलाज माना जाता है।उत्तरायणी मेले में पिथौरागढ़ जिले के धारचूला, दार्चुला, मुनस्यारी, जोहार, दारमा, व्यास और चौंदास आदि क्षेत्रों के व्यापारी हर साल व्यापार के लिए आते हैं। हिमालयी जड़ी-बूटी को लेकर आने वाले इन व्यापारियों का हर किसी को बेसब्री से इंतजार रहता है। हिमालय की जड़ी-बूटियां ऐसी दवाइयां हैं जो रोजमर्रा के उपयोग के साथ ही बीमारियों में दवा का भी काम करती हैं। दारमा के बोन गांव निवासी किशन सिंह बोनाल बताते हैं कि जंबू की तासीर गर्म होती है। इसे दाल में डाला जाता है। गंदरायण भी बेहतरीन दाल मसाला है। यह पेट, पाचन तंत्र के लिए उपयोगी है। कुटकी-बुखार, पीलिया, मधुमेह, न्यूमोनिया में, डोलू-गुम चोट में, मलेठी-खांसी में, अतीस-पेट दर्द में, सालम पंजा-दुर्बलता में लाभदायक होता है। पंडित बद्रीदत्त पांडे ने 1921 में कुली बेगार आंदोलन के लिए लोगों को तैयार किया था। 14 जनवरी 1921 का यह आंदोलन अह‍िंंसक था और उन्हें इसमें सफलता भी हासिल हुई। इस पर लोगों ने उन्हें कुमाऊं केसरी की उपाधि प्रदान की। इससे प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने आंदोलन को रक्तहीन क्रांति का नाम दिया था। 1921 में कुली बेगार आंदोलन में उनकी भूमिका को हमेशा याद किया जाता है। उन्हें कुमाऊं केसरी की उपाधि से भी नवाजा गया। बद्रीदत्त पांडे आजादी के आंदोलन में 1921 में एक साल, 1930 में 18 माह, 1932 में एक साल तथा 1941 में तीन माह जेल में रहे।1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्हें जेल भेजा गया। आजादी के बाद भी अल्मोड़ा में रहकर वह सामाजिक कार्यों में सक्रियता से हिस्सा लेते रहे।बद्रीदत्त पांडे बहुत बेबाक स्वभाव के थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को मिलने वाली पेंशन का लाभ भी नहीं लिया।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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