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उत्तराखंड के विशेषाधिकार पर किसने चलाई है कैंची?

27/07/20
in उत्तराखंड, देहरादून
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शंकर सिंह भाटिया
उत्तराखंड को जो अधिकार मिलने चाहिए थे, वह नहीं मिले हंै। यह कहना है भाजपा के महासचिव राम माधव का। राम माधव भाजपा के एक बड़े नेता हैं। उनकी गिनती भाजपा के थिंक टैंक के रूप में होती है। मसूरी में आयोजित दो दिवसीय ‘‘उत्तराखंड यंग थिंकर्स वर्चुवल मीट’’ का शुभारंभ करते हुए उन्होंने यह बात कही है। जो लोग उत्तराखंड को भाजपा की दृष्टि से देखते हैं, वह इसे केंद्र तथा राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के एक बड़े नेता की साफगोई कह सकते हैं। लेकिन वास्तव में यह साफगोई की आड़ में युवाओं के आंखों में धूल झौंकने की सोची समझी साजिश से कम नहीं है।
राम माधव कह रहे हैं कि जो विशेषाधिकार हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर तथा दूसरे पर्वोत्तर राज्यों को मिले वे एक हिमालयी राज्य उत्तराखंड को नहीं मिले। इस बात पर कोई दो राय नहीं है। ये अधिकार उत्तराखंड को क्यों नहीं मिले? यदि उत्तराखंड को वंचित रखा गया तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इसके लिए उत्तराखंड की जनता जिम्मेदार है, जो आपका काम जाने बिना बारी-बारी से एक बार कांग्रेस तथा दूसरी बार भाजपा को सत्ता सौंप रही है? मुफ्त में मिली सत्ता के बदले भाजपा और कांग्रेस इस राज्य को उसके अधिकारों से वंचित रख रहे हैं?
जिन विशेषाधिकारों की बात भाजपा के महासचिव राम माधव कर रहे हैं, वे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371 में हैं। क्या राम माधव यह नहीं जानते कि जिस चिंता की वजह से 1971 में गठित हिमाचल प्रदेश राज्य के यशस्वी मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार ने अपने राज्य के लिए अनुच्छेद 371 में स्थान सुरक्षित कराया था, वह चिंता उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों को सन् 2000 के बाद भी नहीं हुई? जबकि उत्तराखंड के नौ-नौ मुख्यमंत्री हुए?
जब 1971 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद यशवंत सिंह परमार जी ने हिमाचल प्रदेश की सत्ता संभाली तो उन्हें सबसे अधिक चिंता अपने राज्य के उन लोगों की हुई, जो पहाड़ों में खेती करते थे। उन्हें डर था कि यदि देश के धन्ना सेठों ने धन का लालच दिखाकर लोगों की जमीनें खरीदनी शुरू की तो गरीब किसानों के पास कुछ नहीं रह जाएगा। हिमाचल प्रदेश बनाने का कोई औचित्य ही नहीं रह जाएगा। उन्होंने कैबिनेट से प्रस्ताव पारित किया और भारत सरकार से अनुरोध किया कि वह भूमि सुधार अधिनियम 1972 की धारा 118 में प्रावधान कर हिमाचल प्रदेश को स्थान दे। तब हिमाचल प्रदेश और केंद्र में कांग्रेस की सरकारें थीं।
चाहे मामला पूर्वोत्तर के राज्यों का हो, गोवा का हो, महाराष्ट, गुजरात, आंध्र प्रदेश या कर्नाटक का हो, अनुच्छेद 371 से लेकर 371ए, 371बी…. से 371जे तक के मौलिक प्रावधान इन विभिन्न राज्यों के लिए किए गए हैं। लेकिन हिमाचल प्रदेश के लिए मूल प्रावधान न होने के बावजूद उन्होंने अपनी कैबिनेट के माध्यम से अनुच्छेद 371 में केंद्र से अनुरोध कर अपने लिए स्थान बनाया।
जब 2002 में उत्तराखंड के पहले चुने हुए मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी एक अधकचरा भू कानून लेकर आए थे, वह इस प्रावधान की ओर क्यों नहीं गए? असलियत यह थी, कि तिवारी दूसरे राज्यों के बड़े-बड़े भू माफियाओं के हाथों खेल रहे थे, उन्हें उत्तराखंड के लोगों की जमीने छिन जाने से अधिक चिंता देश के भू माफियाओं के अधिकार सीमित हो जाने की थी। इसलिए वह एक अधकचरा भू कानून लेकर आए, जिसका कोई औचित्य ही नहीं था।
यदि नारायण दत्त तिवारी ने यह कृत्य किया तो 2007 में सत्ता में आई भाजपा ने क्या किया? राम माधव को जिन्हें उत्तराखंड के विशेषाधिकार न मिल पाने की चिंता सता रही है, उन्हें पता होना चाहिए कि भुवन चंद्र खंडूड़ी की सरकार ने तब क्या किया? भाजपा की राज्य सरकार ने कड़ा कानून बनाने के प्रयास में भूमि की सीमा ढाई सौ मीटर से बढ़ाकर पांच सौ मीटर कर दी। अन्य प्रावधान चाहे उन्होंने जो भी किए हों, उनका कोई प्रभाव जमीन पर नहीं दिखा। यदि भाजपा को उत्तराखंड के विशेषाधिकार की इतनी चिंता थी तो उनकी पार्टी की सरकार हिमाचल प्रदेश की तरह अनुच्छेद 371 मंें उत्तराखंड को शामिल करने के विकल्प के लिए क्यों नहीं आगे बढ़ी। राम माधवजी को यह तो पता होगा कि आज उत्तराखंड में उनकी सरकार तीन चैथाई बहुमत से सत्ता में है। केंद्र में भी भाजपा की ही सरकार है, जो गलती पिछली सरकारों ने की है, उन्हें सुधार कर अब तीन चैथाई बहुमत से सत्ता में मौजूद उनकी सरकार यह विशेषाधिकार हासिल करने की पहल क्यों नहीं करती? क्यों नही कैबिनेट में प्रस्ताव पारित कर उत्तराखंड को अन्य पर्वतीय राज्यों की तरह अनुच्छेद 371 में शामिल करने का आग्रह अपनी केंद्र सरकार से करती?
दरअसल विशेषाधिकार न मिलने की चिंता सिर्फ दिखाने के लिए है, ताकि उत्तराखंड के यंग थिंकर्स को लगे कि यह बहुत साफगोई से बात करने वाले नेता हैं। मकसद युवाओं के आंखों में धूल झौंकने का है, जो अधिकार उत्तराखंड को नहीं मिले हैं, उन्हें दिलाने की कोई जमीनी चिंता नहीं है। यदि होती तो यह काम आज के हालात में भाजपा के लिए चुटिकियों में करने का है। लेकिन मकसद करने का नहीं सिर्फ दिखाने का है। इस सच्चाई को समझने की जरूरत है, खासकर उन युवाओं के लिए जो भाजपा तथा कांग्रेस के ऐसे नेताओं के प्रभाव में बहते चले जाते हैं।

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