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गांवों से अपना बसेरा छोड़ कर पलायन कर रहे हैं लोग?

30/01/22
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:
हुक्मरान भले कुछ कहें लेकिन पलायन कम होने का नाम नहीं ले रहा है। चीन और नेपाल सीमा से सटे पिथौरागढ़ जिले में पलायन का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। पलायन आयोग की रिपोर्ट पहले ही साफ कर चुकी है कि जिले 41 गांवों में 50 फीसदी से ज्यादा आबादी का पलायन हो चुका है। हाल ही में जल-जीवन मिशन के सर्वे में भी 58 गांवों के गैर आबाद होने की पुष्टि हुई थी।

वर्ष 2019 में जिले में 1600 गांव आबाद थे, लेकिन अब जिले में आबाद गांवों की संख्या घटकर 1542 हो चुकी है। चुनावी मौसम में जनता के बीच वोट मांगने जा रहे नेताओं को पलायन से खाली ये गांव उल्टा मुंह चिढ़ा रहे हैं। साथ ही उनके पलायन रोकने के दावे और विकास की पोल भी खोल रहे हैं। सीमांत जिले में 58 गांव ऐसे हैं जहां इंसानी जिंदगी की कोई आहट नजर नही आ रही है।

लगातार बढ़ रहे पलायन के पीछे बिजली, पानी, सड़क, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली है। पलायन की सबसे अधिक मार बेड़ीनाग तहसील पर पड़ी है। बेड़ीनाग ब्लाक के 24 गांव मानव विहीन हो चुके हैं। गंगोलीहाट तहसील में 13 गांव खाली हो चुके हैं। कोरोना के बाद महानगरों में रहे रहे प्रवासियों ने गांवों की ओर रिवर्स पलायन किया। लाखों की संख्या में प्रवासी गांवों को लौटे।

सरकार ने रिर्वस पलायन के बाद घर आए प्रवासियों के लिए कई योजनाएं भी संचालित की। योजना के मानकों में जटिलता के कारण कई प्रवासियों को सरकारी योजनाओं को लाभ नहीं मिल सका। कोरोना कम होने के बाद लाखों की संख्या में वापस आए प्रवासी फिर महानगरों को लौट गए।
चीन और नेपाल सीमा से सटे गांवों से हो रहा पलायन चिंता का विषयपिथौरागढ़।

चीन और नेपाल सीमा से सटे गांवों से हो रहा पलायन चिंता का विषय है। लोगों का कहना है कि सीमा से सटे गांवों के सच्चे प्रहरी सीमांत के ही ग्रामीण हैं। कुछ समय पूर्व से ही सेना और अर्द्ध सैनिक बलों के जवान ही सीमा पर तैनात हुए हैं। जब सीमा पर कोई सेना नहीं थी तो सीमाओं की रक्षा सीमांत में रह रहे वाशिंदों ने ही की। सीमांत के वाशिंदों की हिम्मत के कारण हमारी सीमाओं पर दूसरा देश अतिक्रमण नहीं कर पाया। जिस तरह सीमांत के गांवों से पलायन हो रहा है, वो चिंता का विषय है।

सीमा से लगातार हो रहा पलायन अंतरराष्ट्रीय सीमा को भी खतरे में डाल सकता है।सीमा से सटे गांवों में असुविधाओं से बढ़ा पलायनपिथौरागढ़। नेपाल में जब माओवाद चरम पर था, तब सरकार ने यह फैसला लिया था कि सीमा से लगे भारतीय गांवों में सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। वहां पर संचार, सड़क, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके लिए बाकायदा सर्वे भी किया गया लेकिन बाद में सरकार इन सुविधाओं को विस्तार देने का काम एक प्रकार से भूल गई। नेपाल सीमा से लगे दर्जनों गांवों की हालत अभी भी खराब है।

बीतेसालों में जिस तेजी से पिथौरागढ़ में पलायन बढ़ा है, उससे साफ साबित हो रहा है कि लोगों की जरूरतें गांव के भीतर पूरी नहीं हो पा रही हैं. ऐसे में सरकार को अब गंभीर कदम उठाने की भी जरूरत है. पिथौरागढ़ जिले में बढ़ता पलायन देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा है क्योंकि ये जिला नेपाल के साथ ही चाइना से भी सटा है.

उत्तराखंड में जमीन खरीद बिक्री का कानून बाकी हिमालयी राज्यों की तरह सख्त नहीं बनाया गया. तराई और मैदानी क्षेत्रों के अलावा पहाड़ों के भीतर पर्यटन और होटल व व्यावसायिक इस्तेमाल की जमीनों, होटलों को राज्य के बाहरी यानी गैर उत्तराखंडी मूल के लोगों ने खरीद लिया.इन खरीदारों में सबसे ज्यादा दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार के विभिन्न शहरों के लोग हैं.

बड़ी तादाद में गैर पर्वतीय लोग यहां संपत्तियां खरीदकर उत्तराखंड के स्थायी निवासी बन गए. दूसरे पड़ोसी हिमालयी राज्यों जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश में इस तरह की छूट दूर-दूर तक भी मुमकिन नहीं है क्योंकि वहां दूसरे प्रांतों के निवासी उत्तराखंड की तरह 250 वर्ग मीटर जमीन नहीं खरीद सकते हैं.हालांकि एक ही परिवार के तीन लोग अलग-अलग जमीन खरीदते हैं तो वे शहरी क्षेत्र में 750 वर्ग मीटर जमीन और मकान और संपत्तियां नहीं खरीद सकते. लेकिन बाहर के बिल्डर्स और प्रॉपर्टी का काम करने वाले भूमि की खरीद फरोख्त में निवेश करके दो तीन साल के भीतर ही अपनी जमीन की बिक्री करके तीन गुना मुनाफा अर्जित कर रहे हैं.

राज्य बनने के बाद यहां जमीन कानून को सख्त बनाए जाने पर ध्यान नहीं दिया गया. 2007 में बाद भाजपा ने कुछ सीमित पाबंदी तो लगाई लेकिन कृषि भूमि की खरीद बिक्री के जरिए बड़े पैमाने पर लैंड यूज बदलकर आवासीय कॉलोनियां बनाने और देहरादून समेत कई बेहद संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में बहुमंजिला इमारतें बनाने की अनमुति देने से शहरों व तराई क्षेत्रों के कस्बों में आबादी का बेतहाशा बोझ बढ़ता चला गया.राज्य बनने के बाद आबादी का बोझ सबसे ज्यादा देहरादून जिले में बढ़ा.

उसके बाद हरिद्वार और उधमसिंहनगर व नैनीताल जिले में जनसंख्या बढ़ती गई.21 साल पहले राज्य बना लेकिन परंपरागत पर्वतीय जनजीवन की खुशहाली के लिए कुछ भी ठोस दिशा नीति तय नहीं की गई. चूंकि उत्तराखंड उत्तर प्रदेश के पर्वतीय हिस्सों को अलग करके एक पर्वतीय राज्य बनाया गया लेकिन व्यावहारिक तौर पर पर्वतीय प्रदेश की जीवन पद्धति के हिसाब से विकास का आधारभूत ढांचा बनाने के बारे में सिर्फ जुबानी जमा खर्च होता रहा.असल में अतीत से ही इस संवेदनशील पर्वतीय अंचल की समस्याएं बाकी उत्तर प्रदेश से एकदम जुदा थीं.

लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि राज्य बनने के बाद यहां बदला कुछ भी ज्यादा नहीं. देहरादून में राजधानी उत्तर प्रदेश की राजधानी के एक्सटेंशन कांउटर की तरह काम कर रही है. ज़रूरत केवल इच्छाशक्ति की है। केंद्र से लेकर तमाम राज्य सरकारें युवाओं के हुनर को निखारने के लिए कई प्रकार की योजनाएं चला रही हैं।

यदि उन योजनाओं को ईमानदारी से धरातल पर उतारा जाये और युवाओं को उससे जोड़ा जाये तो न केवल पलायन जैसी समस्या पर काबू पाया जा सकता है बल्कि इससे कोरोना और उसकी जैसी फैलने वाली अन्य घातक बिमारियों को भी आसानी से रोका जा सकता है। गांव में हुनर की कमी नहीं है, कमी है तो उस हुनर को पहचानने और उसे रोज़गार से जोड़ने की। यही वो मंत्र है जो पलायन जैसी समस्या को रोक सकता है।

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