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साहित्यकारों के नाम पर पुरस्कार घोषित, साहित्य उपेक्षित

04/03/25
in उत्तराखंड, देहरादून, साहित्य
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड सरकार ने नामचीन साहित्यकारों के नाम पर पुरस्कार तो घोषित कर दिए, लेकिन उनके साहित्य के संरक्षण की दिशा में कोई पहल नहीं की। हाल यह है कि सरकारी स्तर पर एक भी ऐसा पुस्तकालय नहीं है, जहां गढ़वाली या कुमाऊंनी भाषा का साहित्य उपलब्ध हो सके। कुछ लोगों ने अपने स्तर से जरूर घर में ही ऐसी किताबें जुटाई हैं, लेकिन यह आमजन या युवा पीढ़ी की पहुंच में नहीं है, जिससे अच्छा लोक साहित्य लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। ऐसे में गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषा को आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करने वाले सरकार के कर्ताधर्ताओं के वादे बेमानी साबित हो रहे हैं। जाहिर है साहित्य गौरव पुरस्कार बांट कर सिर्फ़ आंखों में धूल झोंकी जा रही है। हकीकत में कोई काम इस दिशा में नहीं किया जा रहा है। गढ़वाली भाषा के उन्नयन के लिए काम कर रहे गढ़वाली साहित्यकार नरेंद्र कठैत ख़ुद सरकारी प्रयासों से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि सरकार को एक ऐसा पुस्तकालय स्थापित करना चाहिए, जहां गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा के साहित्य को संरक्षित किया जा सके। हैरत की बात है कि अन्य प्रकाशनों की तो छोड़िए संस्कृति निदेशालय और उत्तराखंड भाषा संस्थान के पास अपनी अनुदानित पुस्तकों के रखरखाव तक की सही व्यवस्था नहीं है, जबकि इसके लिए यह हर साल लाखों रुपए खर्च कर रहे हैं। ऐसे में दोनों विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। संस्कृति निदेशालय जहां अनुदान के लिए चयनित पुस्तकों की 10 प्रतियां लेखक से मांगता है, वहीं उत्तराखंड भाषा संस्थान अनुदानित पुस्तकों की पांच प्रतियां मांगता है। भाषा संस्थान की पहले शर्त यह होती थी कि जितना अनुदान दिया जाएगा, उतने ही मूल्य की पुस्तकें आपको जमा करानी होंगी। यानी किसी को यदि 15 हजार रुपए का अनुदान दिया गया है और उसने पुस्तक का मूल्य 150 रुपए रखा है, तो उसे 100 प्रतियां जमा करानी होंगी। हालांकि अब सिर्फ़ पांच पुस्तकें मांगी जाती हैयह तो हुई अनुदान प्रक्रिया की बात, लेकिन असल सवाल यहीं से उठता है। इन अनुदानित पुस्तकों का विभाग करता क्या है। स्थिति यह है कि दोनों ही विभागों के पास अपनी लाइब्रेरी तक नहीं है। ऐसे में अनुदानित पुस्तकों के बंडल बंद कमरे में धूल फांक रही हैं। दोनों विभागों के अनुदान से प्रकाशित अधिकतर पुस्तकें पाठकों के हाथ तक नहीं पहुंचती। ऐसे में दोनों विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।सवाल यह है कि जब पाठकों के पास यह पुस्तकें पहुंचनी ही नहीं हैं, तो इनके लिए अनुदान देने से क्या फायदा। क्यों लाखों रुपए की बरबादी की जा रही है। आखिर साहित्य गौरव पुरस्कार देकर सरकार दिखाना क्या चाहती है। जब सरकारी स्तर पर एक अदद पुस्तकालय तक इन दोनों विभागों ने पुस्तकों के संरक्षण को नहीं बनाया है तो फिर पुरस्कार देने का ढोंग क्यों? गढ़वाली साहित्यकार नरेंद्र कठैत बताते हैं कि उत्तराखंड में लोक साहित्य के लिए अपना जीवन खपा देने वाले प्रख्यात साहित्यकार मोहन बाबुलकर की किताबें तक राज्य सरकार संरक्षित नहीं कर पाई। ऐसे में उन्हें अपनी किताबें देवप्रयाग स्थित वेधशाला को देने के लिए विवश होना पड़ा। उन्होंने कहा कि गढ़वाली और कुमाऊंनी उत्तराखंड की दो प्रमुख भाषाएं हैं और अन्य सह भाषाएं हैं। इनके रखरखाव और शोध प्रबंध के लिए पृथक भाषा संस्थान जरूरी है। दून लाईब्रेरी के प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर कहते हैं कि उत्तराखंड भाषा संस्थान का दायित्व है कि वह लोक साहित्य का संरक्षण करे। कहा कि मोहनलाल बाबुलकर हों या भजन सिंह ‘सिंह’ अथवा शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ जैसे लोक भाषा के साहित्यकारों की पुस्तकें समग्र रूप से कहीं भी उपलब्ध नहीं हैं। इतिहासकार योगेश धस्माना ने कहा कि सरकार ने भजन सिंह ‘सिंह’ जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों के नाम पर पुरस्कार तो घोषित कर दिए, लेकिन इनके साहित्य को सहेजने का काम नहीं किया। मुख्यमंत्री ने लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी के जन्म दिवस पर घोषणा की थी कि वह लोक भाषा की किताबों का संरक्षण करने के लिए एक लाइब्रेरी बनाएंगे, लेकिन आज तक इस दिशा में पहल नहीं की। बकौल धस्माना उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान ने उत्तराखंड के तमाम नामचीन साहित्यकारों की पुस्तकें समय-समय पर प्रकाशित की थी, जिनका मूल्य भी ज्यादा नहीं था। उत्तराखंड भाषा संस्थान इन पुस्तकों को आसानी से मंगा सकता था, लेकिन संस्थान से जुड़े अधिकारियों या सलाहकारों को पुरस्कारों की रेवड़ियां बांटने या जुगाड़बाजी से फुर्सत मिले, तब तो वह इस दिशा में सोचें। बहरहाल, बड़े साहित्यकारों के नाम पर पुरस्कार घोषित कर देने भर से लोक साहित्य का भला नहीं होगा, बल्कि उनकी किताबों को संरक्षित करने की दिशा में भी सरकार को धरातल पर काम करना चाहिए।लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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