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विरक्ति से उपजा जीवाणुओं के जीने के अधिकार का समर्थन!

17/05/21
in उत्तराखंड, राजनीति, संस्कृति, हेल्थ
Reading Time: 1min read
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शंकर सिंह भाटिया
कोरोना जीवाणुओं के हलकों में खुशी का माहौल है। खुशी इस कदर कि उनके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे। जब इस जीवाणु ने चीन के बुहान में जन्म लिया था, यह मनुष्यों का काल बनकर उस पर टूट पड़ा था। तब हालात यह थे कि इस जीवाणु को समाप्त करने के लिए, मनुष्य के पास कोई जानकारी भी नहीं थी। चीन ने दुनिया को यह कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया था कि यह इस दुनिया में चमगादड़ से आया है। डब्ल्यूएचओ ने चीन की इस दलील को स्वीकार भी कर लिया। आज तक यह थ्योरी रह रहकर सामने आ रही हैं कि कोरोना चीन की बुहान लेबोरोटरी की उत्पत्ति है। यह दुनिया को जैविक युद्ध में धकेलने की चीन की कुचेष्टा का परिणाम है।

इससे कोरोना जीवाणुओं को क्या फर्क पड़ता है कि वह किसी लैब से कृत्रिम तरीके से पैदा हुआ हैं या फिर चमगादड़ उनकी जननी है। जीवाणु इस दुनिया में आया है तो अपनी प्रकृति के अनुसार वह काम करेगा ही। लेकिन कोरोना जीवाणुओं में इस बात को लेकर उत्साह है कि जिस मानव के लिए वह पिछले करीब डेढ़ साल में इतना खतरनाक मारक जीव बना हुआ है, वहीं से उसके समर्थन में, उसके अधिकार के लिए आवाजें उठने लगी हैं। आवाज उठाने वाले भी कोई जन सामान्य नहीं हैं, बल्कि एक राज्य के सत्ता के शीर्ष पर रह चुके विशिष्ट व्यक्ति हैं। कोरोना के हलकों में उत्साह की वजह यह भी है कि उन्होंने कहा है कि जीवाणुओं के भी अधिकार हैं, जिस तरह मानव, मानवाधिकार का ढिढौंरा पीटता है, वही मानव अब जीवाणुओं के अधिकार की बात भी कर रहा है। हमारे जीने के अधिकार को मान्यता दे रहा है, चाहे हम दूसरे के जीने के अधिकार को रौंदकर आगे निकल जा रहे हैं, चाहे हम मानव वस्तियों, अस्पतालों, शहरों, गांवों, नदियों के घाटों, श्यमशानों, कब्रिस्तानों को लाशों से पाट दे रहे हों, इसके बाद भी उनके बीच से जीवाधिकारों की आवाज उठ रही है, तो यह पूरे कोरोना जीवाणु समुदाय में उत्साह भरने वाला है।

उनमें अब आस जग उठी है कि मनुष्यों के लिए कानून बनाने वाले जब हमारे अधिकारों की बात करने लगे हैं तो निश्चित रूप से एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब संविधान में जीवाधिकारों का भी उल्लेख किया जाएगा। कोरोना जीवाणुओं ने एकजुट होकर ऐसे नेताओं के सम्मुख अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए एक मेमोरंडम प्रस्तुत करने का निर्णय कर लिया है। जिसमें संविधान में मानव के मूल अधिकारों वाले अनुच्छेदों के साथ कुछ परंतुक जोड़ने की मांग रखी गई है। जिसमें मनुष्यों के साबुन से हाथ धोने के अधिकार को चुनौती दी गई है। साबुन से हाथ धोने से कोरोना जीवाणु की तुरंत मृत्यु हो जाती है, जीवाणुओं का कहना है कि हमें यदि जीने का अधिकार है तो कोई इस तरह हमारी अकाल मृत्यु कैसे ला सकता है? सेनेटाइजर का छिड़काव भी बंद करने की मांग इस मांगपत्र में रखी गई है। हां मनुष्य को सिर्फ मास्क लगाने का अधिकार दिया जा सकता है, मनुष्य मास्क लगाकर अपना बचाव कर सकता है। मास्क लगाने से जीवाणु की मृत्यु नहीं होती, इसलिए इस क्रिया से यदि मनुष्य अपनी सुरक्षा करना चाहते हैं तो उनका कोई विरोध नहीं किया जा सकता है। उनका कहना है कि मनुष्य दो गज की दूरी भी बनाए रखे तो उसका भी विरोध नहीं है। क्योंकि अब हमने उड़कर एक से दूसरे तक पहुंचने की क्षमता हांसिल कर ली है।

उन्हें इस बात का मलाल है कि उनकी मातृभूमि चीन ने एक ही झटके में उनका सफाया कर दिया। इसके लिए भले ही उसने उन बहुत सारे मनुष्यों को भी निपटा दिया, जिनमें कोरोना जीवाणुओं ने प्रवेश कर लिया था। अब अमेरिका, यूरोप, रूस ने भी उसको लगभग निपटा लिया है। कुछ पिछड़े देशों और दुनिया की दूसरी सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत में वह जीवित है। भारत भूमि में तो उसे दूसरी मारक लहर लाने का मौका दिया गया है। इतना सब होकर भी यदि हमारे अधिकारों की बात करने वाले लोग इस भूमि पर हैं, तो निश्चित रूप से हमें एकजुट होना पड़ेगा। अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ेगी। तभी हमारा अस्थित्व समाप्त होने से बच सकता है। नहीं तो कहीं टीकाकरण से हमें समाप्त करने का षडयंत्र किया जा रहा है। अब तो कोरोना की दवा तक बनाने का दावा किया जा रहा है। इन सब हालात में हमारा अस्थित्व समाप्त होने से कोई नहीं रोक सकता। अपने अस्थित्व को बचाने के लिए ऐसे ही मनुष्यों की आड़ लेनी होगी, जिन्हें जीवाणुओं के जीने के अधिकार की चिंता है।

इस चिंतन बैठक में कुछ सुलझे हुए जीवाणुओं ने हस्तक्षेप किया कि मनुष्य खासकर नेताओं का कोई भरोसा नहीं किया जा सकता है, वह कब अपनी निष्ठा बदल दे। यह संभव है कि उन्हें जीवाणुओं के अधिकार का जो ज्ञान प्राप्त हुआ है, वह क्षणिक हो सकता है। अचानक सत्ता हाथ से निकल जाने के आवेग में हो सकता है उन्हें विरक्ति हो गई हो। हमारे अधिकारों की चिंता इसी विरक्ति से उपजी हो सकती है, कल यदि उन्हें आंकाओं से सत्ता की कुर्सी मिल गई तो वह तुरंत हमारा साथ भी छोड़ सकते हैं। इसलिए एक अभियान चलाया जाए जिसमें ऐसे मनुष्यों का समर्थन जीवाणुओं के लिए खड़ा किया जाए जो किसी भी स्थिति में हमारे साथ खड़े रहने का माद्दा रखते हों। इसके लिए जीवाणुओं की एक कमेटी बनाई गई। जो इस दुनिया खासकर भारत भूमि में ऐसे मानव समूहों का पता लगाएगी, जो किसी भी सूरत में जीवाणुओं के अधिकारियों का समर्थन करते रहेंगे।

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