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शिक्षक दिवस पर शिक्षकों का योगदान

04/09/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
डॉ. राधाकृष्णन का जन्म तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के चित्तूर जिले के तिरुत्तनी गांव के एक तेलुगु भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह गांव 1960 तक आंध्र प्रदेश में था, लेकिन वर्तमान में तमिलनाडु में है। ऐसा कहा जाता है कि राधाकृष्णन के पुरखे सर्वपल्ली नामक गांव में रहते थे। उन्हें अपने गांव से बहुत लगाव था। इसलिए अपने नाम के पहले वे सर्वपल्ली लगाते थे। डॉ. राधाकृष्णन के पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी और माता का नाम सीताम्मा था। इनके पांच पुत्र और एक पुत्री हुए। राधाकृष्णन दूसरे नंबर की संतान थे। डॉ. राधाकृष्णन की प्रारंभिक शिक्षा लुथर्न मिशन स्कूल, तिरुपति से हुई। इसके बाद उनकी शिक्षा वेल्लूर और मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से हुई। उन्होंने 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा पास की। वे बचपन से ही मेधावी प्रतिभा के धनी इंसान थे। उन्होंने बाइबिल के महत्वूर्ण अंश भी याद कर लिये थे। राधाकृष्णन ने 1905 में कला संकाय की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। इसके बाद दर्शन शास्त्र में एम.ए करने के बाद उन्हें 1918 में मैसूर महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र का सहायक प्रध्यापक नियुक्त किया गया। हालांकि, बाद में वे उसी कॉलेज में प्राध्यापक भी बने।जब भी देश में महान दार्शनिक की बात आती है, तो डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का नाम सबसे पहले जुबां पर आता है। उन्होंने पूरी दुनिया को भारत के दर्शन शास्त्र से परिचय कराया। डॉ. राधाकृष्णन देश के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को हुआ था। दस वर्षों तक बतौर उपराष्ट्रपति जिम्मेदारी निभाने के बाद 13 मई 1962 को उन्हें देश का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया। राधाकृष्‍णन का जन्‍म गरीब परिवार में हुआ था। वे इतने गरीब थे कि केले के पत्‍तों पर उन्हें और उनके परिवार को भोजन करना पड़ता था। एक बार राधाकृष्‍णन के पास केले के पत्‍तों को खरीदने के पैसे नहीं थे, तब उन्‍होंने जमीन को साफ किया और उस पर ही भोजन कर लिया। शुरुआती दिनों में सर्वपल्‍ली राधाकृष्णन 17 रुपये प्रति माह कमाते थे। इसी कमाई से वे अपने परिवार का पालन पोषण करते थे। उनकी पांच बेटियां और एक बेटा था। परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्‍होंने पैसे उधार पर लिए, लेकिन समय पर ब्‍याज के साथ उन पैसों को नहीं चुका पाने के कारण उन्‍हें अपने मेडल भी बेचने पड़े। 1947 में आजादी मिलने के बाद जब पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने डॉ. राधाकृष्णन से सोवियत संघ में राजदूत के तौर पर काम करने का आग्रह किया। नेहरू की बात को मानते हुए उन्होंने 1947 से 1949 तक संविधान सभा के सदस्य के तौर पर काम किया, फिर 1952 तक रूस में भारत के राजदूत बनकर रहे। 13 मई 1952 को उन्हें देश का पहला उपराष्ट्रपति बनाया गया। वे 1953 से 1962 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर के दिन हुआ था। इसलिए इस दिन को उनकी याद में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता हैा कहा जाता है कि कुछ स्टूडेंट्स उनके पास आए और उनसे उनका जन्मदिन मनाने का आग्रह किया। इस पर उन्होंने कहा कि अगर मेरा जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो मुझे ज्यादा खुशी होगी। तभी से उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।  100 से अधिक देशों में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है, क्योंकि यूनेस्‍को ने आधिकारिक रुप से 1994 में ‘शिक्षक दिवस’ मनाने के लिए 5 सितंबर के दिन को चुना था। डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शनशास्त्र और धर्म पर कई किताबें लिखी, जिनमें ‘गौतम बुद्ध : जीवन और दर्शन’, ‘धर्म और समाज’ और ‘भारत और विश्व’ प्रमुख है। उनका निधन 17 अप्रैल 1975 को हुआ। एक आदर्श शिक्षक और दार्शनिक के रूप में वह आज भी हम सभी के लिए प्रेरणादायक हैं। उनके मरणोपरांत 1975 में अमेरिकी सरकार ने उन्हें टेम्पल्टन पुरस्कार से सम्मानित किया। डॉ. राधाकृष्णन को 1954 में ‘भारत रत्न’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, उन्हें पीस प्राइज आफ द जर्मन बुक ट्रेड से भी सम्मानित किया गया। राधाकृष्णन को ब्रिटिश शासनकाल में ‘सर’ की उपाधि दी गई थी। इसके अलावा, इंग्लैंड सरकार ने उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ मेरिट’ सम्मान से भी सम्मानित किया था। जर्मनी के पुस्तक प्रकाशन के द्वारा 1961 में उन्हें ‘विश्व शांति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। जानेमाने कवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी किताब स्मरणांजलि में लिखा है, “जब राधाकृष्णन मॉस्को में भारत के राजदूत थे, बहुत दिनों तक स्टालिन उनसे मुलाक़ात के लिए राज़ी नहीं हुए. अंत में जब दोनों की मुलाक़ात हुई तो डॉक्टर राधाकृष्णन ने स्टालिन से कहा, “हमारे देश में एक राजा था जो बड़ा अत्याचारी और क्रूर था. उसने रक्त भरी राह से प्रगति की थी किन्तु एक युद्ध में उसके भीतर ज्ञान जाग गया और तभी से उसने धर्म, शांति और अहिंसा की राह पकड़ ली. आप भी अब उसी रास्ते पर क्यों नहीं आ जाते?””डॉक्टर राधाकृष्णन की इस बात का स्टालिन क्या जवाब देते. उनके जाने के बाद स्टालिन ने अपने दुभाषिए से कहा, “ये आदमी राजनीति नहीं जानता, वह केवल मानवता का भक्त है.” पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने वर्ष 2003 में शिक्षक दिवस पर अपने संबोधन में कहा था, ‘विद्यार्थी 25,000 घंटे अपने विद्यालय प्रांगण में ही बिताते हैं, इसलिए विद्यालय में ऐसे आदर्श शिक्षक होने चाहिए, जिनमें शिक्षण की क्षमता हो, जिन्हें शिक्षण से प्यार हो और जो नैतिक गुणों का निर्माण कर सक बिताते हैं, जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होगा, तब तक शिक्षा को मिशन का रूप नहीं मिल पाएगा। इसलिए विद्यालय में ऐसे आदर्श शिक्षक होने चाहिए, जिनमें शिक्षण की क्षमता हो, जिन्हें शिक्षण से प्यार हो और जो नैतिक गुणों का निर्माण कर सक गुणों का निर्माण कर सकें. आजादी के बाद उन्हें विश्वविद्यालय आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया तथा वह 1949 में सोवियत संघ में भारत के राजदूत बने। इस दौरान उन्होंने लेखन भी जारी रखा। सन् 1952 में डॉ. राधाकृष्णन भारत के उपराष्ट्रपति बने। 1954 में उन्हें भारतरत्न की उपाधि से सम्मानित किया गया। डॉ. राधाकृष्णन 1962 में राष्ट्रपति बने तथा इन्हीं के कार्यकाल में चीन तथा पाकिस्तान से युद्ध भी हुआ। 1965 में आपको साहित्य अकादमी की फेलोशिप से विभूषित किया गया तथा 1975 में धर्म दर्शन की प्रगति में योगदान के कारण टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं जो उनकी महानता को प्रमाणित करती हैं। उनकी इण्डियन फिलासफी, द हिंदू व्यू आफ लाइफ, रिलीफ एंड सासाइटी, द भगवद्गीता, द प्रिसिंपल आफ द उपनिषद, द ब्रह्मसूत्र, फिलासफी ऑफ रवींद्रनाथ टैगेार आदि पुस्तकें सम्पूर्ण विश्व को भारत की गौरवशाली गाथा के बारे में ज्ञान कराते हैं। वह निष्काम कर्मयोगी, करूण हृदयी, धैर्यवान विवेकशील और विनम्र थे। उनका आदर्श जीवन भारतीयों के लिये स्रोत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रेरणास्रोत है। शिक्षा का मतलब सिर्फ जानकारी देना ही नहीं है। जानकारी और तकनीकी गुर का अपना महत्व है लेकिन बौद्धिक झुकाव और लोकतांत्रिक भावना का भी महत्व है, क्योंकि इन भावनाओं के साथ छात्र उत्तरदायी नागरिक बनते हैं।उन्हीं को आदर्श मानकर आज पूरे भारत में शिक्षक दिवस पूरे धूमधाम से मनाया जाता है। *ये लेखक के अपने विचार हैंलेखक दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।*

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