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आपदा के दर्द से कराह रहे पहाड़ को अपने ”जननायकों” की तलाश

10/09/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

 मानसून की विदाई की घड़ी आ गई है। चोटियों पर धीरे-धीरे धूप खिलने लगी
है। अनाज के कोठारों में समाने के लिए झंगोरा, मंडुवा, चौलाई की फसलें
कसमसा रही हैं। बुरांश की टहनियों व पत्तियों में ऐंठन आने लगी है और इन
सबके बीच बारिश से बेहाल पहाड़ धीरे-धीरे फिर से अपनी कमर सीधी करने
लगा है। पिछले करीब डेढ़ महीने की मूसलधार ने पहाड़ को फिर उसी जगह ला
खड़ा किया है, जहां से वह हर वर्षाकाल के बाद धीमे से ही सही, लेकिन पूरी
हिम्मत और ताकत के साथ कदम आगे बढ़ाता है। बारिश से होने वाली बदहाली
पहाड़ की नियति है, तो बारंबार उठ खड़ा होना मानो उसकी जिद बन गई है।
यह जिद जिजीविषा के साथ-साथ प्रकृति से प्रेम की भी है।निश्चित रूप से इस
जिद को जिंदा रखने के लिए अब आगे बढ़कर पहाड़ के हाथ थामने की
आवश्यकता है।और हाथ थामने के लिए दिल खोलना जरूरी होता है। ऐसे में प्रश्न
है कि इस आपदा से पार पाते हुए पहाड़ फिर से सीना तानेगा कैसे? यह
आश्वस्तकारी है कि पिछले दिनों उत्तराखंड में जहां भी प्राकृतिक आपदा का कहर
बरपा, प्रदेश सरकार ने पीड़ितों को फौरी मदद देने में तत्परता दिखाई। यहां तक
कि मुख्यमंत्री आपदाग्रस्त क्षेत्रों में स्वयं पहुंचे। धराली में तो वह तीन दिनों तक
वहीं डटे भी रहे। फिर भी शायद इतनाभर काफी नहीं है। प्रदेश में आय के
सीमित संसाधनों और बड़े पैमाने पर हुए नुकसान पर गौर करें तो उत्तराखंड को

इस समय बड़ी आर्थिक मदद की आवश्यकता है।एक अनुमान के मुताबिक
तीर्थाटन और पर्यटन के सिलसिले में प्रत्येक वर्ष उत्तराखंड में बाहर से आठ
करोड़ लोगों की आवाजाही होती है। यह संख्या प्रदेश की कुल जनसंख्या की
लगभग सात गुनी है। स्पष्ट है कि प्रदेश के संसाधनों को प्रत्येक वर्ष सात गुना
ज्यादा आबादी का बोझ उठाना पड़ता है। ऐसे में बेहाल उत्तराखंड को फिर से
संवारने के लिए केंद्र सरकार को बिना समय गंवाए हाथ बढ़ाने की जरूरत
है। प्रदेश के कई जिलों में बरपी आपदा में जान और माल का बड़े पैमाने पर
नुकसान हुआ है। बस्तियों से लेकर कस्बों तक या तो मलबों में दब गए हैं या
पानी में बह गए हैं। उत्तरकाशी का धराली हो या चमोली की थराली, रुद्रप्रयाग
का बसुकेदार हो या पौड़ी का बुरांसी या फिर बागेश्वर का पौंसारी, बाहर से
आने वालों को तो आज यहां मलबे के बीच चंद दीवारें और छतें ही
दिखेंगी। मलबे के अंदर तो पूरा घर, कुनबा और बस्तियां दफन हैं। इन्हीं मलबों
और बर्बादियों के बीच इन दिनों केंद्रीय दल यहां के प्रभावित क्षेत्रों में नुकसान
का जायजा ले रहा है। संभवतः उसकी आकलन रिपोर्ट के आधार पर ही सहायता
राशि तय होगी। पंजाब और हिमाचल के बाद आपदाग्रस्त क्षेत्रों का निरीक्षण
करने के लिए प्रधानमंत्री उत्तराखंड भी आ रहे हैं। कहा भी जाता है कि पहाड़ को
समझने के लिए अंतर्दृष्टि चाहिए। पहाड़ जितना ऊंचा दिखता है, उसकी जड़ें
उतनी गहराई में समाई रहती हैं।आशा है कि उत्तराखंड के जख्म और उसकी
पीड़ा को गहराई से महसूस किया जाएगा और तदनुरूप उसका उपचार भी
किया जाएगाऔर जहां तक पहाड़ के फिर से उठ खड़ा होने की बात है तो

मानसून के मंद पड़ते ही उत्तराखंड के चारों धाम में चहल-पहल लौटने लगी है,
बदरी-केदार में शंखध्वनियां गूंजने लगी हैं और गंगा-यमुना की मातृछाया देशभर
के श्रद्धालुओं पर फिर से अपना आशीष बरसाने लगी है। आपदा का दर्द झेल चुके
पहाडों को अब धमाकों का दर्द भी सहना पड़ रहा है। हिमालयी राज्यों में
राजमार्ग, रेलवे, जल विद्युत और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में सतत
निर्माण के लिए व्यापक भू-वैज्ञानिक और भू-तकनीकी अध्ययन अनिवार्य है
ताकि अनियोजित और अवैज्ञानिक क्रियान्वयन से पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिकीय
संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। संवेदनशील क्षेत्रों में सड़क की चौड़ाई को
बढ़ाने के लिए ऐसे क्षेत्रों में नदी की साइड कॉलम बनाकर एलिवेटेड रोड का
निर्माण वैज्ञानिक तरीके से किया जाना चाहिए। सड़कों का चौड़ीकरण उस क्षेत्र
की भूगर्भीय दशा का अध्ययन करते हुए किया जाना चाहिए। अदालत ने
हिमालयी राज्य की कई गंभीर चिंताओं को सूचीबद्ध किया – जलवायु परिवर्तन,
वनों की कटाई, जलविद्युत परियोजनाओं के "दृश्यमान" और "चिंताजनक"
प्रभाव, जिनसे कथित तौर पर पानी की कमी और भूस्खलन हो रहा है;
अनियंत्रित पर्यटन पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है और संसाधनों
पर दबाव डाल रहा है; और बढ़ती संख्या में पर्यटकों को समायोजित करने के
लिए चार-लेन सड़कों, सुरंगों और बहुमंजिला इमारतों का निरंतर निर्माण.
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने जलविद्युत परियोजनाओं के आसपास रहने वाले
समुदायों के संघर्षों को उजागर किया, जो पानी की कमी, भूस्खलन और यहां
तक कि अपने घरों के पास संरचनात्मक दरारों से जूझ रहे हैं. अगर पहाड़ में

सड़कों को बनाने का यह पुराना तरीका न सुधारा गया तो आपदा से कराह रहे
पहाडों के जख्म और गहरे हो जाएंगे। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के*
*जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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