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उत्तराखंड में आसान नहीं है एसआईआर प्रक्रिया

10/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
प्रदेश मे चल रहे प्री-एसआइआर (विशेष गहन पुनरीक्षण से पूर्व) में यदि वर्ष 2003 से पुराना वोटर होने के बावजूद आपका नाम मतदाता सूची में नहीं मिल रहा है तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। आप संतान (प्रोजनी) के रूप में मैपिंग करा सकते हैं। इसके लिए आपके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम मतदाता सूची में देखा जाएगा।प्रदेश में इस समय प्री-एसआइआर की तैयारियों के तहत 40 वर्ष से अधिक आयु के मतदाताओं का वर्ष 2003 की मतदाता सूची से मिलान किया जा रहा है। ऐसा माना गया है कि उस समय पहली बार बने मतदाता भी इस समय 40 वर्ष के हो गए होंगे।राज्य बनने के दशकों बाद भी, बेहतर रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में, युवा लगातार शहरों और मैदानी क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं. पुरुषों के बाहर जाने से गांवों में लिंगानुपात असंतुलित हो रहा है, जिससे सामाजिक ताना-बाना प्रभावित होता है. युवाओं की कमी से कृषि उत्पादन में गिरावट आ रही है और उपजाऊ ज़मीनें बंजर होती जा रही हैं. निर्वाचन आयोग 2003 की मतदाता सूची से मिलान करके फर्जी या दोहरी एंट्री को हटाना चाहता है, लेकिन पलायन के कारण पहाड़ों में वोटरों की संख्या कम हुई है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में यह संख्या बढ़ी है. पलायन कर चुके लोगों का नाम वोटर लिस्ट से हटाना एक जटिल प्रक्रिया होगी, क्योंकि उनकी अनुपस्थिति को सत्यापित करना आसान नहीं होगा. वहीं कोई पलायन करके जाने वाला युवा अगर नई जगह पर भी वोट देता है, तो उसका नाम अपने पैतृक गांव से कट सकता है. यह भी एक चुनौती हो सकता है, लेकिन इसके लिए भी सरकार कोई रास्ता निकाल सकती है. दूसरी ओर निर्वाचन आयोग की टीम और बीएलओ के लिए आंकड़ों का संकलन करना इसलिए मुश्किल होगा, क्योंकि वीरान पड़े गांव में खाली घरों में किससे और कैसे संपर्क कर पाएंगे, लेकिन इन सुविधाओं को दूर करने के लिए ही प्री – एसआईआर की जा रही है. राज्य बनने के दशकों बाद भी, बेहतर रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में, युवा लगातार शहरों और मैदानी क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं. पुरुषों के बाहर जाने से गांवों में लिंगानुपात असंतुलित हो रहा है, जिससे सामाजिक ताना-बाना प्रभावित होता है. युवाओं की कमी से कृषि उत्पादन में गिरावट आ रही है और उपजाऊ ज़मीनें बंजर होती जा रही हैं. निर्वाचन आयोग 2003 की मतदाता सूची से मिलान करके फर्जी या दोहरी एंट्री को हटाना चाहता है, लेकिन पलायन के कारण पहाड़ों में वोटरों की संख्या कम हुई है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में यह संख्या बढ़ी है. पलायन कर चुके लोगों का नाम वोटर लिस्ट से हटाना एक जटिल प्रक्रिया होगी, क्योंकि उनकी अनुपस्थिति को सत्यापित करना आसान नहीं होगा. वहीं कोई पलायन करके जाने वाला युवा अगर नई जगह पर भी वोट देता है, तो उसका नाम अपने पैतृक गांव से कट सकता है. यह भी एक चुनौती हो सकता है, लेकिन इसके लिए भी सरकार कोई रास्ता निकाल सकती है. दूसरी ओर निर्वाचन आयोग की टीम और बीएलओ के लिए आंकड़ों का संकलन करना इसलिए मुश्किल होगा, क्योंकि वीरान पड़े गांव में खाली घरों में किससे और कैसे संपर्क कर पाएंगे, लेकिन इन सुविधाओं को दूर करने के लिए ही प्री – एसआईआर की जा रही है.उत्तराखंड निर्वाचन आयोग एसआईआर से पहले अभ्यास के तौर पर प्री -एसआईआर की तैयारी कर रहा है, जिसका लक्ष्य लगभग 70 फीसद मतदाताओं का सत्यापन करना है. ताकि जब एसआईआर किया जाए तो आमजन की सुविधाओं के अनुरूप ही इस प्रक्रिया को पूरा किया जा सके. इसके लिए राज्य निर्वाचन आयोग की टीम तैयारी कर रही है लेकिन उनके लिए उत्तराखंड की भौगोलिक स्थापना के साथ ही सामाजिक स्थिति भी चुनौतियां ला सकती है क्योंकि उत्तराखंड अन्य राज्यों की तुलना में अलग परिस्थितियों वाला राज्य है, जिसमें पर्वतीय इलाकों पर डेटा संकलन करना चुनौती पूर्ण काम हो सकता है. समाजशास्त्र का कहना है कि सरकार की ओर से एसआईआर के फैसले का वह स्वागत करते हैं, क्योंकि समय-समय पर राज्य और देश में ऐसी एसआईआर होनी चाहिए, जो लोकतंत्र को मजबूती देता है. उनका मानना है कि 5 से 10 साल के अंतराल में जनसंख्या में भी अंतर आता रहता है. क्योंकि कई लोगों की मृत्यु होती है और कई लोग जन्म लेते हैं और नए वोटर भी बनते हैं. इसीलिए समय-समय पर इस तरह के रिवीजन होते रहने चाहिए ताकि वास्तविक जनसंख्या और डेटा का पता लगाया जा सके और इसे प्रदर्शित के साथ निष्पक्षता के साथ पूरा करना चाहिए. जिसमें जनता भी सरकार का सहयोग करें. यह प्रक्रिया जितना राज्य के लिए जरूरी है उतनी ही जटिल भी है, क्योंकि यह प्रदेश भारत नेपाल और चीन और तिब्बत की सीमाओं से जुड़ा है. उत्तराखंड के लिए हमेशा से ही सबसे बड़ी समस्या पलायन है, जिसने कई पर्वतीय गांवों को लगभग खाली कर दिया है. अब जब विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के माध्यम से मतदाता सूचियों को अपडेट किया जाएगा. तब इस पलायन और एक विशिष्ट सामाजिक पहलू के साथ ही नेपाल से आई बहुओं – के कारण एक बड़ा संकट सामने आ रहा है.  कई मामलों में शादी को लंबा समय हो जाने या सीमित साक्षरता के कारण इन महिलाओं के पास अपने मायके से जुड़े पर्याप्त और वैध दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं होते हैं तो भी दिक्कत हो सकती है. बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को इन मामलों में गहन जांच और सत्यापन के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे, जो प्रक्रिया को धीमा और जटिल बना सकता है. परिसीमन से पहले उत्तराखंड में कुछ सीटों के नाम और सीमाएँ बिल्कुल अलग थीं। उदाहरण के तौर परचंबा-नई टिहरी अब चंबा में बदल गई।पिंजर की जगह रूद्रप्रयाग सीट अस्तित्व में आई।•डीडीहाट सीट के स्थान पर पिथौरागढ़ व धारचूला के रूप में नया गठन हुआ।नैनीताल, भीमताल, चोरगलिया जैसे पुराने नाम बदले।काशीपुर ग्रामीण, राजपुर, जसपुर-खुर्द, लालकुआं जैसे क्षेत्रों को नए स्वरूप मिले।कई सीटों के नाम 2003 की सूची में दर्ज हैं, लेकिन वे 2008 के परिसीमन के बाद पूरी तरह हट चुकी हैं,  बेहद चुनौतीपूर्ण जबकि कुछ को बड़े पैमाने पर सीमाई बदलावों से गुज़रना पड़ा। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ने लाखों मतदाताओं को सड़क पर ला दिया है। किराएदारों की शिफ्टिंग, मकान नंबर नदारद और पुरानी लिस्टों में गड़बड़ी ज़ाहिर होने से एक सवाल खड़ा हो रहा हैं। आखिर इन त्रुटियों का जिम्मेदार कौन है ? ये कदम अपनाकर कोई मतदाता वंचित न रहे। चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार BLO से संपर्क करें , फॉर्म समय पर जमा करें। अगर पुरानी लिस्ट खोली गई, तो लाखों को राहत मिलेगी वरना यह SIR न सिर्फ वोटर लिस्ट साफ करेगी, बल्कि लोकतंत्र पर सवाल भी खड़े करेगी।  प्री-एसआइआर का उद्देश्य अधिक से अधिक मतदाता सूची की बीएलओ एप से मैपिंग करना है। यदि किसी का विभिन्न कारणों से इस सूची में नाम नहीं है तो उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। वे प्रोजनी वोटर के रूप में अपनी मैपिंग करा सकते हैं। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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