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एशिया की सबसे कठिन यात्रा नंदा राजजात

20/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हिमालयी महाकुंभ के नाम से विख्यात व विश्व की सबसे लम्बी व पैदल धार्मिक यात्रा का गौरव प्राप्त नंदा देवी राजजात यात्रा 12 वर्ष में बड़ी जात कहा जाता है जो बहुत वृहद रुप में मनाई जाती है जिसमें कि सारे देश विदेश के श्रद्धालु शामिल होते हैं और हर वर्ष इसे छोटी जात में रूप में मनाया जाता है। यह यात्रा अपने आप में दिव्य, अद्‌भुत व रोमांचकारी यात्रा है। इस ऐतिहासिक यात्रा को गढ़वाल-कुमाऊं के सांस्कृतिक मिलन का प्रतीक भी माना जाता है। एशिया की सबसे कठिन माने जाने वाली पवित्र नंदा राजजात यात्रा को लेकर चल रहे विवाद और संशय उत्तराखंड की नंदा राजजात यात्रा प्राचीन सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहर है, जिसे नंदा देवी राजजात यात्रा के नाम से भी जाना जाता है. इसे सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक माना जाता है. यह यात्रा उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है.हिमालय के महाकुंभ के नाम से जानी जाने वाली नंदा राजजात एशिया की सबसे कठिन धार्मिक यात्रा मानी जाती है। मां नंदा देवी के सम्मान में हर 12 साल में एक बार उत्तराखंड में नंदा राजजात यात्रा का आयोजन होता है। हिमालय में 280 किमी की इस पवित्र यात्रा में कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों के श्रद्धालु भाग लेते हैं। इस यात्रा का नेतृत्व चार सिंह वाली भेड़ (चौसिंग्या खाडू) करता है। मान्यता है कि चार सिंह वाली खाड़ू 12 साल में एक ही बार पैदा होती है। बता दें कि इससे पहले नंदा राजजात यात्रा साल 2014 में निकली थी। अब इस साल नंदा राजजात यात्रा निकालने की तैयारी चल रही थी। नंदा देवी राजजात समिति ने सितंबर 2026 में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी की आशंका और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को देखते हुए इस साल यात्रा स्थगित करने का ऐलान किया था। ये ऐलान कल ही किया गया था। इससे हड़कंप मच गया था। इसी को लेकर आज 484 गांवों की महापंचायत बुलाई गई थी। महापंचायत ने यात्रा एक साल के लिए स्थगित करने का कड़ा विरोध जताया। महापंचायत में निर्णय लिया गया कि राजजात इसी साल होगी। महापंचायत के दौरान मां नंदा देवी सिद्धपीठ मंदिर कुरुड़ आयोजन समिति का गठन भी किया गया, जिसमें कर्नल (सेनि) हरेंद्र सिंह रावत को अध्यक्ष चुना गया। निर्णय लिया गया कि आगामी 23 जनवरी को वसंत पंचमी पर बड़ी जात का मुहूर्त निकाला जाएगा और जात भव्य रूप से संचालित की जाएगी। नंदा राजजात यात्रा इस साल के लिए स्थगित करने का कारण समिति ने सितंबर में होने वाली बर्फबारी और श्रद्धालुओं की सुरक्षा बताया था। बताया जा रहा हैकि कुरूड़ और नौटी से नंदा राजजात व नंदाजात के शुभारंभ को लेकर हाल में उत्पन्न मतभेदों के चलते आयोजन को टालने का फैसला लिया गया था। हालांकि समिति पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह फैसला यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा को प्राथमिकता में रखते हुए ही लिया गया है। इधर आज महापंचायत ने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इसी साल ही नंदा राजजात यात्रा निकालने का निर्णय लिया। यात्रा देवी नंदा को उनके मायके से विदाई देने का उत्सव है जिसे हिमालय का महाकुंभ भी कहा जाता है। चमोली के नौटी गांव से शुरू होने वाली 19 से 22 दिन तक चलने वाली ये यात्रा हिमालय के होमकुंड (रूपकुंड के पास) में समाप्त होती है। ये यात्रा करीब 19 दिन में 280 किमी पैदल चलती है। यात्रा के रास्ते बेहद दुरूह होते हैं। चौसिंघिया खाड़ू का अंतिम पड़ाव हिमालय का होमकुंड होता है। यहीं से यात्रा का समापन हो जाता है। उसके बाद चौसिंघिया को पूजा अर्चना की सामग्री के साथ हिमालय में कैलाश पर्वत की ओर विदा कर दिया जाता है। उसी के साथ ही चौसिंघिया मां नंदादेवी के संदेशवाहक के रूप में रहस्मय तरीके से गायब हो जाता है। देवभूमि उत्तराखंड में ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व को समेटे हुए नंदा राजजात यात्रा का वही स्थान है, जो देश के अन्य हिस्सों में कुंभ या अमरनाथ यात्रा का माना जाता है. यह केवल मां नंदा की विदाई की परंपरा नहीं, बल्कि हिमालयी समाज की सामूहिक लोक आस्था के साथ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है. अमूमन पर 12 साल के अंतराल पर होने वाली यह यात्रा अब एक बार फिर चर्चाओं में है. वजह है इसके आयोजन की तिथि में अचानक बदलाव की घोषणा.दरअसल, नंदा देवी राजजात यात्रा को 2026 की बजाय अब अगले साल यानी 2027 में आयोजित कराने की बात कही जा रही है. ऐसे में अगर नंदा राजजात यात्रा को 2026 की बजाय 2027 में आयोजित किया जाता है तो यह फैसला सरकार और प्रशासन के लिए दबाव एवं चुनौतियां खड़ी कर सकता है. हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं है, जब नंदा राजजात यात्रा के साल या तारीख में बदलाव हुए हों, इससे पहले भी इसी तरह के बदलाव यात्रा को लेकर समय-समय पर होते रहे हैं. उत्तराखंड के गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक मां नंदा देवी को कुल देवी के रूप में पूजा जाता है. हर 12 साल में नंदा राजजात यात्रा निकाली जाती है. जिसे उत्तराखंड की सबसे लंबी, कठिन और भावनात्मक यात्राओं में गिना जाता है. मान्यता है कि यह यात्रा देवी नंदा और सुनंदा को उनके मायके से ससुराल यानी हिमालय की ऊंची चोटियों की ओर विदा करने का प्रतीक है. यह यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि, गांव-गांव को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी है. लोक मान्यताओं और ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, नंदा राजजात की परंपरा कत्यूरी राजाओं के समय से चली आ रही है. समय के साथ यह परंपरा राजसत्ता से निकलकर जन आस्था का पर्व बन गई. यात्रा के दौरान पारंपरिक छंतोलियां, लोकगीत, ढोल दमाऊं और कठिन पहाड़ी मार्गों पर पैदल चलने वाले श्रद्धालु इस आयोजन को विशिष्ट बनाते हैं.नंदा राजजात यात्रा पौराणिक सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है. इसे सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि एशिया की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक माना जाता है. जिसे जोखिम भरे पैदल रास्तों को पार कर पूरा किया जाता है. मां नंदा को पार्वती का रूप या हिमालयी की बेटी माना जाता है. ऐसे में हर 12 साल में मां नंदा को विदा किया जाता है. यह यात्रा चमोली जिले के कर्णप्रयाग के नौटी गांव से निकलती है. जो रूपकुंड झील के पास होमकुंड में समाप्त होती है. राजजात यात्रा दुर्गम हिमालयी क्षेत्र से होकर गुजरती है. जिसमें पथरीले रास्ते, बुग्याल, ग्लेशियर शामिल हैं. मुख्य पड़ाव की बात करें तो यह नौटी से शुरू होकर कुरुड़ फिर लटूखाल उसके बाद वाण गांव पहुंचती है. जिसके बाद यात्रा बेदनी बुग्याल से होकर रूपकुंड फिर होमकुंड पहुंचती है.नंदा राजजात यात्रा करीब 280 किलोमीटर लंबी मानी जाती है. यह यात्रा घने जंगलों, संकरी पहाड़ी रास्ते, बर्फीली चोटियों और दुर्गम दर्रों से होकर गुजरती है. यात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालु, साधु संत और स्थानीय लोग शामिल होते हैं. पूरे रास्ते मां नंदा से जुड़े भजन कीर्तन करती मंडलियां जरा भी थकान का एहसास नहीं होने देती है. ऐसी मान्यता है कि नंदा राजजात यात्रा पूरे क्षेत्र में समृद्धि और आशीर्वाद बरसाती है. उधर, अगर 2026 में प्रस्तावित यात्रा को 2027 तक टाल दिया जाता है तो यह निर्णय परंपरा और प्रशासनिक के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है. एक ओर आस्था और धार्मिक अनुशासन का सवाल है तो दूसरी ओर सरकार की तैयारियों और संसाधनों की सीमाएं. साल 2027 उत्तराखंड सरकार और प्रशासन के लिए पहले से ही असाधारण रूप से व्यस्त रहने वाला है. यदि इसी साल नंदा राजजात यात्रा भी आयोजित होती है तो दबाव कई गुना बढ़ जाएगा. क्योंकि, इस साल हरिद्वार कुंभ मेला 2027 का आयोजन प्रस्तावित है. कुंभ मेला भी केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि, विश्व का सबसे बड़ा मानव समागम माना जाता है. हालांकि, इस बार हरिद्वार में अर्धकुंभ है, लेकिन सरकार इसे पूर्ण कुंभ की तरह ही बनाने की कोशिश में लगी है. स्वाभाविक है कि जिस तरीके से सरकार इसकी तैयारी और इसे प्रचारित कर रही है तो करोड़ों श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ को देखते हुए सुरक्षा, यातायात, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाएं और आपदा प्रबंधन को लेकर प्रशासन को पूरी ताकत झोंकनी पड़ेगी. ऐसे में साल 2027 में नंदा राजजात जैसी दुर्गम यात्रा का आयोजन करना प्रशासनिक क्षमता की कड़ी परीक्षा होगा. क्योंकि, अधिकारियो की बड़ी संख्या भी इस यात्रा में भी लगानी पड़ेगी. इसके साथ ही सरकार और प्रशासनिक अमले के साथ संगठन के लिहाज से भी 2027 बेहद चुनौती भरा रहने वाला है. क्योंकि, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव भी इसी साल प्रस्तावित हैं. चुनावी साल में प्रशासनिक अमले का बड़ा हिस्सा चुनाव आयोग के निर्देशों के तहत कार्य करता है.आचार संहिता, मतदान व्यवस्था सुरक्षा और मतगणना जैसे कार्यों में अधिकारियों से लेकर कर्मचारियों तक की व्यस्तता चरम पर होती है. ऐसे समय में नंदा राजजात यात्रा या कुंभा मेला फिर चुनाव के लिए पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन जुटाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. वहीं, दूसरी ओर चारधाम यात्रा भी प्रशासन और सरकार को बेहद व्यस्त रखती है. चारधाम यात्रा उत्तराखंड के लिए हर साल एक बड़ा प्रशासनिक अभ्यास होती है. लाखों तीर्थयात्री, सीमित पर्वतीय सड़कें, मौसम की मार और आपदाओं का खतरा, इन सबके बीच प्रशासन को लगातार अलर्ट मोड में रहना पड़ता है. ऐसे में 2027 में यदि चारधाम यात्रा, कुंभ मेला और नंदा राजजात तीनों का दबाव एक साथ पड़ा तो प्रशासनिक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा. नंदा राजजात यात्रा के दौरान सुरक्षा और आपदा प्रबंधन सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है. यात्रा मार्ग अत्यंत संवेदनशील और दुर्गम है. भूस्खलन, बारिश, बर्फबारी और स्वास्थ्य, आपात स्थितियों की आशंका हमेशा बनी रहती है.इसके लिए एसडीआरएफ, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, लोक निर्माण विभाग और स्वयंसेवी संगठनों के बीच समन्वय जरूरी होता है. यदि 2027 में कुंभ और चुनाव पहले से ही इन एजेंसियों को व्यस्त रखते हैं तो नंदा राजजात के लिए अतिरिक्त प्रबंध करना सरकार के लिए कठिन चुनौती साबित हो सकता है. नंदा राजजात यात्रा को राज्य सरकार पर्यटन के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मानती रही है. यह यात्रा उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर देती है, लेकिन यदि 2027 में अत्यधिक दबाव के कारण व्यवस्थाएं कमजोर पड़ती हैं तो इसका असर राज्य की पर्यटन छवि पर भी पड़ सकता है.देश और दुनिया की नजरें कुंभ और चारधाम के साथ नंदा राजजात जैसे आयोजनों पर रहती है. ऐसे में किसी भी स्तर पर अव्यवस्था सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा सकती है. हालांकि, राज्य के पर्यटन मंत्री इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते हैं. उनका कहना है कि सरकार हर आयोजन करवाने में सक्षम है. नंदा राजजात यात्रा उत्तराखंड की आत्मा से जुड़ा आयोजन है. इसे 2026 में कराना या 2027 में स्थगित करना. दोनों ही विकल्पों पर समिति को हो निर्णय लेना है. यदि यह यात्रा 2027 में होती है तो कुंभ मेला, विधानसभा चुनाव, चारधाम यात्रा और अन्य राष्ट्रीय आयोजनों के बीच सरकार व प्रशासन को असाधारण समन्वय संसाधन प्रबंधन एवं संवेदनशीलता दिखानी होगी. आने वाले समय में इस यात्रा को लेकर लिया जाने वाला निर्णय ये भी तय करेगा कि सरकार आस्था, परंपरा और प्रशासनिक क्षमता के बीच किस तरह संतुलन साधती है.  नंदा राजजात यात्रा का ऐतिहासिक महत्व बेहद समृद्ध है. ये उत्तराखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा है. इस यात्रा में राजवंशों की भूमिका जिसमें कत्यूरी और चंद राजवंशों शामिल हैं. उन्होंने ही इस यात्रा को संगठित करके चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उस समय ये यात्रा राजाओं और स्थानीय समुदायों के बीच एकता का प्रतीक भी थी. हर 12 साल में यात्रा के आयोजित होने के दौरान पहाड़ों की रौनक देखने को मिलती है. गांवों में यात्रा पहुंचने के दौरान गांववासी यात्रा का स्वागत नृत्य करके करते हैं, यात्रा की विदाई बेटी की विदाई की तरह की जाती है. जिससे सभी भावुक हो जाते हैं. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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