डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड जिसे देवभूमि और हरियाली से भरपूर पहाड़ी राज्य के रूप में जाना जाता है, आज अपने ही जंगलों को बचाने की जंग लड़ रहा है. राज्य के रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्रों पर बढ़ते अवैध कब्जे न केवल पर्यावरण के लिए खतरा बनते जा रहे हैं, बल्कि वन विभाग की कार्यप्रणाली और व्यवस्थाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं. आंकड़े बताते हैं कि समस्या कितनी गहरी है और उससे निपटने की रफ्तार कितनी धीमी. वन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में कुल 11 हजार 396.63 हेक्टेयर से अधिक रिजर्व फॉरेस्ट भूमि पर अतिक्रमण हुआ है. इनमें से अभी भी करीब 9 हजार 836 हेक्टेयर क्षेत्र पर अवैध कब्जा बरकरार है. यानी कि बीते वर्षों में चलाए गए अभियानों के बावजूद 70 प्रतिशत से अधिक जंगल अब भी अतिक्रमण की जद में हैं. यह स्थिति तब है जब पिछले चार वर्षों में राज्य सरकार और वन विभाग ने अतिक्रमण हटाने के लिए कई अभियान चलाए. इन अभियानों के तहत कुल 1 हजार 560.31 हेक्टेयर भूमि को अवैध कब्जे से मुक्त कराया गया है. लेकिन इस आंकड़े को कुल अवैध कब्जे के अनुपात में देखें तो यह बेहद कम है, जो यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर कार्रवाई अपेक्षित गति से नहीं हो पा रही है. यह आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में भी कार्रवाई संतोषजनक नहीं रही है. हालांकि, यह भी नहीं है कि वन विभाग की तरफ से इसके लिए प्रयास नहीं किए गए हो, लेकिन तमाम क्षेत्रों में इन मामलों के न्यायालय पहुंचने से अधिकारियों की अतिक्रमण को हटाने की रफ्तार में कमी आई है. देहरादून जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्र में भी अतिक्रमण हटाने की इतनी धीमी गति चिंता का विषय है. यह न केवल प्रशासनिक कमजोरी को दर्शाता है, बल्कि शहरीकरण के दबाव को भी उजागर करता है. अतिक्रमण हटाने में सबसे बड़ी अड़चन कोर्ट में लंबित मामले हैं. कई मामलों में कब्जाधारियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया हुआ है, जिसके चलते वन विभाग सीधे कार्रवाई नहीं कर पा रहा है. इन आंकड़ों ने वन विभाग की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. यह आरोप लग रहे हैं कि विभाग लंबे समय तक अतिक्रमण पर आंखें मूंदे रहा, जिसके कारण समस्या इतनी विकराल हो गई.स्थानीय स्तर पर यह भी शिकायतें आती रही हैं कि कई मामलों में प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत के कारण अतिक्रमण को समय रहते नहीं रोका गया. अगर शुरुआती स्तर पर सख्त कदम उठाए जाते, तो आज स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती. उत्तराखंड में हजारों हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट पर अवैध कब्जे बड़ी मुसीबत बने हुए हैं. स्थिति ये है कि करीब 4 सालों से चल रहे अभियान के बावजूद 80 प्रतिशत से भी ज्यादा जंगल अवैध कब्जे की जद में बने हुए हैं. उधर, इस मामले में कुमाऊं का तराई डिवीजन सबसे खराब स्थिति में है. यही नहीं, कई मामलों के न्यायालय में जाने से महकमे की मुश्किलें और भी ज्यादा बढ़ी हुई हैं. अवैध अतिक्रमण का असर केवल जमीन तक सीमित नहीं है. इसका सीधा प्रभाव पर्यावरण और वन्यजीवों पर भी पड़ता है. जंगलों के कटने से जैव विविधता (बायोडायवर्सिटी) को नुकसान होता है. साथ ही वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास खत्म होता है. जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है. बात यही तक नहीं है, इससे जल स्रोतों और जलवायु संतुलन पर असर पड़ता है.स्थिति को देखते हुए केवल अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा. इसके लिए बहु-स्तरीय रणनीति की जरूरत है. कानूनी प्रक्रियाओं में तेजी लानी भी जरूरी होगी. साथ ही कोर्ट में लंबित मामलों के जल्द निपटारे के लिए विशेष प्रयास होने चाहिए.एआई सिस्टम को जमीनी स्तर तक लागू किया जा रहा है. इस तरह टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए अतिक्रमण हटाने में मदद मिलेगी. हालांकि, इसमें ग्राम स्तर पर वन संरक्षण समितियों को सक्रिय किया जाना भी जरूरी है, ताकि ग्रामीण स्तर पर भी इस पर नजर रखी जा सके.इसमें सबसे महत्वपूर्ण जवाब देही तय करना भी है, ताकि लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो सके. इस दौरान लोगों को जंगलों के महत्व और अतिक्रमण के नुकसान के बारे में जागरूक भी किए जाने का प्लान है. मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था, “हमें जो बात सबसे अधिक चौंकाने वाली लगती है, वह यह है कि उत्तराखंड राज्य और उसके अधिकारी मूक दर्शक बने हुए हैं, जबकि उनकी आंखों के सामने वन भूमि पर सुनियोजित रूप से कब्जा किया जा रहा है। इसलिए, हम स्वतः संज्ञान लेते हुए इन कार्यवाही के दायरे को बढ़ाने का प्रस्ताव करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि उत्तराखंड सरकार ने वन भूमि पर सुनियोजित रूप से कब्जा करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ केवल औपचारिक कार्रवाई की है।”लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












