• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

गांवों से अपना बसेरा छोड़ कर पलायन कर रहे हैं लोग?

30/01/22
in उत्तराखंड
Reading Time: 1min read
206
SHARES
258
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:
हुक्मरान भले कुछ कहें लेकिन पलायन कम होने का नाम नहीं ले रहा है। चीन और नेपाल सीमा से सटे पिथौरागढ़ जिले में पलायन का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। पलायन आयोग की रिपोर्ट पहले ही साफ कर चुकी है कि जिले 41 गांवों में 50 फीसदी से ज्यादा आबादी का पलायन हो चुका है। हाल ही में जल-जीवन मिशन के सर्वे में भी 58 गांवों के गैर आबाद होने की पुष्टि हुई थी।

वर्ष 2019 में जिले में 1600 गांव आबाद थे, लेकिन अब जिले में आबाद गांवों की संख्या घटकर 1542 हो चुकी है। चुनावी मौसम में जनता के बीच वोट मांगने जा रहे नेताओं को पलायन से खाली ये गांव उल्टा मुंह चिढ़ा रहे हैं। साथ ही उनके पलायन रोकने के दावे और विकास की पोल भी खोल रहे हैं। सीमांत जिले में 58 गांव ऐसे हैं जहां इंसानी जिंदगी की कोई आहट नजर नही आ रही है।

लगातार बढ़ रहे पलायन के पीछे बिजली, पानी, सड़क, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली है। पलायन की सबसे अधिक मार बेड़ीनाग तहसील पर पड़ी है। बेड़ीनाग ब्लाक के 24 गांव मानव विहीन हो चुके हैं। गंगोलीहाट तहसील में 13 गांव खाली हो चुके हैं। कोरोना के बाद महानगरों में रहे रहे प्रवासियों ने गांवों की ओर रिवर्स पलायन किया। लाखों की संख्या में प्रवासी गांवों को लौटे।

सरकार ने रिर्वस पलायन के बाद घर आए प्रवासियों के लिए कई योजनाएं भी संचालित की। योजना के मानकों में जटिलता के कारण कई प्रवासियों को सरकारी योजनाओं को लाभ नहीं मिल सका। कोरोना कम होने के बाद लाखों की संख्या में वापस आए प्रवासी फिर महानगरों को लौट गए।
चीन और नेपाल सीमा से सटे गांवों से हो रहा पलायन चिंता का विषयपिथौरागढ़।

चीन और नेपाल सीमा से सटे गांवों से हो रहा पलायन चिंता का विषय है। लोगों का कहना है कि सीमा से सटे गांवों के सच्चे प्रहरी सीमांत के ही ग्रामीण हैं। कुछ समय पूर्व से ही सेना और अर्द्ध सैनिक बलों के जवान ही सीमा पर तैनात हुए हैं। जब सीमा पर कोई सेना नहीं थी तो सीमाओं की रक्षा सीमांत में रह रहे वाशिंदों ने ही की। सीमांत के वाशिंदों की हिम्मत के कारण हमारी सीमाओं पर दूसरा देश अतिक्रमण नहीं कर पाया। जिस तरह सीमांत के गांवों से पलायन हो रहा है, वो चिंता का विषय है।

सीमा से लगातार हो रहा पलायन अंतरराष्ट्रीय सीमा को भी खतरे में डाल सकता है।सीमा से सटे गांवों में असुविधाओं से बढ़ा पलायनपिथौरागढ़। नेपाल में जब माओवाद चरम पर था, तब सरकार ने यह फैसला लिया था कि सीमा से लगे भारतीय गांवों में सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। वहां पर संचार, सड़क, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके लिए बाकायदा सर्वे भी किया गया लेकिन बाद में सरकार इन सुविधाओं को विस्तार देने का काम एक प्रकार से भूल गई। नेपाल सीमा से लगे दर्जनों गांवों की हालत अभी भी खराब है।

बीतेसालों में जिस तेजी से पिथौरागढ़ में पलायन बढ़ा है, उससे साफ साबित हो रहा है कि लोगों की जरूरतें गांव के भीतर पूरी नहीं हो पा रही हैं. ऐसे में सरकार को अब गंभीर कदम उठाने की भी जरूरत है. पिथौरागढ़ जिले में बढ़ता पलायन देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा है क्योंकि ये जिला नेपाल के साथ ही चाइना से भी सटा है.

उत्तराखंड में जमीन खरीद बिक्री का कानून बाकी हिमालयी राज्यों की तरह सख्त नहीं बनाया गया. तराई और मैदानी क्षेत्रों के अलावा पहाड़ों के भीतर पर्यटन और होटल व व्यावसायिक इस्तेमाल की जमीनों, होटलों को राज्य के बाहरी यानी गैर उत्तराखंडी मूल के लोगों ने खरीद लिया.इन खरीदारों में सबसे ज्यादा दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार के विभिन्न शहरों के लोग हैं.

बड़ी तादाद में गैर पर्वतीय लोग यहां संपत्तियां खरीदकर उत्तराखंड के स्थायी निवासी बन गए. दूसरे पड़ोसी हिमालयी राज्यों जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश में इस तरह की छूट दूर-दूर तक भी मुमकिन नहीं है क्योंकि वहां दूसरे प्रांतों के निवासी उत्तराखंड की तरह 250 वर्ग मीटर जमीन नहीं खरीद सकते हैं.हालांकि एक ही परिवार के तीन लोग अलग-अलग जमीन खरीदते हैं तो वे शहरी क्षेत्र में 750 वर्ग मीटर जमीन और मकान और संपत्तियां नहीं खरीद सकते. लेकिन बाहर के बिल्डर्स और प्रॉपर्टी का काम करने वाले भूमि की खरीद फरोख्त में निवेश करके दो तीन साल के भीतर ही अपनी जमीन की बिक्री करके तीन गुना मुनाफा अर्जित कर रहे हैं.

राज्य बनने के बाद यहां जमीन कानून को सख्त बनाए जाने पर ध्यान नहीं दिया गया. 2007 में बाद भाजपा ने कुछ सीमित पाबंदी तो लगाई लेकिन कृषि भूमि की खरीद बिक्री के जरिए बड़े पैमाने पर लैंड यूज बदलकर आवासीय कॉलोनियां बनाने और देहरादून समेत कई बेहद संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में बहुमंजिला इमारतें बनाने की अनमुति देने से शहरों व तराई क्षेत्रों के कस्बों में आबादी का बेतहाशा बोझ बढ़ता चला गया.राज्य बनने के बाद आबादी का बोझ सबसे ज्यादा देहरादून जिले में बढ़ा.

उसके बाद हरिद्वार और उधमसिंहनगर व नैनीताल जिले में जनसंख्या बढ़ती गई.21 साल पहले राज्य बना लेकिन परंपरागत पर्वतीय जनजीवन की खुशहाली के लिए कुछ भी ठोस दिशा नीति तय नहीं की गई. चूंकि उत्तराखंड उत्तर प्रदेश के पर्वतीय हिस्सों को अलग करके एक पर्वतीय राज्य बनाया गया लेकिन व्यावहारिक तौर पर पर्वतीय प्रदेश की जीवन पद्धति के हिसाब से विकास का आधारभूत ढांचा बनाने के बारे में सिर्फ जुबानी जमा खर्च होता रहा.असल में अतीत से ही इस संवेदनशील पर्वतीय अंचल की समस्याएं बाकी उत्तर प्रदेश से एकदम जुदा थीं.

लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि राज्य बनने के बाद यहां बदला कुछ भी ज्यादा नहीं. देहरादून में राजधानी उत्तर प्रदेश की राजधानी के एक्सटेंशन कांउटर की तरह काम कर रही है. ज़रूरत केवल इच्छाशक्ति की है। केंद्र से लेकर तमाम राज्य सरकारें युवाओं के हुनर को निखारने के लिए कई प्रकार की योजनाएं चला रही हैं।

यदि उन योजनाओं को ईमानदारी से धरातल पर उतारा जाये और युवाओं को उससे जोड़ा जाये तो न केवल पलायन जैसी समस्या पर काबू पाया जा सकता है बल्कि इससे कोरोना और उसकी जैसी फैलने वाली अन्य घातक बिमारियों को भी आसानी से रोका जा सकता है। गांव में हुनर की कमी नहीं है, कमी है तो उस हुनर को पहचानने और उसे रोज़गार से जोड़ने की। यही वो मंत्र है जो पलायन जैसी समस्या को रोक सकता है।

Share82SendTweet52
Previous Post

उक्रांद के सामने वजूद बचाने की चुनौती?

Next Post

उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने जारी किया परीक्षाओं का कैलेंडर

Related Posts

उत्तराखंड

राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों में सर्वाधिक कॉर्पोरेट आयकरदाता बना यूजेवीएन लिमिटेड

July 29, 2026
19
उत्तराखंड

देहरादून-मसूरी रोड की गुणवत्ता पर बार-बार उठ रहे सवाल

July 29, 2026
3
उत्तराखंड

हर्षिल घाटी, फिर भी पर्यटन मानचित्र से दूर

July 29, 2026
2
उत्तराखंड

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र थराली में निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन

July 29, 2026
2
उत्तराखंड

डोईवाला: सिमलास ग्रांट में प्राकृतिक खेती को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

July 29, 2026
7
उत्तराखंड

डोईवाला: बसपा ने विधानसभा कमेटी का किया गठन

July 29, 2026
54

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67714 shares
    Share 27086 Tweet 16929
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45786 shares
    Share 18314 Tweet 11447
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38070 shares
    Share 15228 Tweet 9518
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37453 shares
    Share 14981 Tweet 9363
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37370 shares
    Share 14948 Tweet 9343

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों में सर्वाधिक कॉर्पोरेट आयकरदाता बना यूजेवीएन लिमिटेड

July 29, 2026

देहरादून-मसूरी रोड की गुणवत्ता पर बार-बार उठ रहे सवाल

July 29, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.