ने के बादडॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
देश के अन्य हिमालयी राज्यों के साथ ही उत्तराखण्ड इस बात के लिये भाग्यशाली है कि पहाड़ी क्षेत्रों में रासायनिक खादों का प्रयोग नाम मात्र का होता है। कमोबेश यदि यहाँ रासायनिक खादों का इस्तेमाल किया भी जाता है तो वे बारिश के पानी के साथ पहाड़ी ढलानों में बह जाते हैं।उत्तराखंड को देश में ऑर्गेनिक खेती के मॉडल राज्य के तौर पर स्थापित करने की दिशा में पिछले कई वर्षों से लगातार प्रयास किए जा रहे थे. लेकिन अब यही महत्वाकांक्षी योजना बड़े संकट में फंसती नजर आ रही है. प्रदेश में जैविक खेती से जुड़े 90 हजार से ज्यादा किसानों के ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट सस्पेंड होने से न सिर्फ किसानों की आजीविका प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया है, बल्कि राज्य की ऑर्गेनिक पहचान पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं.उत्तराखंड स्टेट ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी (यूएसओसीए) द्वारा की गई इस कार्रवाई ने विभागीय कार्यप्रणाली और सरकारी तैयारियों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. राज्य में फिलहाल करीब डेढ़ लाख किसान ऑर्गेनिक खेती से जुड़े हुए हैं, जो लगभग 74 हजार हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती कर रहे हैं. पिछले दो दशकों में किसानों को रासायनिक खेती से हटाकर जैविक खेती की ओर लाने के लिए सरकार ने बड़े स्तर पर अभियान चलाए थे. किसानों को प्रशिक्षण, उत्पादों के प्रमाणीकरण और बाजार उपलब्ध कराने जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए. लेकिन अब सरकारी सिस्टम की धीमी कार्यप्रणाली और विभागीय समन्वय की कमी ने पूरी व्यवस्था को संकट में डाल दिया है.उत्तराखंड को देश में ऑर्गेनिक खेती के मॉडल राज्य के तौर पर स्थापित करने की दिशा में पिछले कई वर्षों से लगातार प्रयास किए जा रहे थे. लेकिन अब यही महत्वाकांक्षी योजना बड़े संकट में फंसती नजर आ रही है. प्रदेश में जैविक खेती से जुड़े 90 हजार से ज्यादा किसानों के ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट सस्पेंड होने से न सिर्फ किसानों की आजीविका प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया है, बल्कि राज्य की ऑर्गेनिक पहचान पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं.उत्तराखंड स्टेट ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी (यूएसओसीए) द्वारा की गई इस कार्रवाई ने विभागीय कार्यप्रणाली और सरकारी तैयारियों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. राज्य में फिलहाल करीब डेढ़ लाख किसान ऑर्गेनिक खेती से जुड़े हुए हैं, जो लगभग 74 हजार हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती कर रहे हैं. पिछले दो दशकों में किसानों को रासायनिक खेती से हटाकर जैविक खेती की ओर लाने के लिए सरकार ने बड़े स्तर पर अभियान चलाए थे. किसानों को प्रशिक्षण, उत्पादों के प्रमाणीकरण और बाजार उपलब्ध कराने जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए. लेकिन अब सरकारी सिस्टम की धीमी कार्यप्रणाली और विभागीय समन्वय की कमी ने पूरी व्यवस्था को संकट में डाल दिया है. प्रदेश के 312 ऑर्गेनिक ग्रोवर ग्रुप से जुड़े किसानों का प्रमाणीकरण इसलिए निलंबित किया गया क्योंकि, इन समूहों के पास वैध ‘लीगल एंटिटी’ (कानूनी इकाई) का दर्जा नहीं था. नियमों के अनुसार, ऑर्गेनिक खेती से जुड़े समूहों का सोसाइटी, कंपनी या अन्य कानूनी संस्था के रूप में पंजीकृत होना जरूरी है. लेकिन बड़ी संख्या में समूह अब तक रजिस्टर्ड नहीं हो सके.बताया जा रहा है कि एपीडा (एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 16 अप्रैल 2026 को कृषि सचिव एसएन पांडे को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत भी कराया था. इसके बावजूद विभागीय स्तर पर किसानों और समूहों को समय रहते रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से जोड़ने के लिए ठोस पहल नहीं की गई. अब हालात यह हैं कि 90 हजार से ज्यादा किसानों के सर्टिफिकेट सस्पेंड हो चुके हैं और यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो जून के अंत तक 1 लाख 13 हजार से अधिक किसानों के प्रमाणीकरण पर संकट खड़ा हो सकता है.प्रदेश के 312 ऑर्गेनिक ग्रोवर ग्रुप से जुड़े किसानों का प्रमाणीकरण इसलिए निलंबित किया गया क्योंकि, इन समूहों के पास वैध ‘लीगल एंटिटी’ (कानूनी इकाई) का दर्जा नहीं था. नियमों के अनुसार, ऑर्गेनिक खेती से जुड़े समूहों का सोसाइटी, कंपनी या अन्य कानूनी संस्था के रूप में पंजीकृत होना जरूरी है. लेकिन बड़ी संख्या में समूह अब तक रजिस्टर्ड नहीं हो सके.बताया जा रहा है कि एपीडा (एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 16 अप्रैल 2026 को कृषि सचिव एसएन पांडे को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत भी कराया था. इसके बावजूद विभागीय स्तर पर किसानों और समूहों को समय रहते रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से जोड़ने के लिए ठोस पहल नहीं की गई. अब हालात यह हैं कि 90 हजार से ज्यादा किसानों के सर्टिफिकेट सस्पेंड हो चुके हैं और यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो जून के अंत तक 1 लाख 13 हजार से अधिक किसानों के प्रमाणीकरण पर संकट खड़ा हो सकता है.प्रदेश के 312 ऑर्गेनिक ग्रोवर ग्रुप से जुड़े किसानों का प्रमाणीकरण इसलिए निलंबित किया गया क्योंकि, इन समूहों के पास वैध ‘लीगल एंटिटी’ (कानूनी इकाई) का दर्जा नहीं था. नियमों के अनुसार, ऑर्गेनिक खेती से जुड़े समूहों का सोसाइटी, कंपनी या अन्य कानूनी संस्था के रूप में पंजीकृत होना जरूरी है. लेकिन बड़ी संख्या में समूह अब तक रजिस्टर्ड नहीं हो सके.बताया जा रहा है कि एपीडा (एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 16 अप्रैल 2026 को कृषि सचिव एसएन पांडे को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत भी कराया था. इसके बावजूद विभागीय स्तर पर किसानों और समूहों को समय रहते रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से जोड़ने के लिए ठोस पहल नहीं की गई. अब हालात यह हैं कि 90 हजार से ज्यादा किसानों के सर्टिफिकेट सस्पेंड हो चुके हैं और यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो जून के अंत तक 1 लाख 13 हजार से अधिक किसानों के प्रमाणीकरण पर संकट खड़ा हो सकता है. उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद के कर्मचारी भी हड़ताल पर चले गए हैं. कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें पिछले चार माह से वेतन नहीं मिला है, जिससे उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है. परिषद के फील्ड और कार्यालय कर्मचारियों ने कामकाज ठप कर धरना शुरू कर दिया है. कर्मचारी संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि अधिकारियों की लापरवाही और प्रोजेक्ट संचालन में रुचि न लेने के कारण हालात बिगड़े हैं. उनका आरोप है कि समय रहते योजना को व्यवस्थित तरीके से नहीं चलाया गया, जिसका खामियाजा अब किसानों और कर्मचारियों दोनों को भुगतना पड़ रहा है. हैं।।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











